खाली हाथ लौटा ‘अमेरिका फर्स्ट’ : ढहती चौधराहट और भारत-चीन रिश्तों के नए संकेत
हरीश मलिक,
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
- खाली हाथ लौटा ‘अमेरिका फर्स्ट’ : ढहती चौधराहट और भारत-चीन रिश्तों के नए संकेत
- चीन का संदेश- अब अमेरिका अकेला सुपरपावर नहीं
- बीजिंग ने दिखाया, अब अमेरिका आदेश नहीं दे सकता
- चीन का बढ़ता वर्चस्व क्या संकेत देता है?
- ब्रिक्स में भारत के बढ़ते कद की संभावनाएं
- अमेरिका-चीन-रूस की कूटनीतिक गतिविधियों के संदेश
- ईरान संकट और विश्व व्यवस्था की नई प्रतिस्पर्धा
- G-2 अवधारणा और भारत का ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में उभार
- अमेरिका की चौधराहट क्यों टूट रही है?
- भारत-चीन रिश्तों के नए संकेत
- भारत को भी फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने होंगे
- ताइवान पर ट्रंप की चुप्पी बहुत कुछ कहती है
- एशिया के नए युग की शुरुआत में भारत-चीन की भूमिका निर्णायक
- चीन को पुराना समझना अमेरिका की सबसे बड़ी भूल
दुनिया इस समय एक ऐसे विस्फोटक मोड़ पर खड़ी है जहां युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे, बल्कि तेल के कुओं, सेमी कंडक्टर चिप, समुद्री रास्तों, दुर्लभ खनिजों और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी छिड़ चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध अभी पूरी तरह थमा नहीं है, जिसने यूरोप की अर्थव्यवस्था हिला दी है। ईरान और पश्चिम एशिया की आग ने दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को संकट में डाल दिया है। ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच तल्खी अपने चरम पर है। इस बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर दुर्लभ खनिजों तक नई वैश्विक होड़ छिड़ चुकी है। ऐसे खतरनाक दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगभग नौ वर्षों बाद बड़े राजनीतिक शोर-शराबे, वैश्विक उद्यमियों के काफिले और ‘अमेरिका फर्स्ट’ के आक्रामक नारे के साथ बीजिंग पहुंचे।
इस बहुप्रचारित दौरे से यह उम्मीद बनाई गई कि ट्रंप चीन से कोई बड़ा व्यापारिक समझौता लेकर लौटेंगे। चीन को ईरान पर दबाव डालने के लिए राजी करेंगे। दुर्लभ खनिजों की सप्लाई सुनिश्चित करेंगे और ताइवान पर अपनी शर्तें मनवा लेंगे। लेकिन बीजिंग ने इस बार अमेरिकी चौधराहट को वह सम्मान नहीं दिया जो कभी डर की वजह से दिया जाता रहा था। ट्रंप भले ही कैमरों के सामने मुस्कुराते रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह रही कि चीन ने उन्हें सुन तो लिया, मगर माना कुछ भी नहीं। न व्यापार युद्ध खत्म हुआ, न टैरिफ हटे, न ताइवान पर अमेरिका को कोई राहत मिली, न ही ईरान पर चीन अमेरिकी लाइन पर आया। ट्रंप जिस ऐतिहासिक सफलता का दावा कर रहे थे, वह आखिरकार प्रतीकात्मक तस्वीरों और सीमित घोषणाओं तक सिमट गई।
चीन का संदेश- अब अमेरिका अकेला सुपरपावर नहीं
असल में यह यात्रा सिर्फ ट्रंप की व्यक्तिगत विफलता नहीं है। यह अमेरिकी प्रभुत्व पर उठते नए वैश्विक सवालों का संकेत है। वही प्रभुत्व जिसने दशकों तक दुनिया को अपने आदेशों पर चलाने की कोशिश की। बीजिंग में पहली बार साफ दिखाई दिया कि अब दुनिया बदल चुकी है। अब अमेरिका अकेला सुपरपावर नहीं है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफ संदेश दिया कि उसके सामने ऐसा चीन खड़ा है जो उसकी आंखों में आंख डालकर बात करता है। भारत ने पहले ही जता दिया है कि वह अब किसी भी महाशक्ति के दबाव में आने वाला नहीं है और उसकी आर्थिक नाकेबंदी का जवाब भी उसी की भाषा में देता है। इस दौरे की सबसे अहम बात यह रही कि इसने भारत के लिए भी एक नया अवसर पैदा किया है। क्योंकि जब दो महाशक्तियों का टकराव थकान में बदलता है, तब एशिया में संतुलन और सहयोग की नई संभावनाएं जरूर जन्म लेंगी।
बीजिंग ने दिखाया, अब अमेरिका आदेश नहीं दे सकता
चीन दौरे में इस बार तस्वीर बिल्कुल उलट रही। ट्रंप बार-बार व्यापारिक डीलों की बात करते रहे, जबकि शी जिनपिंग लगातार संतुलन, स्थिरता और परस्पर सम्मान की भाषा बोलते रहे। यह शब्द सुनने में सामान्य लग सकते हैं, लेकिन इनके पीछे गहरे संदेश हैं। इसका मतलब चीन साफ कह रहा है कि वह अब अमेरिका को केवल बराबरी का देश मानता है, मालिक नहीं। इस चीनी सोच का सबसे बड़ा संकेत ताइवान मुद्दे पर देखने को मिला। चीन ने साफ चेतावनी दी कि अमेरिका यदि ताइवान में दखल बढ़ाता है तो परिणाम गंभीर होंगे। आश्चर्य की बात यह रही कि ट्रंप इस मुद्दे पर लगभग शांत दिखाई दिए। यह वही अमेरिका है जो कभी दुनिया के हर कोने में लोकतंत्र और सैन्य हस्तक्षेप का झंडाबरदार बना घूमता था। बीजिंग ने यह संकेत जरूर दे दिया कि एशिया अब पहले जैसा एकध्रुवीय प्रभाव स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
चीन का बढ़ता वर्चस्व क्या संकेत देता है?
दरअसल, चीन ने पिछले एक दशक में केवल आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि सैन्य, तकनीकी और भू-राजनीतिक स्तर पर भी अपने प्रभाव का तेजी से विस्तार किया है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, दक्षिण चीन सागर में सैन्य उपस्थिति, अफ्रीका और एशिया में निवेश तथा डॉलर के विकल्प के रूप में युआन को बढ़ावा देना इसी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और पश्चिम एशिया में उलझाव ने चीन को वैश्विक मंच पर अधिक आक्रामक बनने का अवसर दिया। यही कारण है कि कई छोटे और विकासशील देशों में यह चिंता बढ़ रही है कि कहीं अमेरिकी प्रभुत्व की जगह चीनी केंद्रीकरण और आर्थिक दबाव की नई व्यवस्था तो स्थापित नहीं हो रही।
ब्रिक्स में भारत के बढ़ते कद की संभावनाएं
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भारत को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करने का अवसर दिया है। ब्रिक्स के विस्तार के बाद भारत की भूमिका और अधिक अहम हो गई है, क्योंकि वह पश्चिम और पूर्व दोनों के साथ संवाद बनाए रखने की क्षमता रखता है। भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, डिजिटल क्षमता, जनसंख्या शक्ति और वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधि के रूप में उसकी स्वीकार्यता उसे ब्रिक्स के भीतर एक निर्णायक आवाज बना रही है। रूस और चीन भी यह समझते हैं कि भारत के बिना ब्रिक्स केवल चीन-केन्द्रित मंच बनकर रह जाएगा। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में भारत की भूमिका केवल सदस्य देश की नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन के ‘मध्य स्तंभ’ के रूप में स्वीकार्य हो सकती है।
अमेरिका-चीन-रूस की कूटनीतिक गतिविधियों के संदेश
अमेरिका का चीन जाना, उसके बाद रूस का बीजिंग के साथ सामरिक निकटता बढ़ाना और फिर पुतिन के भारत दौरे की तैयारी यह संकेत देती है कि दुनिया में एक नई बहुध्रुवीय कूटनीति आकार ले रही है। रूस आज पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण चीन पर अधिक निर्भर दिखाई देता है, लेकिन वह भारत के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी बनाए रखना चाहता है। वहीं अमेरिका भी चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम भागीदार मानता है। यह स्थिति भारत को बड़े अवसर के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी भी देती है।
ईरान संकट और विश्व व्यवस्था की नई प्रतिस्पर्धा
ईरान को लेकर पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की लड़ाई का हिस्सा बन चुका है। अमेरिका और उसके सहयोगी जहां ईरान को नियंत्रित करने की नीति पर चलते रहे हैं, वहीं चीन और रूस ने तेहरान के साथ आर्थिक और सामरिक संबंध मजबूत किए हैं। इससे दुनिया दो स्पष्ट खेमों में बंटती दिखाई दे रही है। खतरा यह है कि महाशक्तियों की यह प्रतिस्पर्धा कहीं मानवता के लिए नए शीत युद्ध जैसी स्थिति न पैदा कर दे। ऊर्जा संसाधनों, व्यापारिक मार्गों और सामरिक प्रभुत्व की इस होड़ में आम नागरिकों की सुरक्षा, खाद्य संकट और वैश्विक शांति जैसे मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में दुनिया अधिक अस्थिर और संघर्षपूर्ण हो सकती है।
G-2 अवधारणा और भारत का ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में उभार
पिछले कुछ वर्षों में ‘G-2’ यानी अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक नेतृत्व साझा करने की अवधारणा पर लगातार चर्चा होती रही है। इसका अर्थ यह है कि दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था दो सबसे बड़ी शक्तियों वॉशिंगटन और बीजिंग के इर्द-गिर्द घूमने लगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि रूस, भारत, यूरोप, पश्चिम एशिया और वैश्विक दक्षिण के जबरदस्त उभार ने इस अवधारणा को बड़ी चुनौती दी है। विशेष रूप से भारत इस व्यवस्था में ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में उभर रहा है, जो न पूरी तरह पश्चिमी खेमे में है और न ही चीन-रूस धुरी का हिस्सा। यही कारण है कि आज दुनिया केवल G-2 की ओर नहीं बढ़ रही, बल्कि एक जटिल बहुध्रुवीय व्यवस्था का निर्माण हो रहा है, जहां शक्ति का संतुलन लगातार बदलता रहेगा।
अमेरिका की चौधराहट क्यों टूट रही है?
एक बड़ा सवाल यह भी है कि अमेरिकी चौधराहट टूट क्यों रही है? दरअसल, दुनिया में अमेरिकी प्रभाव घटने का सबसे बड़ा कारण डोनाल्ड ट्रंप की अति-आक्रामक विदेश नीति है। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया जैसे युद्धों ने अमेरिका की नैतिक साख को नुकसान पहुंचाया। टैरिफ नीति के मोर्चे पर ट्रंप पहले भी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं। दुनिया अब लोकतंत्र बहाली के नाम पर किए गए अमेरिकी हस्तक्षेपों को संदेह की नजर से देखने लगी है। दूसरी तरफ चीन ने खुद को एक वैकल्पिक आर्थिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। उसने सड़कों, बंदरगाहों, रेलवे और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश कर एशिया और अफ्रीका में प्रभाव बढ़ाया। यही कारण है कि आज दुनिया के कई देश अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने लगे हैं।
भारत-चीन रिश्तों के नए संकेत
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम बेहद अहम है। सबसे पहले तो यह स्पष्ट हुआ कि अमेरिका अब चीन को अकेले नियंत्रित नहीं कर सकता। इसका मतलब है कि एशिया में संतुलन की राजनीति और मजबूत होगी, जो कि भारत के हित में है। भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाता रहा है। उसने अमेरिका के साथ भी संबंध बनाए और रूस व चीन के साथ भी संवाद कायम रखा।
इस यात्रा का सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष असर भारत-चीन संबंधों पर भी पड़ सकता है। जब अमेरिका चीन पर अत्यधिक दबाव बनाता है, तब बीजिंग अपनी सीमाओं और रणनीतिक क्षेत्रों में अधिक आक्रामक रुख अपनाता है। लेकिन जब वैश्विक शक्ति संतुलन अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई देता है, तब चीन को भी क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग की जरूरत महसूस होती है। भारत और चीन दोनों एशिया की प्राचीन सभ्यताएं और उभरती आर्थिक शक्तियां हैं। दोनों ब्रिक्स, स्को और जी20 जैसे मंचों पर साथ काम कर रहे हैं। पश्चिमी आर्थिक दबावों और डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था को लेकर भी दोनों देशों की कई समान चिंताएं हैं। हालांकि सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह कायम हैं, लेकिन आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे मुद्दों पर संवाद और सहयोग की संभावनाएं आने वाले वर्षों में बढ़ सकती हैं। चीन भी यह समझने लगा है कि भारत के साथ स्थायी तनाव एशिया में उसके लिए दीर्घकालिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।
भारत को भी फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने होंगे
हालांकि चीन का एक दूसरा पहलू भी है। चीन अब भी भारत का एक रणनीतिक प्रतिस्पर्धी है। उसकी विस्तारवादी नीतियां और हिंद महासागर में बढ़ती गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय हैं। इसलिए भारत को अत्यधिक उत्साहित होने की जरूरत नहीं है और उसे फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे। भारत को यह समझना होगा कि भविष्य में तकनीक, विनिर्माण, ऊर्जा और सप्लाई चेन पर नियंत्रण ही विश्व की वास्तविक शक्ति तय करेंगे। यदि भारत इस बदलती दुनिया में आत्मनिर्भर विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, एआई और हरित ऊर्जा में तेजी से आगे बढ़ता है, तो वह अमेरिका और चीन दोनों के बीच संतुलन बनाकर सबसे बड़ा लाभ उठा सकता है।
ताइवान पर ट्रंप की चुप्पी बहुत कुछ कहती है
इस यात्रा का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत ताइवान पर अमेरिकी नरमी भी रही। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रंप को साफ चेतावनी दी कि ताइवान मुद्दे को गलत तरीके से संभालना संबंधों को ‘खतरनाक दिशा’ में ले जा सकता है। हैरानी की बात यह रही कि व्हाइट हाउस के आधिकारिक बयान में ताइवान का उल्लेख तक नहीं किया गया। यह सामान्य कूटनीतिक चूक नहीं थी। इसका अर्थ है कि अमेरिका फिलहाल चीन को उकसाने से बचना चाहता है। इससे एशिया में यह संदेश गया कि अमेरिका अब हर हाल में सैन्य टकराव के लिए तैयार नहीं है। यह चीन की बड़ी कूटनीतिक जीत थी।
एशिया के नए युग की शुरुआत में भारत-चीन की भूमिका निर्णायक
ट्रंप की बीजिंग यात्रा इतिहास में शायद किसी बड़ी डील के लिए याद न रखी जाए, लेकिन यह उस क्षण के रूप में जरूर याद की जाएगी जब दुनिया ने अमेरिकी दादागिरी को पहली बार खुलकर कमजोर पड़ते देखा। यह यात्रा की समीक्षा में लिखा जाएगा कि अब युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा और धैर्य से जीते जाएंगे। चीन ने इस बार अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय संतुलित प्रतिरोध का प्रदर्शन किया। और कभी-कभी किसी महाशक्ति को रोक देना ही सबसे बड़ी जीत होती है। भारत के लिए यह बेहद अहम समय है। यदि नई दिल्ली संतुलन, आत्मनिर्भरता और रणनीतिक बुद्धिमत्ता के साथ आगे बढ़ती है, तो आने वाला दशक एशिया का दशक हो सकता है और उस एशिया में भारत और चीन दोनों की भूमिका निर्णायक होगी।
चीन को पुराना समझना अमेरिका की सबसे बड़ी भूल
संक्षेप में कहें तो डोनाल्ड ट्रंप की विफलता की जड़ यही रही कि वे अपने मन में 2017 वाले चीन को लेकर बीजिंग पहुंचे। लेकिन 2026 का चीन पूरी तरह बदल चुका है। यह अब केवल सस्ते सामान बनाने वाला देश नहीं, बल्कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक और तकनीकी शक्ति है। इलेक्ट्रिक कारों से लेकर सोलर पैनल, चिप, एआई सिस्टम से लेकर रेयर अर्थ मिनरल्स तक चीन अब दुनिया की सप्लाई चेन का केंद्र बन चुका है। ट्रंप ने सोचा होगा कि वैश्विक उद्योगपतियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ वे पुराने अंदाज में धमकी देंगे और चीन झुक जाएगा। लेकिन चीन अब अमेरिका पर पहले जैसा निर्भर नहीं है। उसने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में अपने बाजार बढ़ा लिए हैं। अमेरिकी रक्षा उद्योग से लेकर टेक कंपनियों तक को चीन के दुर्लभ खनिज चाहिए। एप्पल से लेकर टेस्ला तक चीन के बाजार और विनिर्माण पर टिके हुए हैं। ऐसे में ट्रंप की धमकियां बीजिंग के लिए अब डर नहीं, बल्कि शोर बन चुकी हैं।







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