अब सेंचुरी आने ही वाली है
मैं समझ गया, देश में दो चीजें स्थायी हैं- एक मानसून की भविष्यवाणी और दूसरी कांग्रेस की समीक्षा बैठक। मैं लोकतंत्र का पुराना मरीज हूं, सो भीतर घुस...

बोल हरि बोल – पीएम मोदी की सात अपील के बाद राहुल गांधी के साथ ‘आत्म-साक्षात्कार’
हरीश मलिक,
वरिष्ठ व्यंग्यकार और स्तंभकार
राजधानी में कोटला रोड पर उस दिन बड़ी हलचल थी। मैंने देखा कि कांग्रेस मुख्यालय के बाहर कुछ नेता ऐसे चेहरे बनाकर घूम रहे थे, जैसे रिजल्ट आने के बाद छात्र मार्कशीट नहीं, कोई दूसरी ही रिपोर्ट लेने आए हों। मैंने एक कांग्रेस नेता को सिर पकड़कर बैठे देखा तो पूछा- ‘क्या हुआ?’
वह बोला- ‘कुछ नहीं, बस चुनाव परिणाम आया है।’
मैं समझ गया, देश में दो चीजें स्थायी हैं- एक मानसून की भविष्यवाणी और दूसरी कांग्रेस की समीक्षा बैठक। मैं लोकतंत्र का पुराना मरीज हूं, सो भीतर घुस गया।
राहुल गांधी एक बड़े से सोफे पर धंसे बैठे थे। सामने हार की फाइलें थीं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और न जाने कौन-कौन सी हारें। मैंने पूछा, ‘क्या कर रहे हैं?’ जैसे डॉक्टर एक्स-रे देखकर रिश्तेदारों को धीरे-धीरे सच बताता है। वे भी धीरे से बोले, ‘मैं सेंचुरी की प्रैक्टिस कर रहा हूं। पार्टी कह रही है कि थोड़ा संभलकर खेलो, लेकिन मैं कहता हूं- रिकॉर्ड तो बनना ही चाहिए।’
मैंने पूछा- ‘जीत का?’
वे बोले- ‘नहीं, हार का। जीत तो कई लोग लेते हैं, लेकिन लगातार हारकर भी आत्मविश्वास बनाए रखना बड़ा त्याग है।’ इतने में ही एक नेता जोर देकर बोला- ‘सर, बीजेपी चीटिंग कर रही है।’
राहुल गंभीरता से सिर हिलाकर बोले- ‘हां, यह सच है। बीजेपी चुनाव नहीं लड़ती, ऑपरेशन करती है। हम लोग अभी हार का कारण खोजते रहते हैं और उधर वे अगला मुख्यमंत्री खोज लेते हैं। पता नहीं इनको लोकतंत्र में इतनी जल्दी क्या है?’
उन्होंने पंजाब का उदाहरण दिया। बोले- ‘देखो न, पश्चिम बंगाल जीतते ही आम आदमी पार्टी के सांसद तक बीजेपी में चले गए। चड्ढा एंड कंपनी बोरिया-बिस्तर समेटकर उधर से खेलने लगी। अभी कल तक साथ बैठकर क्रांति की बातें करते थे, आज गा रहे हैं- हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है।’
उसी समय टीवी पर प्रधानमंत्री मोदी की अपील चल रही थी- पेट्रोल बचाइए, अनावश्यक विदेश यात्राएं टालिए, सोना कम खरीदिए, देशहित में संयम बरतिए।
राहुल जोर से बोले- ‘ये क्या उपदेश है? आदमी पेट्रोल भी न जलाए, विदेश भी न जाए, सोना भी न खरीदे- फिर लोकतंत्र बचेगा कैसे?’
मैंने टोका, ‘वैश्विक संकट का समय है। यह विदेशी मुद्रा बचाने की कोशिश है।’
वे गरजकर बोले- ‘तो फिर कांग्रेस इसका विरोध करेगी। हर कांग्रेसी एक-एक किलो सोना खरीदेगा। यही हमारा लोकतांत्रिक प्रतिरोध होगा।’
मैंने कहा, ‘इतना सोना आएगा कहां से?’
वे मुस्कुराए और बोले- ‘अरे भाई, आलू से। हम इतना आलू उगाएंगे कि इधर से आलू डालेंगे और उधर से सोना निकलेगा।’
फिर विदेश यात्रा का मुद्दा आया। मैंने कहा, ‘प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि गैर-जरूरी विदेशी यात्राएं टालिए।’
राहुल भावुक होकर बोले- ‘देखिए, चुनाव हारने के बाद विदेश जाना मानसिक स्वास्थ्य का विषय है। हारने के बाद विदेश जाना नेता का मौलिक अधिकार है। अगर यहीं रहे तो हर गली, हर पोस्टर, हर एग्जिट पोल उसे डिप्रेशन में डाल देगा। विदेश जाकर आदमी खुद को फिर से खोजता है।
मैंने पूछा, ‘कहां खोजता है?’ वे बोले ‘कभी बैंकॉक में, कभी लंदन में, कभी इटली में। लोकतंत्र की आत्मा बहुत वैश्विक होती है।’
‘वर्क फ्रॉम होम पर आपका क्या विचार है’- मैंने पूछा।
राहुल ने तपाक से कहा- ‘वर्क फ्रॉम होम लागू करो।’ मैं चौंका- ‘राजनीति में भी?’
वे बोले- ‘क्यों नहीं? देखिए, कांग्रेस में ऐसा कौन-सा उत्पादन होता है जिसके लिए रोज ऑफिस जाना पड़े? घर में डॉगी के साथ खेलिए, दो-तीन ट्वीट कर दीजिए, शाम को दो नेताओं को डांट दीजिए, संगठन चल जाता है।’
मुझे लगा भारत का कॉर्पोरेट सेक्टर अभी कांग्रेस की राजनीति से बहुत पीछे है।
मैंने जाते-जाते पूछा- ‘प्रधानमंत्री की अपीलों पर आपका अंतिम विचार?’
राहुल कुर्सी से उठे, खिड़की की ओर देखा और दार्शनिक मुद्रा में बोले- ‘देखिए, मोदी जी देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि देश आत्म-मनोरंजक बना रहे। जनता पेट्रोल बचाएगी तो घूमेगी कैसे? सोना नहीं खरीदेगी तो शादी में दिखाएगी क्या? विदेश नहीं जाएगी तो इंस्टाग्राम पर डालेगी क्या?’
फिर वे थोड़ा रुककर बोले- ‘हालांकि एक बात माननी पड़ेगी। कांग्रेस चाहे विरोध कितना भी करे, मोदी जी की अपीलें लोगों को समझ में जल्दी आ जाती हैं। हमारी प्रेस कॉन्फ्रेंस, इंस्टा रील से ज्यादा उनकी मेलोडी टॉफी वायरल हो जाती है।’
मैं बाहर निकला। कांग्रेस कार्यालय के बाहर एक पोस्टर लगा था- ‘हार से मत घबराओ।’
नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था- ‘सेंचुरी बस आने ही वाली है।’
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चलते-चलते: कॉकरोच जनता पार्टी के मुखिया अमेरिका में बैठकर भारत की जेन जी को आलसी, निकम्मा, कामचोर और ऐसा बेरोजगार युवा बता रहा है, जो इंटरनेट का लती है। जिस देश की नई पीढ़ी यूपीआई, चंद्रयान बना रही हो। स्टार्ट-अप/यूनिकॉर्न खड़े कर रही हो। ओलंपिक में तिरंगा लहरा रही हो, उसे ‘कामचोर-आलसी’ कहना, अपने ही देश के युवा सपनों का अपमान करना है।





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