स्क्रीन से रिसता सन्नाटा
दीपावली पर घर सजते हैं, दीये जलते हैं और मोबाइल शुभकामना संदेशों से भर जाते हैं। मगर अपनों से बातचीत के लिए समय कम पड़ रहा है। क्या हम इस त्योहार पर घर की रोशनी के साथ रिश्तों की गर्माहट भी लौटा सकते...

बदलते पारिवारिक रिश्ते
दीपावली की शाम है। घर जगमगा रहा है, मिठाइयों की खुशबू है, नए कपड़े हैं और परिवार के सभी सदस्य एक साथ हैं। बस, एक छोटी-सी कमी है। कोई किसी से बात नहीं कर रहा!
पिता मोबाइल पर शुभकामना संदेशों के जवाब दे रहे हैं, मां रिश्तेदारों को दीपावली की बधाइयां भेज रही हैं, बेटा ऑनलाइन खेल में उलझा है और बेटी दोस्तों की तस्वीरें देख रही है। तभी आवाज आती है, ‘चलो, सब एक साथ फोटो खिंचवाते हैं।’ मोबाइल का कैमरा खुलता है, सबके चेहरे पर मुस्कान आती है और एक सुंदर पारिवारिक तस्वीर तैयार हो जाती है। तस्वीर रिश्तेदारों और दोस्तों को भेज दी जाती है। कुछ ही पलों में लाइक और शुभकामनाओं के जवाब भी आने लगते हैं। फिर सब अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हो जाते हैं।
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तस्वीर में पूरा परिवार है, चेहरों पर मुस्कान भी है। मगर एक सवाल है, जिसका जवाब उस तस्वीर में नहीं मिलता। क्या परिवार के ये सदस्य सचमुच एक-दूसरे के साथ भी हैं?
यह दृश्य किसी एक घर की कहानी नहीं है। त्योहारों पर हम दूर बैठे अपनों से जुड़ने के लिए समय निकालते हैं, वीडियो कॉल करते हैं और संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं। यह तकनीक की खूबी है कि दूरियां सिमट गई हैं। लेकिन एक अजीब विडंबना भी हमारे जीवन में जगह बना चुकी है। सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे किसी रिश्तेदार से बात करने के लिए हमारे पास वक्त है, लेकिन बगल में बैठे अपनों की बात सुनने की फुर्सत नहीं। हम दुनिया से जुड़े रहने की कोशिश में कहीं अपने ही घर के लोगों से दूर तो नहीं होते जा रहे?
मन की बात के लिए वक्त नहीं
सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक मोबाइल हमें लगातार किसी न किसी से जोड़े रखता है। किसी का संदेश, किसी की तस्वीर, किसी समूह की चर्चा और किसी नई खबर की सूचना। लगता है, कुछ छूट न जाए, इसलिए बार-बार स्क्रीन देखने का मन होता है। इस आपाधापी में कई बार वह व्यक्ति छूट जाता है, जो हमारे पास बैठा होता है।
किसी को ‘हैप्पी दीपावली’ लिखकर भेजना आसान है, लेकिन अपने ही घर में किसी से पूछना कि ‘आजकल तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?’ शायद उतना आसान नहीं रह गया। शुभकामना संदेश कुछ सेकंड में भेजा जा सकता है, मगर किसी की बात सुनने के लिए समय देना पड़ता है। उसके चेहरे के भाव समझने पड़ते हैं, उसकी चुप्पी पर ध्यान देना पड़ता है और कभी-कभी बिना सलाह दिए केवल उसके पास बैठना पड़ता है।
यही संपर्क और संवाद का अंतर है। संपर्क हमें एक-दूसरे तक पहुंचाता है, संवाद हमें एक-दूसरे को समझने का अवसर देता है। रिश्ते केवल हालचाल पूछ लेने से नहीं चलते। उन्हें यह भरोसा भी चाहिए कि जरूरत पड़ने पर कोई हमारी बात सुनेगा, हमें समझने की कोशिश करेगा और हमारी परेशानी को मामूली कहकर टाल नहीं देगा।
मोबाइल अपने आप में समस्या नहीं है। उसी के सहारे दूर रहने वाले माता-पिता अपने बच्चों को देख पाते हैं, भाई-बहन त्योहार पर एक-दूसरे से जुड़ते हैं और पुराने मित्र संपर्क में रहते हैं। परेशानी तब शुरू होती है, जब फोन हमारे इस्तेमाल की चीज रहने के बजाय हमारे समय और ध्यान का मालिक बनने लगता है।
बच्चे आखिर अपनी बातें किससे कहें?
घर में बच्चा स्कूल से लौटकर कोई दिलचस्प घटना बताना चाहता है। हो सकता है, उसे किसी दोस्त ने परेशान किया हो या किसी छोटी-सी उपलब्धि पर उसे खुशी हो रही हो। वह उत्साह से अपनी बात शुरू करता है, लेकिन सामने बैठे माता-पिता की नजर मोबाइल पर है। जवाब मिलता है, ‘हां, अच्छा है, पहले मुझे यह काम कर लेने दो।’
बात यहीं रुक जाती है। जरूरी नहीं कि माता-पिता जानबूझकर ऐसा कर रहे हों। उनके पास भी काम हैं, चिंताएं हैं और जिम्मेदारियां हैं। लेकिन जब यह स्थिति बार-बार बनती है, तो बच्चा अपनी छोटी-छोटी बातें साझा करना कम कर सकता है। धीरे-धीरे माता-पिता को लगने लगता है कि बच्चा कुछ बताता ही नहीं, जबकि बच्चे को लग सकता है कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है।
हर परेशानी शब्दों में सामने नहीं आती। कभी बच्चे का चिड़चिड़ापन, कभी अचानक बढ़ती चुप्पी और कभी मोबाइल में जरूरत से ज्यादा डूबे रहना भी इस बात का संकेत हो सकता है कि उसे ध्यान और साथ की जरूरत है। ऐसे में केवल स्क्रीन टाइम कम करने का नियम बना देना पर्याप्त नहीं। यह भी देखना होगा कि घर में उसके पास अपनी बात कहने के कितने अवसर हैं।
बच्चों से मोबाइल दूर रखने की अपेक्षा करने वाले बड़ों को खुद से भी एक सवाल पूछना चाहिए। जब बच्चा हमसे बात करना चाहता है, तब क्या हम सचमुच उसके लिए उपलब्ध होते हैं? बच्चे हमारी सलाह से जितना सीखते हैं, उससे कहीं अधिक हमारे व्यवहार से सीखते हैं।
बुजुर्गों के पास कहने को बहुत कुछ है
एक दूसरी तस्वीर घर के उस कोने में दिखाई देती है, जहां दादा-दादी या माता-पिता बैठे हैं। वे पुराने दिनों की कोई घटना सुनाना चाहते हैं। युवा सदस्य शायद वह कहानी पहले भी सुन चुके हैं, इसलिए मुस्कराकर टाल देते हैं या फोन देखते रहते हैं।
बुजुर्गों के लिए वही पुरानी घटना केवल बीते समय की कहानी नहीं होती। उसमें उनके जीवन के अनुभव, उनकी यादें और परिवार से जुड़ी भावनाएं होती हैं। कई बार वे किसी खास विषय पर बात करने के बजाय केवल बातचीत के बहाने अपनों के करीब रहना चाहते हैं।
पीढ़ियों के बीच सोच और पसंद का अंतर स्वाभाविक है। युवाओं की दुनिया अलग है और बुजुर्गों के अनुभव अलग। हर बात पर सहमत होना जरूरी भी नहीं। लेकिन किसी को सुनने का अर्थ उससे सहमत होना नहीं, बल्कि उसे सम्मान देना है। परिवार में जब हर व्यक्ति को अपनी बात कहने की जगह मिलती है, तब मतभेद भी रिश्तों को कमजोर करने के बजाय एक-दूसरे को समझने का अवसर बन सकते हैं।
यह भी सच है कि हर दूरी के लिए मोबाइल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। नौकरी का दबाव, लंबी यात्राएं, आर्थिक चिंताएं और बदलती जीवनशैली भी परिवारों का समय कम करती हैं। इसलिए जरूरत तकनीक से भागने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि उसे हमारे जीवन में कितनी जगह मिलनी चाहिए।
इस दीपावली एक छोटा-सा बदलाव करके देखें
त्योहार पर घर की सफाई होती है, सजावट बदली जाती है और पुरानी चीजों को व्यवस्थित किया जाता है। क्यों न इस बार कुछ समय रिश्तों के लिए भी निकाला जाए?
भोजन के समय मोबाइल अलग रखे जा सकते हैं। दीपावली की शाम कुछ देर ऐसी हो सकती है, जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठें और स्क्रीन के बजाय एक-दूसरे की ओर देखें। पुराने त्योहारों की यादें ताजा हों, बच्चों से उनकी पसंद पूछी जाए और बुजुर्गों की बातें सुनी जाएं। किसी को अपनी परेशानी बतानी हो, तो उसे बीच में टोके बिना बोलने दिया जाए।
इसके लिए किसी औपचारिक नियम या लंबे कार्यक्रम की जरूरत नहीं है। कभी साथ बैठकर हंस लेना, कभी दिनभर की कोई छोटी-सी घटना साझा करना और कभी बिना किसी खास वजह के हाल पूछ लेना भी रिश्तों को मजबूत बनाता है।
हां, बातचीत को पूछताछ में बदलने से बचना होगा। बुजुर्गों को हर बात पर सलाह देना जरूरी नहीं। कभी-कभी यह पूछना भी काफी होता है कि ‘तुम्हारा दिन कैसा रहा?’ और फिर जवाब सुनने के लिए सचमुच तैयार रहना। परिवार के साथ बिताए समय की अहमियत केवल इस बात से तय नहीं होती कि हम कितनी देर एक कमरे में बैठे रहे। यह भी मायने रखता है कि उस दौरान हमारा ध्यान कहां था। कुछ मिनट की सच्ची बातचीत कई बार घंटों साथ बैठे रहने से अधिक मायने रखती है।
घर रोशन हो, तो रिश्तों में भी उजाला हो
यह मानना ठीक नहीं कि पहले हर परिवार में खूब बातचीत होती थी और अब रिश्तों में संवाद समाप्त हो गया है। पहले भी परिवारों में मतभेद थे, मन की बातें दबाई जाती थीं और कई रिश्तों में चुप्पी बनी रहती थी। फर्क यह है कि आज हमारा ध्यान बांटने वाले साधन हर समय हमारे हाथ में हैं। इसलिए अपनों के लिए समय निकालने का फैसला अब अधिक सचेत होकर करना पड़ता है।
दीपावली हमें रोशनी का उत्सव मनाने का अवसर देती है। हम घर के हर कोने को सजाते हैं, दीयों की कतार लगाते हैं और चाहते हैं कि हमारे घर में सुख-समृद्धि आए। लेकिन घर की असली रौनक केवल सजावट से नहीं आती। वह तब महसूस होती है, जब कोई अपनी परेशानी बेझिझक बता सके, कोई अपनी खुशी साझा करे और किसी की चुप्पी को भी अनदेखा न किया जाए।
इस दीपावली दूर बैठे अपनों को संदेश जरूर भेजें, तस्वीरें साझा करें और वीडियो कॉल पर उनका हाल पूछें। लेकिन घर में मौजूद लोगों के लिए भी कुछ समय बचाकर रखें। आखिरकार, परिवार की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसकी एक साथ कितनी तस्वीरें हैं या कितने लोगों से उसका संपर्क है। असली बात यह है कि उस घर में हर व्यक्ति को कितना अपनापन मिलता है और क्या उसे भरोसा है कि उसकी बात सुनी जाएगी। इस दीपावली दीये घर में ही नहीं, रिश्तों में भी जलने दें।






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