मनीष गोधा,
वरिष्ठ पत्रकार
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भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे विषम परिस्थितियों वाले राज्य राजस्थान में पानी का उचित इस्तेमाल शायद आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। एक ऐसा प्रदेश जहां सतही जल के नाम पर सिर्फ एक सदानीरा नदी चम्बल है, जहां का एक बड़ा भूभाग रेगिस्तान है और जहां भूजल या तो बहुत नीचे जा चुका है। जहां है भी वहां उसकी गुणवत्ता बहुत खराब है, वहां पानी का इस्तेमाल पीने में किया जाए, खेती में किया जाए या उद्योगों के लिए दिया जाए, पानी लगातार बढते शहरों की प्यास बुझाए या गांवो में आज भी तपती धूप में मीलों दूर से पानी लाती महिलाओं को उपलब्ध कराया जाए, यह तय कर पाना बेहद मुश्किल है।
राजस्थान देश के उन राज्यों में है जहां पानी का संकट हमेशा से रहा है। बारिश कम होना या नहीं होना राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है। इसने सालों तक अकाल के दुष्चक्र झेले हैं, लेकिन पहले की परिस्थितियों और आज के दौर में सबसे बड़ा अंतर हमारी जीवनशैली का आया है।
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पुराने समय में भी लोग पानी की कमी झेलते थे, लेकिन जीवन शैली ऐसी थी कि घर में बने टांके के पानी से पूरा साल निकल जाता था। प्रदेश के गांवों में कहा जाता था कि घी ढुल जाए तो कोई बात नहीं पानी नहीं ढुलना चाहिए। पानी की एक-एक बूंद का महत्व समझा जाता था, इसीलिए बारिश चाहे कम ही हो, लेकिन जितनी होती थी, उसे सहेज लिया जाता था। कंक्रीट के जंगल नहीं थे, इसलिए पानी बरसता था तो सीधा जमीन में जाता था और ट्यूबवैल कम थे, इसलिए कुओं से हाथ जितना खींच पाते थे, उतना ही पानी निकलता था।
पानी की बर्बादी पर टिकी हमारी जीवनशैली
आज की हमारी जीवनशैली पानी की बर्बादी पर ही टिकी है। हम सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक ही नहीं, सोने के बाद भी अपने कूलरों का इस्तेमाल कर कितना पानी बर्बाद कर रहे है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। लगाता बढ़ता शहरीकरण और बदलती जीवन शैली पानी की कमी तथा पर्यावरण के नुकसान के ऐसे दुश्चक्र में हमें फंसाती जा रही है जिससे निकल पाना असम्भव सा होता जा रहा है।
कुछ उदाहरण देखिए
पानी कम है, इसलिए शहरों में हमने एयरकंडीशनर्स का इस्तेमाल बढा दिया है, लेकिन एयरकंडीशनर्स से निकलने वाली गर्म हवा वातावरण में इतनी गर्मी बढ़ा रही है कि उससे पूरा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है।
देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाना था, इसलिए हमने गेहूं की खेती शुरू कर दी और अब इतने बड़े पैमाने पर कर रहे हैं कि खुद का पेट भरने के लिए धरती की कोख में जमा पानी खत्म करते जा रहे हैं।
आर्थिक विकास का चक्का तेजी से घूमे इसलिए हमें चौड़ी और अच्छी सड़कें चाहिए, लेकिन इनके लिए हर साल हमें उन हजारों पेड़ों की कुर्बानी देनी पड़ती है जो बादलों को खींच कर लाते थे और कितनी भी तेज गर्मी हो, सुकून की ठंडी छाया देते थे।
इन उदाहरणों से आप समझ गए होंगे कि हम कैसे खुद ही उस डाली को काट रहे हैं, जिस पर हम बैठे हैं। आज हम जिस दुश्चक्र में फंस चुके है, उसमें स्थायी समाधान तो कुछ नहीं दिखता, बस कुछ कोशिशें की जा सकती हैं ताकि जीवन चलता रहे। सबसे बड़ी जरूरत जागरूकता की है। पानी जरूरत है, इसे लग्जरी बनने से रोकना है।
राजस्थान में भूजल दोहन की चिंताजनक स्थिति
- साल 2013-2023 की अवधि में राजस्थान ने कम से कम 82 बिलियन (8,200 करोड़) क्यूबिक मीटर भूजल का दोहन किया। यह पानी प्रदेश के प्रत्येक परिवार की जरूरत को 36 साल तक पूरा कर सकता था। कुछ राज्यों में जहां भूजल दोहन कम हुआ है, वहीं राजस्थान में इन दस सालों में 3.74 प्रतिशत अधिक दोहन हुआ।
- प्रदेश के पांच जिले जयपुर, अलवर, नागौर, जोधपुर, और जालोर प्रदेश के भूजल का तिहाई हिस्सा उपयोग करते है। इस पानी का करीब 85, प्रतिशत यानी करीब 7,100 करोड़ क्यूबिक मीटर, सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया गया।
- 2024-25 में राजस्थान में सामान्य से लगभग 33 प्रतिशत अधिक बारिश होने के बावजूद यहां भूजल दोहन की दर 149 प्रतिशत थी जो देश में सर्वाधिक थी।
- पिछले एक दशक के दौरान भूजल की दृष्टि से 71 प्रतिशत प्रशासनिक ब्लॉक अत्यधिक दोहन वाली श्रेणी है। जोधपुर और झुंझुनू जैसे जिलों में भूजल स्तर में 25-40 मीटर की भारी गिरावट आई है, जबकि 2020 के बाद से जयपुर के झोटवाड़ा ब्लॉक में जल स्तर 25 मीटर नीचे चला गया।
- गिरते भूजल स्तर के कारण पानी निकालने की लागत बढ़ रही है। बहुत सूखे इलाकों में खेती छोड़ने की दर 53 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। एक अध्ययन के अनुसार पानी की कमी के चलते पिछले दशक में गांवों से शहरों की ओर पलायन 171 प्रतिशत बढ़ा है। अनुमान है कि सिंचाई लागत बढ़ने से 2030 तक करीब एक-तिहाई छोटे किसान भूमिहीन किसान बन सकते हैं।
- पशुपालन क्षेत्र पर खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि चरागाह कम हो रहे हैं। पानी में खारापन बढ़ने से पशुओं के दूध देने की क्षमता प्रभावित हुई है।
प्रदेश की चुनौतियां
जयपुर
- जयपुर की लाइफलाइन कहे जाने वाले बीसलपुर बांध से पानी लाने वाली मुख्य ट्रांसमिशन पाइपलाइन पुरानी हो चुकी है। इसमें बार-बार रिसाव (लीकेज) की समस्या आती है, जिसके कारण मरम्मत के लिए कई दिनों तक जलापूर्ति बाधित हो जाती है।
- शहर के पाइपलाइन के अंतिम छोर वाले इलाकों जैसे- जगतपुरा, सांगानेर, प्रतापनगर, वाटिका रोड, और आगरा रोड पर गर्मियों के मौसम में पानी का दबाव बहुत कम हो जाता है। लोगों को मजबूरन निजी टैंकरों का सहारा लेना पड़ता है।
- तेजी से बढ़ते शहरीकरण और प्राकृतिक जलस्रोतों के खत्म होने से जयपुर में भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है। अत्यधिक दोहन से कई नलकूप या तो सूख चुके हैं या उनसे बहुत कम पानी निकलता है।
- पाइपलाइनों में रिसाव से कई क्षेत्रों में दूषित पानी की सप्लाई की समस्या आम है। सांगानेर और जगतपुरा जैसे क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड और टीडीएस की मात्रा तय सीमा से अधिक है।
- शहर की बसावट तेजी से बढ़ रही है, जिसके मुकाबले पेयजल की आपूर्ति में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो पाती है। खासतौर से गर्मी के दिनों में पानी की मांग 40 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
जोधपुर
- जोधपुर शहर और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग पूरी पेयजल आपूर्ति इंदिरा गांधी नहर पर निर्भर है। नहर के वार्षिक रखरखाव (क्लोजर) के दौरान या नहर में रिसाव होने पर पूरे क्षेत्र में भारी जल संकट के हालात हो जाते हैं।
- जिले के अधिकांश हिस्से कठोर चट्टानी संरचनाओं पर स्थित हैं, जिनमें पानी सोखने और जल धारण करने की क्षमता बहुत कम है। अनियंत्रित दोहन के कारण भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, और जिन क्षेत्रों में पानी उपलब्ध है, वह खारा या फ्लोराइड युक्त है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
- लूणी नदी और आसपास के क्षेत्रों में कपड़ा (टेक्सटाइल) उद्योगों और अन्य फैक्टरियों से निकलने वाला रासायनिक कचरा भूजल और सतही जल को प्रदूषित कर रहा है।
- पेयजल पाइपलाइनों में अवैध कनेक्शन के जरिए पानी की चोरी करना एक बड़ी समस्या है, जिससे अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंच पाता और आम जनता को मजबूरन महंगे टैंकरों पर निर्भर होना पड़ता है।
- शहर के मुकाबले ग्रामीण इलाकों (जैसे लूणी, ओसियां, और भोपालगढ़ आदि) में पाइपलाइन का सुचारू नेटवर्क न होना एक बड़ी चुनौती है।
कोटा
- मांग और आपूर्ति का असंतुलन विशेष रूप से गर्मियों के मौसम में कोचिंग छात्रों की बड़ी आबादी और स्थानीय निवासियों के कारण पानी की खपत काफी बढ़ जाती है, जिससे जल संकट गहरा जाता है।
- कई क्षेत्रों (जैसे सोगरिया और कोटड़ी) में पुरानी या क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों के कारण अक्सर गंदे और बदबूदार पानी की आपूर्ति की शिकायतें आती हैं।
- पुराने हो चुके जल वितरण नेटवर्क और लीकेज से पानी का भारी अपव्यय होता है। ऊंचे इलाकों या मल्टी-स्टोरी इमारतों तक पर्याप्त दबाव (प्रेशर) के साथ पानी नहीं पहुंच पाता।
अजमेर
- अजमेर की पेयजल व्यवस्था मुख्य रूप से बीसलपुर बांध पर निर्भर है। बांध में जलस्तर कम होने या आपूर्ति प्रभावित होने पर शहर पर सीधा असर पड़ता है।
- शहर के तेजी से विस्तार के कारण नई कॉलोनियों तक नियमित जलापूर्ति पहुंचाना चुनौती बना हुआ है। गर्मियों में पानी की मांग बढ़ने पर कई क्षेत्रों में जल वितरण का अंतराल बढ़ाना पड़ता है। पुरानी पाइपलाइनों में लीकेज और जल हानि की समस्या से आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है।
- पुष्कर और आसपास के पर्यटन क्षेत्रों में सीजन के दौरान पानी की अतिरिक्त मांग भी व्यवस्था पर दबाव बढ़ाती है।
उदयपुर
- उदयपुर की जलापूर्ति फतेहसागर, पिछोला और देवास परियोजना जैसे जलस्रोतों पर आधारित है। झीलों के जलग्रहण क्षेत्रों में अतिक्रमण और अनियोजित विकास जल संरक्षण के लिए चुनौती बन रहे हैं। झीलों में प्रदूषण और सीवेज प्रवाह को नियंत्रित रखना पेयजल गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।
- पर्यटन गतिविधियों और बढ़ती आबादी के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है।
- कई बाहरी और पहाड़ी क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान कम दबाव से जलापूर्ति की शिकायतें सामने आती हैं।
बीकानेर
- बीकानेर की अधिकांश पेयजल आपूर्ति इंदिरा गांधी नहर प्रणाली पर निर्भर है। ऐसे में नहर की वार्षिक बंदी या मरम्मत कार्य के दौरान जलापूर्ति प्रभावित होने का खतरा बना रहता है।
- जिले के अधिकांश हिस्सों में भूजल खारा होने से स्थानीय स्रोत सीमित हैं। गर्मियों में बढ़ती मांग के कारण दूरस्थ क्षेत्रों तक पर्याप्त पानी पहुंचाना चुनौती बन जाता है।
- पुरानी वितरण लाइनों में लीकेज और जल हानि भी व्यवस्था को प्रभावित करती है।
पाली
- पाली जिले में भूजल का अत्यधिक दोहन जल संकट की प्रमुख वजहों में से एक है।
- कई क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड और लवणीयता निर्धारित सीमा से अधिक पाई जाती है।
- औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल स्रोतों की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर चिंता सामने आती रही है।
- वर्षा पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कम बारिश वाले वर्षों में स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भीलवाड़ा
- वस्त्र उद्योग और बढ़ती आबादी के कारण जिले में जल मांग लगातार बढ़ रही है। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जिससे नलकूपों पर दबाव बढ़ा है। गर्मियों में जल वितरण और पर्याप्त स्रोतों की उपलब्धता प्रशासन के लिए चुनौती बन जाती है।
- कुछ क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता और फ्लोराइड की समस्या भी सामने आती रही है। ऐसे में औद्योगिक उपयोग और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण चुनौती है।
सीकर
- सीकर जिले के हालात भी अन्य शहरों जैसे ही हैं। यहां भी अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। फ्लोराइड युक्त पानी लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बना हुआ है।
- जिले के कई इलाकों में भूजल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण जल संकट की आशंका बनी रहती है। गर्मियों में जलापूर्ति बनाए रखने के लिए सतही जल आधारित योजनाओं पर निर्भरता बढ़ जाती है। तेजी से बढ़ते शहरी और ग्रामीण जल उपभोग के कारण भविष्य की जल सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनती जा रही है।
कम पानी में अधिक उत्पादन बड़ी जरूरत
कम पानी में अधिक कृषि उत्पादन के लिए जल की हर एक बूंद का सटीक उपयोग, आधुनिक सिंचाई विधियों, और उन्नत कृषि तकनीकों का समन्वय आवश्यक है। ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, मिट्टी प्रबंधन और नमी संरक्षण, मल्चिंग, हाइड्रोजेल का उपयोग, जैविक खाद और कम्पोस्ट, कम पानी वाली फसलों व सटीक फसल चक्र से पानी का सदुपयोग किया जा सकता है। इससे न केवल पानी की बचत होगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और जल उपयोग क्षमता बेहतर होगी।
बिना पानी वाली खेती के तरीके
इसके अलावा बिना पानी वाली खेती के उपायों से भी पानी की बचत की जा सकती है। हाइड्रोपोनिक्स का उपयोग, जिसमें पौधों को पोषक तत्वों से भरपूर पानी का घोल दिया जाता है। इससे कम पानी में फसलें तेजी से बढ़ती हैं। एरोपोनिक्स में मिट्टी या पानी के बिना, हवा या धुंध वाले माहौल में पौधे उगाए जाते हैं। यह तरीका सूखे इलाकों के लिए बहुत अच्छा है, क्योंकि इसमें 90 प्रतिशत तक पानी बचता है। सीकर और झुंझुनू के किसानों द्वारा विकसित ड्राईलैंड एग्रोफॉरेस्ट्री तकनीक से पेड़ों को मात्र एक लीटर पानी देकर बारिश के सहारे उगाया जाता है।
सरकार ने भी खेती में पानी के उपयोग को सीमित करने के लिए राजस्थान सूक्ष्म सिंचाई मिशन, मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान, जल संचय योजना, एआई आधारित तकनीक जैसे टूल्स से किसानों को डिजिटल रूप से जागरूक किया जा रहा है।
इनसे सीखा जाना चाहिए
सीकर के दाता निवासी किसान सुंडाराम वर्मा की एक लीटर पानी से पौधे तैयार करने की ड्राई फार्मिंग तकनीक फायदेमंद साबित हो रही है। चिड़ावा से करीब दस किमी दूर पिलानी रोड पर देवरोड पंचायत के लोगों ने भी कम पानी में पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण व भूजल बचाने की दिशा में सकारात्मक प्रयास किए हैं। देवरोड गांव के मुक्तिधाम की आठ हेक्टेयर जमीन में 7500 पौधे लगाए गए हैं। इससे पहले यह भूमि झाड़-झंखाड़ से भरी हुई थी।
राजस्थान का जल संकट केवल सरकारों की चुनौती नहीं है। यह हमारी जीवनशैली, हमारी खेती, हमारे शहरों और हमारी प्राथमिकताओं का भी आईना है। रेगिस्तान में रहने वाली पिछली पीढ़ियों ने सीमित पानी में जीवन जीने की कला विकसित की थी। सवाल यह है कि क्या आधुनिक राजस्थान उस समझदारी को नई तकनीक के साथ जोड़ पाएगा या फिर आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी सबसे बड़ी चिंता बन जाएगा।







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