कांग्रेस की वापसी और भीतर की गुटबाजी के बीच नई नेतृत्व परीक्षा
केरल में चुनाव परिणाम के 14 दिन बाद आखिरकार कांग्रेस नेता वडास्सेरी दामोदरन सतीशन ने मुख्यमंत्री पद संभाल लिया है। उनके साथ 19 और लोगों ने भी मंत्री पद की शपथ ली है। इनमें कांग्रेस के 11, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के 5 और केरल कांग्रेस (जोसेफ गुट), केरल कांग्रेस (जैकब गुट), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी तथा कम्युनिस्ट मार्क्सवादी पार्टी से एक-एक विधायक मंत्री बने हैं। 14 विधायक पहली बार मंत्री बनाए गए हैं। मंत्रिमंडल में दो महिलाओं और अनुसूचित जाति से दो लोगों को शामिल किया गया है। खास बात यह कि राज्य में मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे रमेश चेन्निथला को गृह मंत्री बनाया गया है। आमतौर पर गृह विभाग मुख्यमंत्री अपने पास रखते हैं। यही नहीं, राज्य में कांग्रेस के तीसरे गुट केसी वेणुगोपाल के 7 विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। कहने का मतलब यह कि राज्य की जमीनी हकीकत को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने वीडी सतीशन को भले ही मुख्यमंत्री पद पर आसीन कर दिया है, उनकी तगड़ी घेराबंदी भी कर दी है। वह राज्य के मुखिया तो रहेंगे, लेकिन राज-काज चलाने के लिए उन्हें रमेश चेन्निथला और केसी वेणुगोपाल से संबंध बनाकर रखना होगा। इसके अलावा सहयोगी दलों का दबाव अलग से झेलना होगा।
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सतीशन राज्य के 13वें मुख्यमंत्री बने हैं। राज्य में 64 वर्षों बाद किसी मुख्यमंत्री ने पूरी कैबिनेट के साथ शपथ ली है। इससे पहले राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री रहे आर. शंकर ने 1962 में पूरी कैबिनेट के साथ शपथ ली थी। यह अलग बात है कि महज दो साल बाद अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाने के कारण उनकी सरकार गिर गई थी।
सतीशन कैसे बने केरल के किंग
एर्नाकुलम में 12 अगस्त 1964 को साधारण परिवार में जन्मे वीडी सतीशन की पहचान एक जमीनी नेता की रही है। ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और एलएलएम किया। पढ़ाई के दौरान ही वह छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए। कांग्रेस के छात्र संगठन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) से जुड़ने के बाद सतीशन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाद में वह यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव बने। 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें राज्य की पारावूर सीट से उम्मीदवार बनाया, लेकिन महज 1100 वोटों से हार गए। 2001 से उसी सीट से लगातार छठवीं बार विधायक हैं। इससे उनकी लोकप्रियता और जमीनी पकड़ का पता चलता है। कांग्रेस ने उन्हें 2021 में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया था। सतीशन ने पूरे प्रदेश का कई बार दौरा किया। विधानसभा में भी हमेशा मुखर रहे, लेकिन गुटबाजी से दूर रहे। यही कारण है कि इस साल कांग्रेस विधायक दल की बैठक में उन्हें महज 6 विधायकों का ही समर्थन मिला था। जनता से जुड़ाव और सहयोगी दलों के दबाव के आगे कांग्रेस आलाकमान को झुकना पड़ा।
कमजोर होती कांग्रेस में कलह
कांग्रेस में कलह और गुटबाजी सिर्फ केरल में ही नहीं है। पीछे मुड़कर देखें तो राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसे आपसी कलह के कारण ही सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। मध्यप्रदेश, दिल्ली और बिहार में गुटबाजी ने ही कांग्रेस का बंटाधार किया। फिलहाल, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस की सरकारों का हाल देख लीजिए। कर्नाटक में डीके शिवकुमार की मेहनत की फसल पर सिद्धारमैय्या राज कर रहे हैं और शिवकुमार अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। हिमाचल में अगले साल चुनाव है। वहां वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की नाक में दम किए हुए हैं।
केरल में भी वीडी सतीशन के चयन में 10 दिन का समय इसलिए लग गया कि राहुल गांधी अपने सिपहसालार केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। वहां कांग्रेस उम्मीदवारों को टिकट भी वेणुगोपाल की सहमति से ही दिया गया था। वह तो भला हो वायनाड के निवासियों का जिन्होंने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर दिया और कहा कि वेणुगोपाल मुख्यमंत्री बने तो वायनाड को अमेठी बना दिया जाएगा। तब जाकर कांग्रेस आलाकमान को वीडी सतीशन के नाम पर मुहर लगानी पड़ी। दरअसल, कमजोर शरीर में बीमारियां और अभावग्रस्त घर में कड़वाहट हो ही जाती है। कांग्रेस का भी यही हाल है।
पहली ही कैबिनेट बैठक में पांच प्रस्ताव पारित
वीडी सतीशन ने शपथ ग्रहण के दिन ही अपनी पहली कैबिनेट बैठक में पांच महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मुहर लगाकर यह दिखा दिया कि उनकी सरकार जनहित के कार्यों पर कोई समझौता नहीं करेगी। इन प्रस्तावों में आगामी 15 जून से राज्य परिवहन निगम की बसों में महिलाओं की मुफ्त यात्रा तथा राज्य में बुजुर्गों के लिए एक विशेष विभाग बनाने की घोषणा शामिल है। इसके अलावा राज्य में आशा कार्यकर्ताओं का मानदेय 3 हजार रुपए तत्काल प्रभाव से बढ़ा दिया गया है। अब उन्हें हर माह 12 हजार मिलेंगे। दरअसल, कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने चुनावों के दौरान सरकार बनने पर इन तीनों कामों को करने का जनता से वादा किया था। साथ ही 2023 में ‘नव केरल यात्रा’ के दौरान युवा कांग्रेस नेताओं पर हुए हमलों की एसआईटी से जांच कराने और राज्य की वित्तीय स्थिति और राजकोष पर श्वेत पत्र जारी करने की मंजूरी दी गई है।
केरल की दलीय स्थिति
केरल के मतदाताओं ने इस बार 140 सदस्यों वाले विधानसभा के चुनाव में पिछले एक दशक से सत्ता पर काबिज वामदलों के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को बेदखल कर दिया। इस बार वहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को 26, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) को 6 और लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को एक सीट पर समेट दिया। यानि एलडीएफ को कुल 35 सीटों पर विजय मिली। दूसरी तरफ कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ को 102 सीटें देकर सरकार बनाने का जनादेश दिया। यूडीएफ के दलों में कांग्रेस को 63, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को 22, केरल कांग्रेस (जोसेफ गुट) को 7, जबकि केरल कांग्रेस (जैकब गुट) को एक, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को 3, सीएमपी को एक, आरएमपी को एक और यूडीएफ समर्थित निर्दलीयों को 4 सीटों पर विजय मिली है। राज्य में भाजपा को पहली बार तीन सीटें मिली हैं। कहने का मतलब यह कि बिना गठबंधन के किसी एक दल के लिए सरकार बनाना संभव नहीं था।
सतीशन की स्वीकार्यता
ऐसा कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की स्वीकार्यता राज्य की सभी पार्टियों में है। ऐसा इसलिए कि जब कांग्रेस के नेता उनकी राह में कांटे बिछा रहे थे, तब यूडीएफ के सहयोगी दलों ने दो टूक कह दिया कि उन्हें सतीशन के अलावा कोई स्वीकार्य नहीं है। इसलिए आखिर में थक-हारकर कांग्रेस को उनके नाम पर मुहर लगानी पड़ी। दूसरे, मुख्यमंत्री पद की शपथ से पहले जब सतीशन राज्य के निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से मिलने उनके घर गए तो विजयन परिवार सहित उनके इंतजार में घर के बाहर खड़े मिले और उनका स्वागत ऐसे किया मानो परिवार का कोई सदस्य लंबे प्रवास के बाद घर आया हो। सतीशन के शपथ ग्रहण में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू और कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत सभी दलों के नेताओं की उपस्थिति रही। इनमें पिनराई विजयन समेत पूर्व केन्द्रीय मंत्री और राज्य भाजपा के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर शामिल थे। बहरहाल, सतीशन की असली परीक्षा तो आने वाले दिनों में होगी।
तमिलनाडु में विजय, सिर मुंडाते ही ओले गिरे
तमिलनाडु में पिछले 64 वर्षों से डीएमके और एआईडीएमके के बीच घूमती सत्ता की राजनीति को पीछे छोड़ पहली बार चुनावी मैदान में उतरे और 108 सीटों पर ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री बने सी जोसेफ विजय को सिर मुड़ाते ही ओले पड़े हैं। दरअसल, विजय ने अपने ज्योतिषी राधान पंडित को अपना ओएसडी नियुक्त कर दिया था, जिसका चौतरफा विरोध होने लगा। विपक्ष के अलावा सत्ता पक्ष के लोगों ने भी खुलकर इसकी आलोचना की थी। आखिरकार, विजय झुके और राधान पंडित को पद से हटाया।
इसके अलावा, तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम के प्रमुख दिनाकरण ने विजय पर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विजय कहते हैं कि वह घोड़े की रफ्तार से काम करेंगे, जबकि उन्होंने घोड़ा ही मोलभाव करके खरीदा है। दरअसल, दिनाकरण की पार्टी के एकमात्र विधायक एस. कामराज ने बिना शर्त विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम को समर्थन दिया है। हालांकि दिनाकरण ने कामराज को पार्टी से निष्कासित कर दिया है और अब उनके टीवीके में शामिल होने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है। विजय पर एआईडीएमके और डीएमके ने भी हॉर्स ट्रेडिंग के आरोप लगाए हैं। इससे पहले, विजय के शपथ ग्रहण समारोह में तमिलनाडु के राज्य गीत ‘तमिल थाई वाजथु’ से पहले राष्ट्र गान ‘जन गण मन’ और ‘वंदेमातरम्’ बजाने पर भी विवाद हो गया। सहयोगी दलों के अलावा डीएमके ने भी इस पर आपत्ति जताई। विरोध करने वालों का कहना है कि राज्य के सम्मान के लिए तमिल राज्य गीत सबसे पहले बजाया जाना चाहिए था। हालांकि मुख्यमंत्री का कहना है कि शपथ समारोह के मेजबान राज्यपाल थे और उनके कहने पर ही ऐसा किया गया। इसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं। इनमें विजय की तमिलगा वेट्री कड़गम को 108 सीटों पर विजय मिली। विजय खुद दो सीटों से निर्वाचित हुए थे। इसलिए उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। वहां बहुमत के लिए 118 विधायकों के समर्थन की दरकार है। इसलिए राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर ने उनको सरकार बनाने के लिए काफी इंतजार करवाया। सबसे पहले कांग्रेस ने अपने पांच विधायकों का समर्थन विजय को दिया। फिर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, सीपीआई, सीपीआईएम, वीसीके ने अपने 2-2 विधायकों का समर्थन दिया। बता देना जरूरी है कि यह सभी दल डीएमके के साथ गठजोड़ में चुनाव मैदान में थे। इस तरह विजय को कुल 120 विधायकों का समर्थन मिला। लेकिन फ्लोर टेस्ट में विजय को कुल 144 वोट मिले। एआईडीएमके के 23 और अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम के एक विधायक विजय के पाले में आ गए। डीएमके को इस बार 59 सीटें ही मिली थीं, जबकि एआईडीएमके को 47 सीटें मिली थीं। कयास हैं कि आनेवाले दिनों में एआईडीएमके कुछ और विधायक भी विजय के पाले में जा सकते हैं, ताकि उन पर दल बदल कानून प्रभावी न हो सके। राज्य में भाजपा को महज एक सीट मिली है।







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