तेज रोशनी में अपनों को ढूंढती आंखें
डिजिटल युग में स्क्रीन पर दुनिया तो सिमट आई, पर बुजुर्गों का हाथ थामने का वक्त घट गया। त्योहार की असली आभा मिट्टी के दीयों से नहीं, अपनों की जीवंत मौजूदगी से...

संवेदना
मणिमाला शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
जगमगाती रोशनियों में दमकते बाज़ार, मिठाइयों की महक और पटाखों का तेज शोर। दीपावली हमारी चौखट पर खड़ी है। पूरा देश इस समय उल्लास के एक अनूठे महासागर में हिचकोले खा रहा है। हर घर की खिड़की से हंसी और खिलखिलाहट छनकर बाहर आ रही है। लेकिन इसी उत्सव की चकाचौंध के समानांतर हमारी सोसायटियों और मोहल्लों में कुछ ऐसे बंद दरवाजे भी हैं, जिनके पीछे केवल एक भारी, डरावनी खामोशी का पहरा है। यह सन्नाटा उन बुजुर्ग आंखों का है, जिनके बच्चे करियर और आधुनिक जीवनशैली की होड़ में सात समंदर पार या दूसरे महानगरों में जा बसे हैं।
जब पूरा समाज खुशियां मना रहा होता है, तब ये बुजुर्ग अपनी सूनी देहरी पर अकेले बैठे बीते कल की स्मृतियों के दीये जलाते हैं। वे यादें, जब बच्चे छोटे थे, जब आंगन में उनकी किलकारियां गूंजती थीं और जब त्योहार सचमुच एक उत्सव जैसा महसूस होता था। आज उनकी दीपावली महज कैलेंडर के पन्नों पर सिमटी एक तारीख भर रह गई है। इस कसकते अकेलेपन को महसूस करना और उनके चेहरों पर मुस्कान वापस लाना ही आज के सभ्य समाज की सबसे बड़ी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है।
अकेलेपन का भयानक सच
बुजुर्गों का अकेलापन केवल भावनात्मक परेशानी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चिंता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 11.8 प्रतिशत लोग अकेलेपन का अनुभव करते हैं। संगठन के अनुसार, लगभग हर चार में से एक बुजुर्ग सामाजिक रूप से अलग-थलग है। यहां यह समझना जरूरी है कि अकेलापन और सामाजिक अलगाव एक ही स्थिति नहीं हैं। सामाजिक अलगाव का संबंध सामाजिक संपर्कों की कमी से है, जबकि अकेलापन व्यक्ति का भावनात्मक अनुभव है। भारत के लॉन्जिट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया के 2017–18 के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में शामिल 30,394 बुजुर्गों में से 13.4 प्रतिशत ने अक्सर अकेलापन महसूस करने की बात कही थी। यह आंकड़ा बताता है कि इस समस्या को कुछ परिवारों तक सीमित मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
शोधों में सामाजिक अलगाव और अकेलेपन का संबंध अवसाद, हृदय रोग, स्ट्रोक और डिमेंशिया जैसे स्वास्थ्य जोखिमों से पाया गया है। हालांकि, इन जोखिमों का स्तर परिस्थितियों के अनुसार बदलता है। त्योहारों के दौरान यह अकेलापन और गहरा महसूस होता है। चारों तरफ परिवारों के मिलन, बच्चों की हंसी और उत्सव की तस्वीरें हों, तो अपनों की अनुपस्थिति और अधिक खलती है। ऐसे में परिवार और समाज की जिम्मेदारी केवल शुभकामना भेजने तक सीमित न रहकर उनके साथ वक्त बिताने की होनी चाहिए।
कांच की स्क्रीन बनाम अपनों का जीवंत स्पर्श
आज की युवा पीढ़ी अक्सर यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती है कि ‘हमने वीडियो कॉल करके बधाई दे दी है’ या हम रोज बात करते हैं। तकनीक ने बेशक दूरियां कम की हैं और सात समंदर पार बैठे बच्चों को एक क्लिक पर सामने ला खड़ा किया है। मगर हमें ठहरकर सोचना होगा कि क्या पांच इंच की ठंडी स्क्रीन पर चमकता चेहरा बुजुर्ग मां-बाप के हाथ थामने वाले उस जादुई अहसास का विकल्प बन सकता है? क्या वह वीडियो कॉल त्योहार की उस तन्हाई को मिटा सकती है, जो अपनों की अनुपस्थिति में दीवारों से रिसती है? वीडियो कॉल औपचारिकता तक सीमित रह जाए, तो वह उस सूनेपन को नहीं भर सकती जो त्योहार की शाम को चुभता है। हमारे बुजुर्गों को त्योहार पर डिजिटल स्क्रीन की कृत्रिम आभा के साथ-साथ स्नेह की मानवीय गर्माहट भी चाहिए।
सब जानते हैं कि दूर रहने वाले बच्चों के लिए हर त्योहार पर घर पहुंचना संभव नहीं होता। आजीविका, आर्थिक स्थितियां और अन्य जिम्मेदारियां भी अपनी जगह हैं। लेकिन नियमित बातचीत, ध्यान से सुनी गई बात, जरूरतों की जानकारी और मिलने की ठोस योजना यह भरोसा दिलाती है कि दूरी के बावजूद रिश्ता जीवंत है। डिजिटल संपर्क को जिम्मेदारी का विकल्प नहीं, बल्कि उसे निभाने का एक माध्यम बनना चाहिए।
मनोचिकित्सक डॉ. रेहाना अज़ीम का कहना है कि इंसान को मानसिक संतुष्टि और सुरक्षा के लिए सार्थक सामाजिक संबंधों की जरूरत होती है। अपनों की मौजूदगी, स्नेहपूर्ण बातचीत और जरूरत के समय मिलने वाला सहयोग बुजुर्गों के लिए विशेष महत्व रखता है। जब कोई संतान झुककर मां के पैर छूती है या पिता को गले लगाती है, तो उस स्पर्श में केवल परंपरा नहीं, अपनेपन का भरोसा भी होता है। वीडियो कॉल इस जुड़ाव का माध्यम बन सकती है, लेकिन आमने-सामने की मौजूदगी और व्यावहारिक मदद की जगह नहीं ले सकती।
एकाकीपन का स्वास्थ्य पर प्रहार
अकेलेपन को अक्सर महज एक जज्बाती स्थिति मान लिया जाता है, लेकिन लंबे समय तक सामाजिक अलगाव मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। त्योहारों पर यह दंश और गहरा हो जाता है, जब चारों तरफ फैली दूसरों की खुशियां उनके एकांत को और नुकीला बना देती हैं। ऐसे में वे खुद को समाज में अनचाहा महसूस करने लगते हैं। कई बार बुजुर्ग इस डर से अपने बच्चों को फोन पर अपनी बीमारी या उदासी का जिक्र तक नहीं करते कि कहीं दूर बैठा बच्चा परेशान न हो जाए। वे तकलीफ छिपाते हैं, जरूरतें टालते हैं और अकेले ही जूझते रहते हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि अकेला रहने वाला हर बुजुर्ग दुखी या असहाय नहीं होता। बहुत से लोग स्वतंत्र जीवन पसंद करते हैं और अपने निर्णय खुद लेना चाहते हैं। चिंता तब बढ़ती है, जब व्यक्ति साथ और भावनात्मक सहारा चाहता हो, लेकिन उसे देखभाल न मिले। इसलिए बुजुर्गों की जरूरतों को समझना और बिना उनकी स्वतंत्रता में दखल दिए मदद करना जरूरी है।
हमारी सामाजिक जिम्मेदारी: पड़ोस का धर्म
यदि परिस्थितिवश बच्चे दूर हैं, तो क्या बतौर समाज हमारी कोई जवाबदेही नहीं बनती? क्या हमारा दायित्व सिर्फ अपने परिवार की चारदीवारी तक ही सीमित है? हमारी संस्कृति हमें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की सीख देती है। पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग केवल किसी के माता-पिता नहीं, वे समाज की जीती-जागती धरोहर हैं, जिन्होंने अपनी जवानी इस देश और समाज के निर्माण में खपा दी है। हम सब मिलकर छोटे, संवेदनशील प्रयासों से उनकी दीपावली का परिदृश्य बदल सकते हैं।
- समय का दान: इस त्योहार पर बुजुर्गों को दिया जाने वाला सबसे अनमोल उपहार आपका वक्त है। अपनी व्यस्तताओं में से मात्र आधा घंटा निकालकर उनके पास बैठिए, उनके दौर की दीपावली के किस्से सुनिए। संवाद के उन चंद लम्हों में उनकी आंखों में जो संतोष दिखेगा, वह किसी भी महंगे उपहार से अनमोल होगा।
- उत्सव के सहयात्री: अपने घर में बनने वाले पकवानों और मिठाइयों का एक हिस्सा पूरे सम्मान के साथ उन तक पहुंचाइए। उन्हें अपने घर के लक्ष्मी पूजन या सोसायटी के दीपोत्सव में विशेष रूप से आमंत्रित कीजिए। उन्हें महसूस होना चाहिए कि वे आज भी हमारे उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- एक दीया उनके द्वार पर: यदि पड़ोस में कोई वृद्ध दंपती अकेले रहता है, तो उनकी सहमति से मुख्य द्वार को सजाने या वहां दीये रखने में हाथ बंटाइए। यह छोटा-सा कदम उनके जीवन में अपनेपन की रोशनी ला सकता है। सबसे जरूरी है कि उन्हें लगे कि वे उत्सव में शामिल हैं, किसी की दया के पात्र नहीं।
- सुरक्षा का अहसास: एक सजग पड़ोसी के नाते उनकी सहमति से उनके किसी आपातकालीन संपर्क की जानकारी हमारे पास होनी चाहिए। सुबह-शाम उनका हालचाल लेना हमारी आदत में शुमार होना चाहिए, ताकि उन्हें भरोसा रहे कि जरूरत पड़ने पर आसपास कोई मदद के लिए मौजूद है। पड़ोस की यह जिम्मेदारी केवल दीपावली तक सीमित न रहे। आवासीय समितियां और स्वयंसेवी समूह बुजुर्गों के लिए नियमित मिलन, स्वास्थ्य जांच और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित कर सकते हैं।
उत्सव की वास्तविक परिभाषा
दीपावली केवल मिट्टी के दीये जलाने, नए परिधान पहनने या सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों की बाढ़ लाने का नाम नहीं है। त्योहार की असली सार्थकता इसी बात में निहित है कि हमारे रहते उम्र के इस पड़ाव पर खड़ा कोई भी बुजुर्ग खुद को उपेक्षित या असहाय महसूस न करे।
जब तक हम किसी उदास चेहरे पर मुस्कान की रोशनी नहीं बिखेर सकते, तब तक हमारे अपने घरों में जलाए गए दीयों का उजाला अधूरा है। उत्सव की पूर्णता केवल अपना घर रोशन करने में नहीं, किसी दूसरे के जीवन का अंधेरा बांटने में है।






No Comment! Be the first one.