त्योहार मनाएं, कर्ज का बोझ न बढ़ाएं
आसान किस्तों और छूट के लालच में त्योहार की खुशी बाद के महीनों की आर्थिक परेशानी न बने, इसलिए बजट बनाकर सादगी से दीपावली...

अनचाहे कर्ज का खतरनाक खेल
शरद की मीठी धूप और हवा में घुली हल्की सी ठंडक जब दस्तक देती है, तो समझ लीजिए कि दीपों का महापर्व आ पहुंचा है। बाजारों की सजी हुई गलियां, जगमगाती कतारें, खील बताशों की सोंधी महक और चारों तरफ फैली चहल पहल हर उदास चेहरे पर भी मुस्कान बिखेर देती है। भारतीय घरों में दीपावली केवल एक तिथि नहीं, बल्कि पूरे साल की थकान मिटाकर नई उमंग भरने का उत्सव है। हम सब चाहते हैं कि हमारे घर का कोना कोना दमके, थाली में पकवानों की मिठास घुले और अपनों के चेहरों पर खुशी की चमक दिखाई दे। किंतु जरा ठहरिए और सोचिए, क्या इस उजाले के पीछे हम अपनी जेब और भविष्य पर अंधेरे का साया तो नहीं डाल रहे हैं। पिछले कुछ बरसों में हमारे त्योहारों की सादगी को बाजार के शोर ने निगलना शुरू कर दिया है। आज उत्सव का अर्थ खुशियां बांटने से ज्यादा नया सामान बटोरना बन गया है, और यहीं से शुरू होता है दिखावे तथा अनचाहे कर्ज का खतरनाक खेल।
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दीपावली के आते ही हर हाथ में थमे मोबाइल फोन और चौराहों पर लगे बड़े फलक केवल एक ही मंत्र जपते नजर आते हैं, भारी छूट, शून्य ब्याज और अभी ले जाओ बाद में चुकाओ। बाजार ने हमारी भावनाओं की नस को बहुत बारीकी से पकड़ लिया है। जब हम अपनी जेब से नकद नोट निकालकर गिनते हैं, तो मन में एक स्वाभाविक रोक लगती है कि कहीं हाथ जरूरत से ज्यादा तो नहीं खुल रहा। लेकिन आसान किस्तों और जादुई प्लास्टिक के कार्डों ने उस हिचक को पूरी तरह मिटा दिया है। अब तो बस अंगूठा दबाइए और सामान आपके घर। व्यक्ति को लगता है कि अभी तो कुछ लगा ही नहीं, बस छोटी सी किस्त ही तो बंधेगी। लेकिन वह यह भूल जाता है कि बूंद बूंद से जैसे घड़ा भरता है, वैसे ही छोटी छोटी किस्तें मिलकर पूरे वेतन पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। जिस वस्तु की घर में कोई खास जरूरत नहीं थी, वह भी केवल छूट के लालच में ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने आ जाती है।
फिजूलखर्ची और झूठा दिखावा
इस फिजूलखर्ची में थोड़ा घी हमारे समाज का झूठा दिखावा भी डाल देता है। आजकल एक अजीब सी होड़ मची है कि किसके घर में कितना बड़ा पर्दा लगा, किसने कितनी महंगी धातु खरीदी और किसने कितने भारी उपहार बांटे। हम अपनी असली खुशी तलाशने के बजाय दूसरों को प्रभावित करने में ज्यादा ऊर्जा खपा रहे हैं। पड़ोस में नई गाड़ी आई है तो हमारे आंगन में भी कुछ नया दिखना ही चाहिए, भले ही इसके लिए बैंक से झटपट मिलने वाला महंगा कर्ज ही क्यों न उठाना पड़े। उपहार देना कभी स्नेह और आदर जताने का कोमल भाव हुआ करता था, लेकिन आज वह हैसियत नापने का पैमाना बन गया है। हम दूसरों की नजरों में बड़ा दिखने के चक्कर में अपनी ही नजरों में गिरते चले जाते हैं। जब पर्व आंतरिक शांति के बजाय सामाजिक मुकाबले का मैदान बन जाए, तो समझ लीजिए कि लक्ष्मी का पूजन पीछे छूट गया और केवल अहंकार की पूजा हो रही है।
बुनियादी जरूरतों को मिले प्राथमिकता
अगर आप चाहते हैं कि इस बार लक्ष्मी जी आपके घर सचमुच स्थाई वास करें, तो सबसे पहले अपने पारिवारिक बजट को एक मजबूत ढाल बनाइए। बजट कोई बंधन नहीं है जो आपकी खुशियों का गला घोंट दे, बल्कि वह एक ऐसा पहरेदार है जो त्योहार बीत जाने के बाद भी आपको चैन की नींद सोने देता है। घर के सभी सदस्यों को, विशेषकर बच्चों को साथ बिठाइए और तय कीजिए कि इस बार की सीमा क्या होगी। पहली प्राथमिकता घर की उन बुनियादी जरूरतों को मिलनी चाहिए जिनके बिना गुजारा नहीं, जैसे राशन, दवा, बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी बिल। दूसरी प्राथमिकता उन पारंपरिक रीति रिवाजों और आवश्यक खरीदारी को दीजिए जो दीपावली की रौनक हैं, जैसे नए वस्त्र, पूजन सामग्री और घर की सज्जा। तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि भविष्य के लिए रखी गई आपातकालीन बचत को इस चकाचौंध में कतई हाथ न लगाएं।
थोड़ी सी समझदारी और सूझबूझ से बिना बजट बिगाड़े भी घर का कोना कोना महकाया जा सकता है। कुम्हार के चाक पर बनी माटी के दीयों की सादगी में जो पवित्रता और अपनत्व है, वह बिजली की बेजान झालरों में कहां। जब हम किसी स्थानीय कारीगर से सूप, बताशे या दीये खरीदते हैं, तो हमारे थोड़े से धन से उसके घर का चूल्हा भी जलता है। क्या इससे बड़ा पुण्य और उत्सव कुछ और हो सकता है। बाजार जाने से पहले एक पक्की पर्ची बनाइए और मन में यह संकल्प दोहराइए कि जो उस कागज पर नहीं लिखा, वह कितना भी सुंदर या सस्ता दिखे, घर नहीं आएगा। बच्चों को भी यह समझाइए कि त्योहार का असली मजा महंगे खिलौनों या पटाखों के धुएं में नहीं, बल्कि पूरे परिवार के साथ बैठकर गुझिया बनाने, रंगोली सजाने और हंसी ठहाके लगाने में है।
कर्ज पर तमाशा, फूलती सांसें
पर्व तो तीन चार दिनों में धूमधाम से बीत जाएगा, घर की मिठाइयां भी समाप्त हो जाएंगी और फूल मालाएं भी सूख जाएंगी। लेकिन सोचिए कि यदि आपने यह सारा तमाशा कर्ज के दम पर खड़ा किया है, तो आने वाले महीनों का क्या होगा। जब दिसंबर और जनवरी की सुबह नए साल की उम्मीदों के बजाय कर्ज चुकाने के संदेश और किस्तों के तकाजे लेकर आएगी, तो घर का माहौल कैसा होगा। उस समय वही कीमती सामान घर के लोगों को चिढ़ाता हुआ सा लगेगा। आर्थिक तंगी सीधे इंसान के मन पर वार करती है, जिससे चिड़चिड़ापन बढ़ता है, पति पत्नी में तकरार होती है और घर की सुख शांति हवा हो जाती है। जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, क्या चार दिन की झूठी वाहवाही के लिए पूरे साल का मानसिक सुकून और पारिवारिक सौहार्द दांव पर लगाना कोई समझदारी है।
दीपावली का पावन पर्व हमें तमस से ज्योति की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और भटकाव से विवेक की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है। इसका सबसे बड़ा संदेश यही है कि पर्व का उल्लास किसी भी हाल में बाद के महीनों की आर्थिक विपत्ति और मानसिक संताप का कारण नहीं बनना चाहिए। अपनी वास्तविक सामर्थ्य के अनुसार सादगी से पर्व मनाना किसी भी दृष्टि से हीनता नहीं, बल्कि एक परिपक्व और सुलझे हुए परिवार की सबसे बड़ी पहचान है। इस बार दीप जलाते समय यह प्रण लें कि हम घर में रोशनी तो खूब करेंगे, लेकिन अपने सिर पर कर्ज का अंधेरा रत्ती भर भी नहीं चढ़ने देंगे। सच्ची दीपावली वही है जब रात को दीये बुझने के बाद भी मन के भीतर निश्चिंतता का प्रकाश जगमगाता रहे और आने वाले कल के लिए चेहरे पर बिना किसी फिक्र की खिली हुई मुस्कान हो।






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