पेपर लीक प्रबंधन कला : मेहनत छोड़ो, नेटवर्क जोड़ो!
राजस्थान कभी वीरों, लोकसंस्कृति और शिक्षा नगरी के लिए पहचाना जाता था, लेकिन अब लगता है कि यहां पेपर प्रबंधन कला भी तेजी से विकसित हो रही है। नीट जैसी कठिन परीक्षा, जिसमें लाखों विद्यार्थी दिन-रात एक...

बात बेलगाम
राजस्थान कभी वीरों, लोकसंस्कृति और शिक्षा नगरी के लिए पहचाना जाता था, लेकिन अब लगता है कि यहां पेपर प्रबंधन कला भी तेजी से विकसित हो रही है। नीट जैसी कठिन परीक्षा, जिसमें लाखों विद्यार्थी दिन-रात एक कर देते हैं, वहां कुछ लोगों ने पढ़ाई का नया शॉर्टकट खोज लिया। वह है गेस पेपर। मजेदार बात यह रही कि पेपर को सीधे लीक नहीं कहा गया। उसे बड़े संस्कारी अंदाज में गेस पेपर बताया गया, ताकि पकड़े जाने पर कहा जा सके, हम तो सिर्फ भविष्यवाणी कर रहे थे! और भविष्यवाणी भी ऐसी कि 120 सवाल हूबहू निकल आए। ज्योतिषाचार्य भी इतनी सटीक भविष्यवाणी करने से पहले दो बार कुंडली देख लें। अब जांच एजेंसियां नासिक, गुरुग्राम, जयपुर और सीकर के बीच तार जोड़ रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कोई मेडिकल प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि देशव्यापी फ्रेंचाइजी नेटवर्क चल रहा हो। कहीं टेलीग्राम यूनिवर्सिटी सक्रिय है तो कहीं व्हाट्सऐप कोचिंग सेंटर। सबसे ज्यादा चोट उन ईमानदार विद्यार्थियों को लगी है, जिन्होंने किताबों पर भरोसा किया, न कि सीक्रेट पीडीएफ पर। अब छात्र पढ़ाई से ज्यादा यह समझने लगे हैं कि सफलता के लिए मेहनत जरूरी है या सही व्हाट्सऐप ग्रुप में होना।
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रोमियो रडार ऑन है, संभल जाइए!
जोधपुर में अब मनचलों के दिन वैसे ही कठिन हो गए हैं, जैसे बिना हेलमेट वाले बाइक चालक के सामने ट्रैफिक पुलिस। फर्क बस इतना है कि इस बार चालान जेब का नहीं, इज्जत का कट रहा है। पुलिस कमिश्नरेट पश्चिम की कालिका पेट्रोलिंग टीम ने सादी वर्दी में ऐसा डिकॉय ऑपरेशन चलाया कि फब्तियां कसने वाले खुद फंस गए। जो युवक अब तक खुद को फिल्मी हीरो समझकर मैडम…एक मिनट! कहकर सड़कें नापते थे, वे अचानक पुलिस की जीप में बैठकर जीवन दर्शन समझने लगे। शहर के चौराहों पर अब नई दहशत है। भाई, सामने वाली सच में लड़की है या पुलिस की सरप्राइज पैकेज टीम? इस कार्रवाई ने यह भी साबित कर दिया कि तकनीक के दौर में सीसीटीवी से ज्यादा खतरनाक सादी वर्दी होती है। उधर शरीफ लोग खुश हैं कि कम से कम अब बेटियां बिना फ्री कमेंट्री के कॉलेज जा सकेंगी। लगता है, जोधपुर में अब रोमियोगिरी का मौसम बदल चुका है।
रील वाला डॉन और असली पुलिस
आजकल सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं कर रहे। कोई ट्रेन के आगे नाच रहा है, कोई सांप पकड़कर सेल्फी ले रहा है, और अब जनाब सीधे एमडी ड्रग्स सप्लायर बन बैठे। फर्क बस इतना था कि माल असली नहीं, केवल एडिटिंग असली थी। सांचौर के युवक ने यूट्यूब से वीडियो उठाए, एआई से अपना नंबर चिपकाया और इंस्टाग्राम पर ऐसा रौब जमाया, मानो अंतरराष्ट्रीय तस्करी का ठेका उसी के पास हो। शायद उसे लगा होगा कि फॉलोअर्स बढ़ेंगे, लोग डरेंगे और रील्स वायरल होंगी। रील्स तो वायरल हुईं, लेकिन साथ में पुलिस भी ऑनलाइन हो गई। विडंबना देखिए, लड़का असली ड्रग्स से कोसों दूर था, मगर अभिनय इतना दमदार था कि पुलिस को जांच करनी पड़ गई। अब हालत यह है कि इंस्टाग्राम पर बनने वाला डॉन थाने में बैठकर असली पूछताछ का अनुभव ले रहा है। सोशल मीडिया का यह नया गणित बड़ा विचित्र है। जहां प्रतिभा से ज्यादा कांड जल्दी वायरल होता है। लेकिन युवाओं को समझना होगा कि हर रील मनोरंजन नहीं होती, कुछ सीधे जेल यात्रा का ट्रेलर भी बन जाती हैं।
हरी मिर्च के बाद अब गोभी की बारी!
राजस्थान में अब सब्ज़ियों की पहचान केवल स्वाद से नहीं, सामान से भी होने लगी है। ब्यावर में गोभी के नीचे भारी मात्रा में डोडा पोस्त मिला, तो लोगों को पुरानी घटनाएं याद आ गईं, जब कहीं हरी मिर्च की बोरियों में नशा छिपाकर ले जाया गया, तो कहीं प्याज और फलों की आड़ में तस्करी पकड़ी गई। लगता है तस्करों ने कृषि मंडियों को क्रिएटिव लॉजिस्टिक्स हब मान लिया है। अब गृहिणी सब्ज़ी खरीदते समय यह सोचकर डर जाए कि गोभी ताज़ी है या मालदार! बेचारा किसान मंडी में मेहनत से सब्ज़ी उगाए और तस्कर उसी सब्ज़ी को अपराध का कवच बना लें। अच्छी बात यह है कि पुलिस की नज़र अब केवल सड़क पर दौड़ते वाहनों पर नहीं, बल्कि गोभी के पत्तों के नीचे भी पहुंच रही है। राजस्थान में नशे के खिलाफ लड़ाई अब खेत, खलिहान और सब्ज़ी टोकरी तक आ पहुंची है।
कबूतरों का सपना, इंसानों का इंतज़ार
नगर परिषद बूंदी की आवास योजना अब शायद इंसानों से ज्यादा कबूतरों के लिए उपयोगी साबित हो रही है। जिन फ्लैट्स में वर्षों पहले परिवारों की हंसी गूंजनी थी, वहां आज कबूतरों की गुटरगूं सुनाई देती है। लाभार्थियों ने 2018 से 2020 के बीच पूरी रकम जमा करवाई, किसी ने बैंक से कर्ज लिया तो किसी ने ब्याज पर पैसा उठाया, लेकिन चाबी अब तक फाइलों की कैद में ही बंद है। उधर फ्लैट्स की हालत ऐसी हो गई है मानो वे भी इंतजार करते-करते थक गए हों। कहीं प्लास्टर झड़ रहा है, कहीं रेलिंग टूट रही है और कहीं गेट ही गायब हैं। रात में असामाजिक तत्वों की चहल-पहल देखकर लगता है कि भवनों का अनौपचारिक उद्घाटन हो चुका है। अब बेचारे लाभार्थी किराया भी भर रहे हैं और लोन की किस्त भी। लगता है योजना का नया नारा है घर आपका, इंतजार हमारा!






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