हर बारिश में क्यों जमा हो जाता है सड़कों पर पानी?
बारिश हर साल आती है और हर साल शहर डूब जाते हैं। सवाल बादलों से नहीं, व्यवस्था से है। आखिर राजस्थान, जिसने सदियों पहले जल प्रबंधन की मिसाल कायम की थी, वही आज वर्षा जल निकासी की सबसे बुनियादी व्यवस्था...

मानसून : दशकों से अनसुलझा जलभराव संकट
हर साल बारिश आती है। हर साल शहर डूबते हैं। सड़कें तालाब बन जाती हैं, घरों में पानी घुस जाता है और बाजारों की रफ्तार थम जाती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आजादी के करीब आठ दशक बाद भी हम बारिश के पानी को उसका रास्ता क्यों नहीं दे पाए?
अपने करीब तीस वर्षों के पत्रकारिता जीवन में शायद ही कोई ऐसा मानसून देखा हो, जब जलभराव पर लिखना न पड़ा हो। हर बार लगा कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। इस विषय पर कई बार लिखा। तीखे सवाल उठाए, सुझाव दिए और जनता की पीड़ा सामने रखी। लेकिन हर बरसात के साथ वही तस्वीर फिर लौट आती है।
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मैं प्रदेश के कई शहरों में रहा हूं। जयपुर हो, जोधपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर या उदयपुर, बरसात आते ही लगभग हर बड़े शहर की तस्वीर एक जैसी नजर आती है। थोड़ी सी तेज बारिश होती है और सड़कें तालाब बन जाती हैं। घरों में पानी घुस जाता है, बाजारों की रफ्तार थम जाती है और आम आदमी की परेशानी शुरू हो जाती है।
समस्या व समाधान सबको पता है, पर गलती नहीं सुधरती
यह समस्या नई नहीं है। दशकों से हर मानसून में यही हाल होता है। सरकारें बदलीं, अधिकारी बदले, योजनाएं बनीं, करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन जल निकासी व्यवस्था नहीं सुधरी। इसलिए इस समस्या का दोष किसी एक सरकार पर डालकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। विडंबना यह है कि समस्या भी सबको पता है और समाधान भी, फिर भी हर साल वही गलती दोहराई जाती है।
हमारे पूर्वजों ने पानी को दुश्मन नहीं, संसाधन माना था। हमने उसे समस्या बना दिया। जयपुर की पारंपरिक जल संरचनाएं, जोधपुर के झालरे, बीकानेर के टांके, उदयपुर की झीलें और प्रदेश की बावड़ियां केवल पानी बचाने का साधन नहीं थीं, बल्कि जल निकासी और भूजल संरक्षण का भी मजबूत माध्यम थीं।
प्राकृतिक जलमार्ग अवरुद्ध हुए
आधुनिक विकास की दौड़ में हमने प्राकृतिक नालों, जलमार्गों और जलग्रहण क्षेत्रों पर निर्माण कर दिया। अंधाधुंध कंक्रीटीकरण से मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता लगातार घटती गई। जहां पहले वर्षा का पानी जमीन में समा जाता था, वहां अब वह बहने के लिए रास्ता खोजता है। लेकिन उसके प्राकृतिक रास्ते भी हमने बंद कर दिए। इसलिए पानी आखिरकार सड़कों, गलियों और घरों की ओर बढ़ जाता है।
इसका नुकसान केवल कुछ घंटों की असुविधा तक सीमित नहीं है। जमा पानी मच्छरों का प्रजनन केंद्र बन जाता है और डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियां फैलने लगती हैं। सड़कें टूटती हैं, वाहन खराब होते हैं, कारोबार प्रभावित होता है और हर साल करोड़ों रुपये मरम्मत पर खर्च होते हैं। आखिर जनता के टैक्स का पैसा बार-बार उसी समस्या पर क्यों खर्च किया जाए?
बारिश से पहले नहीं खुलती नींद
एक कमी और साफ दिखाई देती है। हमारे यहां बारिश के बाद तो अफसर और जनप्रतिनिधि जलभराव वाले क्षेत्रों का दौरा करते हैं, लेकिन बारिश से पहले शायद ही कभी यह जांच होती है कि नालियां साफ हैं या नहीं, प्राकृतिक जलमार्ग खुले हैं या नहीं और नई कॉलोनियों में जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं। आज दुनिया के कई शहर ड्रोन सर्वे और डिजिटल मैपिंग से पहले ही जलभराव वाले स्थान चिन्हित कर लेते हैं। हमारे यहां तकनीक, विशेषज्ञ और संसाधनों की कमी नहीं है। कमी केवल समय पर योजना बनाकर उसे ईमानदारी से लागू करने की है।
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। यदि किसी शहर में हर साल वही सड़कें डूबती हैं, वही कॉलोनियां जलमग्न होती हैं और वही नाले जाम मिलते हैं, तो आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या हर मानसून के बाद केवल समीक्षा बैठक कर लेना ही जवाबदेही है?
जलमार्गों से अतिक्रमण हटाना जरूरी
समाधान मुश्किल नहीं हैं। हर शहर का वैज्ञानिक ड्रेनेज मास्टर प्लान बनाया जाए। प्राकृतिक नालों और जलमार्गों से अतिक्रमण हटाया जाए। वर्षा जल निकासी और सीवरेज व्यवस्था अलग-अलग हो। मानसून से पहले नालों की सफाई का स्वतंत्र एजेंसी से सत्यापन कराया जाए। शहरों में खुले मैदान, पार्क और हरित क्षेत्र सुरक्षित रखे जाएं, ताकि वर्षा का पानी जमीन में समा सके। साथ ही नालों पर अतिक्रमण और उनमें कचरा फेंकने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी जरूरी है।
अब समय आ गया है कि हर मानसून के बाद अफसोस जताने के बजाय मानसून से पहले तैयारी का हिसाब मांगा जाए। क्योंकि सवाल केवल इतना नहीं है कि शहर में पानी क्यों भर गया। असली सवाल यह है कि आजादी के करीब आठ दशक बाद भी हम बारिश के पानी को उसका रास्ता क्यों नहीं दे पाए। जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक हर मानसून हमें यही याद दिलाता रहेगा कि कमी बारिश में नहीं, व्यवस्था में है।





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