सीमाओं से गलियों तक फैलता नशे का जाल
डॉ भुवनेश जैन,
पूर्व निदेशक,
मेरा युवा भारत, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार
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दुनिया भर में नशे की बढ़ती लत अब वैश्विक जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय की विश्व ड्रग रिपोर्ट-2025 के अनुसार वर्ष 2023 में लगभग 32 करोड़ लोगों ने किसी न किसी नशीले पदार्थ का सेवन किया। हैरानी की बात यह है कि इसमें शराब और तंबाकू जैसे नशे तो शामिल ही नहीं हैं। वर्ष 2013 की तुलना में यह संख्या काफी अधिक है और वैश्विक आबादी के लगभग छह प्रतिशत के बराबर पहुंच चुकी है।
मादक पदार्थों की बढ़ती मांग और इससे जुड़े अपराधी गिरोहों के कारण दुनिया में नशे के अवैध कारोबार और तस्करी का जाल अत्यंत तेजी से फैल रहा है। इस जाल में फंसने वालों में सबसे अधिक किशोर और युवा हैं। यह अब केवल कानून-व्यवस्था का मसला नहीं रहा। यह वैश्विक जनस्वास्थ्य का गहराता संकट बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि 15 से 16 वर्ष आयु वर्ग के किशोर तेजी से नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। इनकी संख्या 15-64 आयु वर्ग द्वारा किए जा रहे कुल ड्रग सेवन करने वालों के बराबर या उससे अधिक हो गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस उम्र में मस्तिष्क का विकास जारी रहता है और नशीले पदार्थ सीधे उस हिस्से को प्रभावित करते हैं जो निर्णय लेने, जोखिम समझने और व्यवहार नियंत्रित करने से जुड़ा होता है। चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो आवेगों पर नियंत्रण के लिए उत्तरदायी मस्तिष्क का अग्र भाग लगभग 25 वर्ष की आयु तक पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता। नशे के तत्व इसी अधूरे विकास का लाभ उठाकर किशोरों की निर्णय क्षमता और आत्मनियंत्रण को कमजोर कर देते हैं। यही कारण है कि किशोरों में नशे की लत जल्दी विकसित होती है और इससे मानसिक अवसाद, हिंसक प्रवृत्ति, आत्महत्या, पढ़ाई से दूरी तथा समयपूर्व मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। विश्व स्तर पर किशोरों में नशीले पदार्थों के बढ़ते सेवन को अब ‘मौन महामारी’ कहा जाने लगा है।
भारत भी अछूता नहीं
भारत भी इस खतरे से अछूता नहीं है। अंतरराष्ट्रीय नशा तस्करी गिरोह भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों और युवाओं को निशाना बना रहे हैं। देश के भीतर कृत्रिम नशीले पदार्थों के अवैध कारखाने लगातार सामने आ रहे हैं। तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक नरेंद्र मीना के नेतृत्व में बाड़मेर जिले के धोरीमन्ना, रामसर, सेड़वा और बींजराड़ क्षेत्र में अवैध कृत्रिम नशीले पदार्थों की फैक्ट्रियां पकड़ी गई थीं, जिनका संबंध बड़े शहरों और अंतरराज्यीय गिरोहों से बताया जाता है। अब तस्कर केवल पारंपरिक अफीम या डोडा-चूरा तक सीमित नहीं हैं बल्कि मेफेड्रोन जैसे कृत्रिम नशीले पदार्थों के उत्पादन केंद्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर अलग-अलग नामों से बेचा जाता है।
भारत में तेजी से विकसित हो रहे सड़क और परिवहन तंत्र का दुरुपयोग तस्कर भी कर रहे हैं। ‘भारतमाला’ जैसी परियोजनाओं ने जहां यातायात को गति दी है वहीं कई इलाकों में नशा तस्करी के नए मार्ग भी सक्रिय हुए हैं। सीमावर्ती राज्यों पंजाब, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान से आने वाली हेरोइन और अफीम सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह तस्करी ‘स्वर्ण अर्धचंद्र’ मार्ग के जरिए होती है जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान शामिल हैं। वर्ष 2024 में सीमा सुरक्षा बल ने पंजाब सीमा पर सैकड़ों किलो हेरोइन जब्त की जो इस खतरे की गंभीरता को दर्शाती है। अब इस तस्करी में तकनीक का समावेश हो गया है और सीमा पार से मानव रहित उड़न यंत्रों के माध्यम से नशे की खेप गिराई जा रही है जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई और जटिल चुनौती बन चुकी है।
दूसरा बड़ा मार्ग ‘स्वर्ण त्रिकोण’ है जिसमें म्यांमार, लाओस और थाईलैंड से हेरोइन तथा मेथाम्फेटामाइन जैसे कृत्रिम नशीले पदार्थ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचते हैं। मणिपुर, मिजोरम और असम के कई क्षेत्रों में स्कूल और महाविद्यालय जाने वाले किशोर इसकी चपेट में आ रहे हैं। इसके अलावा समुद्री रास्तों से गुजरात, केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र भी तस्करों के निशाने पर हैं। अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के मार्ग अब अंतरराष्ट्रीय नशा तस्करी गिरोहों के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं। तस्कर अब समुद्री और जमीनी मार्गों के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों का भी उपयोग कर रहे हैं। गुप्त अंतरजाल और आभासी मुद्रा के माध्यम से होने वाले लेन-देन ने पहचान छिपाना आसान कर दिया है जिससे नशीले पदार्थ अब सामान्य पार्सल की तरह किशोरों तक पहुंच रहे हैं।
किशोरों के व्यवहार पर पैनी नजर जरूरी
किशोरों के नशे की ओर बढ़ने के पीछे अनेक सामाजिक और मानसिक कारण हैं। दोस्तों का दबाव, जिज्ञासा, अकेलापन, पारिवारिक तनाव, बेरोजगारी, पढ़ाई और भविष्य की चिंता, सामाजिक माध्यमों का प्रभाव तथा रचनात्मक गतिविधियों से दूरी प्रमुख कारण हैं। कई बार निम्न आय वर्ग के किशोर सुधार द्रव, रासायनिक पतला करने वाले द्रव और गोंद जैसे सस्ते सूंघने वाले पदार्थों से शुरुआत करते हैं जो उनके फेफड़ों और तंत्रिका तंत्र को स्थायी रूप से क्षति पहुंचा देते हैं। माता-पिता शुरुआती संकेत पहचान नहीं पाते। व्यवहार में अचानक बदलाव, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में गिरावट, नींद की समस्या, आंखों में लालिमा और पैसों की असामान्य मांग जैसे संकेतों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
इस खतरे से बाहर निकलने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। जागरूकता, संवाद और सामाजिक भागीदारी सबसे जरूरी हथियार हैं। परिवारों को बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण संवाद बढ़ाना होगा। स्कूलों और महाविद्यालयों में नशा मुक्ति पर नियमित परामर्श, खेल गतिविधियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध करानी होगी। इसके साथ ही सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय नशा मुक्ति सहायता सेवा जैसी सुविधाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार भी आवश्यक है, ताकि पीड़ित और उनके परिजन बिना सामाजिक झिझक के सहायता प्राप्त कर सकें।
हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को देश और युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बताते हुए वर्ष 2047 तक ‘नशा मुक्त भारत’ का लक्ष्य दोहराया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नशा तस्करी केवल अपराध नहीं बल्कि राष्ट्र की सामाजिक और आर्थिक शक्ति को कमजोर करने वाली चुनौती है। गृहमंत्री ने राज्यों, सुरक्षा एजेंसियों और समाज के विभिन्न वर्गों से समन्वित अभियान चलाने का आह्वान करते हुए युवाओं को नशे से बचाने को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया।
युवाओं को आगे आना होगा
हर किशोर और युवा स्वयं भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है। मोहल्लों, गांवों और शिक्षण संस्थानों में युवा मंडल बनाकर खेल, संगीत, कला और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ाव बढ़ाया जा सकता है। नुक्कड़ नाटक, समूह चर्चा और जनजागरण कार्यक्रमों के माध्यम से नशे के दुष्परिणामों को समझाया जाना चाहिए। संदिग्ध गतिविधियों की सूचना पुलिस और प्रशासन को देना भी सामाजिक जिम्मेदारी है। नशे के शिकार लोगों के प्रति घृणा नहीं बल्कि सहानुभूति और पुनर्वास की भावना जरूरी है। उपचार, परामर्श और पुनर्वास केंद्रों तक पहुंच आसान बनानी होगी।
यदि समाज नए किशोरों को नशे से दूर रखने और नशा पीड़ितों को उपचार से जोड़ने का सामूहिक प्रयास करे तो नशीले पदार्थों की मांग को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नशा तस्करों का जाल भले ही मजबूत दिखाई देता हो लेकिन जागरूक समाज, जिम्मेदार युवा और सक्रिय परिवार मिलकर इसे कमजोर कर सकते हैं। राह कठिन जरूर है, लेकिन जागरूकता और सामूहिक प्रयास से इस खतरे पर काबू पाया जा सकता है। किशोर सुरक्षित रहेंगे तभी देश का भविष्य मजबूत बनेगा और भारत सच मायनों में नशा मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।







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