टैंकरों के भरोसे जिंदगी
राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तानी जिले बाड़मेर और जैसलमेर आज भी गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। विकास योजनाओं, लंबी पाइपलाइन परियोजनाओं और करोड़ों रुपये के निवेश के बावजूद बड़ी आबादी को नियमित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यहां पानी की कमी जीवन की स्थायी वास्तविकता बन चुकी है।
वर्ष 2011 की जनगणना में बाड़मेर की आबादी करीब 26 लाख और जैसलमेर की लगभग 6.7 लाख थी। वर्तमान अनुमान के अनुसार बाड़मेर की आबादी 35 लाख से अधिक तथा जैसलमेर की 8 लाख से अधिक मानी जा रही है। देश के सबसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल इन जिलों में औसत वार्षिक वर्षा क्रमशः लगभग 280-300 मिमी और 180-200 मिमी के बीच रहती है। विशाल भौगोलिक क्षेत्र, बिखरी हुई आबादी और कठोर जलवायु के कारण यहां पेयजल उपलब्ध कराना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। गर्मियों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और ऐसे समय में ग्रामीणों का बड़ा हिस्सा पानी जुटाने तथा उसे सहेजकर रखने में अपना अधिकांश समय खर्च करता है।
Table Of Content
- टैंकरों के भरोसे जिंदगी
- जब नाड़ी और बावड़ियां थीं जीवनरेखा
- नल पहुंचे, लेकिन पानी नहीं
- सीमा पर प्यास का संघर्ष
- जब पानी की रखवाली करते हैं ताले
- प्यास बुझाने का महंगा विकल्प
- भूजल भी दे रहा चेतावनी
- पुराने नलकूप फिर बने सहारा
- टांकों में सहेजा जाता है पूरा साल
- पानी की कमी से पशुपालन पर चोट
- सरकार का दावा और चुनौतियां
- समाधान की राह कहां है?
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जब नाड़ी और बावड़ियां थीं जीवनरेखा
एक समय था जब रेगिस्तानी क्षेत्रों में नाड़ी, तालाब, कुएं, बावड़ियां, बेरियां और टांके जल संरक्षण के प्रमुख साधन हुआ करते थे। ग्रामीण समाज इन जलस्रोतों की नियमित देखभाल करता था और इन्हीं के सहारे वर्षभर पानी की जरूरत पूरी होती थी। लेकिन आधुनिक जलापूर्ति योजनाओं पर बढ़ती निर्भरता के साथ पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण कमजोर पड़ता गया। परिणामस्वरूप अनेक नाड़ियां, बावड़ियां, कुएं और तालाब धीरे-धीरे अस्तित्व खोते चले गए।
आज जब सरकारी जलापूर्ति व्यवस्था कई क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है, तब लोगों को इन पारंपरिक प्रणालियों की उपयोगिता फिर से समझ में आने लगी है। जल विशेषज्ञ मानते हैं कि रेगिस्तानी इलाकों में जल संकट का स्थायी समाधान पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय में ही निहित है।
नल पहुंचे, लेकिन पानी नहीं
ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू किए गए जल जीवन मिशन के तहत बाड़मेर और जैसलमेर में व्यापक स्तर पर कार्य किए गए। पाइपलाइनें बिछाई गईं, जलाशय बनाए गए और हजारों घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाए गए। लेकिन जमीनी तस्वीर कई जगह अलग दिखाई देती है। अनेक गांवों में बने ग्राउंड लेवल रिजर्वायर (जीएलआर) खाली पड़े हैं और नल कनेक्शन मिलने के बावजूद सप्ताह में केवल एक-दो बार ही जलापूर्ति हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि ढांचा तो खड़ा हो गया, लेकिन नियमित आपूर्ति अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब जल जीवन मिशन पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, तो फिर अनेक गांवों में नियमित जलापूर्ति क्यों नहीं हो पा रही? क्या समस्या पाइपलाइन नेटवर्क की है, रखरखाव की है, या फिर मूल जलस्रोतों की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं है?
स्थानीय स्तर पर यह शिकायत लगातार सामने आती रही है कि कई स्थानों पर पाइपलाइन तो बिछ गई, लेकिन पर्याप्त जलस्रोत, पंपिंग व्यवस्था या भंडारण क्षमता विकसित नहीं हो सकी। कुछ परियोजनाएं अब भी अधूरी हैं, जबकि कई जगहों पर स्थापित संरचनाएं अपनी निर्धारित क्षमता से संचालित नहीं हो रहीं।
जल जीवन मिशन के मानकों के अनुसार प्रत्येक ग्रामीण व्यक्ति को प्रतिदिन 55 लीटर पेयजल उपलब्ध कराया जाना चाहिए, लेकिन कई दूरस्थ और सीमावर्ती गांवों में लोग आज भी नियमित आपूर्ति के लिए इंतजार करते हैं। कागजों पर दर्ज उपलब्धियों और जमीन पर उपलब्ध पानी के बीच का यही अंतर सवाल खड़े करता है।
सीमा पर प्यास का संघर्ष
भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे गांवों में स्थिति और अधिक गंभीर है। बाड़मेर जिले के गफन क्षेत्र सहित अनेक सीमावर्ती बस्तियों में लोगों को पेयजल के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई परिवारों में महिलाओं और बच्चों का बड़ा हिस्सा दिन का अधिकांश समय पानी जुटाने में बीतता है।
गर्मी के मौसम में भूजल स्तर और नीचे चला जाता है, जिससे संकट और गहरा जाता है। ऐसे समय में टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति की जाती है, लेकिन मांग के मुकाबले यह व्यवस्था अक्सर अपर्याप्त साबित होती है। कई गांवों में लोगों को पानी के लिए कई दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
जब पानी की रखवाली करते हैं ताले
सीमावर्ती गांवों में पानी की कीमत किसी अनमोल संपत्ति से कम नहीं है। यहां अधिकांश परिवारों ने अपनी-अपनी बेरियां बना रखी हैं, जिनमें पानी संग्रहित किया जाता है। इन बेरियों पर ताले लगाए जाते हैं ताकि संग्रहित पानी सुरक्षित रहे और कोई दूसरा व्यक्ति उसका उपयोग न कर सके। वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी अनेक गांवों में जीवित है। यह दृश्य बताता है कि रेगिस्तान में पानी महज संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी है। जहां देश के अनेक हिस्सों में पानी सहज उपलब्ध है, वहीं यहां उसकी हर बूंद की निगरानी और सुरक्षा करनी पड़ती है।
प्यास बुझाने का महंगा विकल्प
गर्मी बढ़ने और नियमित जलापूर्ति प्रभावित होने पर निजी टैंकर ही लोगों का प्रमुख सहारा बन जाते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में टैंकरों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए पानी के महंगे टैंकर अतिरिक्त बोझ बन जाता है। इसका सीधा असर उनके जीवन स्तर और घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
भूजल भी दे रहा चेतावनी
सतही जल की कमी के बीच भूजल पर निर्भरता लगातार बढ़ी है, लेकिन अब भूजल भी संकट के संकेत दे रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार बाड़मेर के कुछ इलाकों में जलस्तर 7 से 18 मीटर तक नीचे चला गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित वर्षा, बढ़ता दोहन और जल पुनर्भरण की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण भूजल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में संकट और गहरा सकता है।
पुराने नलकूप फिर बने सहारा
जल संकट के बीच जलदाय विभाग को भी पुराने जलस्रोतों की उपयोगिता का अहसास होने लगा है। बाड़मेर शहर में नहरी पानी की आपूर्ति शुरू होने से पहले भाड़खा गांव के ट्यूबवेलों से जलापूर्ति की जाती थी। नहरी परियोजनाओं के बाद इन नलकूपों का महत्व कम हो गया था, लेकिन हाल के वर्षों में नहरी जलापूर्ति प्रभावित होने पर इन्हें फिर से विकसित किया जा रहा है। विभाग इन्हें वैकल्पिक जलस्रोत के रूप में तैयार कर रहा है ताकि आपात स्थिति में शहर और आसपास के क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराया जा सके।
टांकों में सहेजा जाता है पूरा साल
बाड़मेर और जैसलमेर की एक विशिष्ट पहचान यहां के टांके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां वर्षाजल संग्रहण के लिए टांका न बना हो। अनेक परिवारों के पास दो से तीन टांके तक हैं। मानसून के दौरान घरों की छतों, आंगनों और कैचमेंट क्षेत्रों से एकत्रित पानी को इन टांकों में संग्रहित किया जाता है।
यही पानी पूरे वर्ष पेयजल के रूप में उपयोग किया जाता है। आज भी अनेक परिवार वर्षाजल को सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित पेयजल स्रोत मानते हैं। हालांकि कमजोर मानसून वाले वर्षों में टांके पर्याप्त नहीं भर पाते, जिससे पूरे वर्ष जल संकट बना रहता है।
पानी की कमी से पशुपालन पर चोट
पश्चिमी राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। हजारों परिवार गाय, भैंस, ऊंट, भेड़ और बकरियों के पालन से अपनी आजीविका चलाते हैं। जल संकट का सीधा असर पशुधन पर भी पड़ता है। कई स्थानों पर पशुओं को दिन में केवल एक बार पानी पिलाया जाता है, जबकि गंभीर परिस्थितियों में एक दिन छोड़कर दूसरे दिन पानी देने की नौबत आ जाती है। इसका असर पशुओं के स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन दोनों पर पड़ता है, जिससे पशुपालकों की आय प्रभावित होती है।
सरकार का दावा और चुनौतियां
सरकार का कहना है कि पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में जलापूर्ति देश के सबसे कठिन कार्यों में से एक है। विशाल दूरी, बिखरी आबादी, सीमित स्थानीय जलस्रोत और कठोर भौगोलिक परिस्थितियां योजनाओं के क्रियान्वयन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जल जीवन मिशन के तहत बड़ी संख्या में घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाए गए हैं और कई नई पेयजल परियोजनाओं पर कार्य जारी है। जैसलमेर सहित पश्चिमी राजस्थान में बड़े जलाशयों, पंपिंग स्टेशनों और पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार पर भी निवेश किया जा रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि कई क्षेत्रों में समस्या योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि जलस्रोतों की सीमित उपलब्धता और लंबी दूरी तक पानी पहुंचाने की तकनीकी चुनौतियां हैं। उनका दावा है कि चरणबद्ध तरीके से आपूर्ति व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है।
समाधान की राह कहां है?
रेगिस्तानी जिलों में जल संकट का समाधान केवल नई योजनाओं और पाइपलाइनों तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए पारंपरिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन, वर्षाजल संग्रहण को बढ़ावा देने, भूजल संरक्षण और स्थानीय स्तर पर प्रभावी जल प्रबंधन की आवश्यकता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी हुईं, कितनी अधूरी हैं, पाइपलाइन क्षमता और वास्तविक जलापूर्ति में कितना अंतर है तथा रखरखाव पर कितना ध्यान दिया जा रहा है।
सवाल केवल पानी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि योजनाओं की प्रभावशीलता और क्रियान्वयन का भी है। पश्चिमी राजस्थान के लिए चुनौती केवल नई परियोजनाएं शुरू करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि पाइपलाइन से निकलने वाला पानी वास्तव में हर घर तक पहुंचे। विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद यही अंतर आज बाड़मेर और जैसलमेर के जल संकट की सबसे बड़ी कहानी है।







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