आखिर किसकी लापरवाही से रोज बह रहा करोड़ों लीटर पानी?
पश्चिमी राजस्थान के लिए जीवनरेखा मानी जाने वाली नर्मदा परियोजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी जालोर जिला पानी के संकट से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। जिले को प्रतिदिन करीब 14 करोड़ लीटर पेयजल की आवश्यकता है, जबकि महज 8.5 करोड़ लीटर पानी ही उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जो पानी दिया जा रहा है, उसका लगभग 41 प्रतिशत हिस्सा रास्ते में ही रिसाव व टूटी पाइपलाइनों के कारण बर्बाद हो जाता है। यानी सरकार पानी ला तो रही है, लेकिन उसे लोगों तक सुरक्षित पहुंचाने में पूरी तरह सफल अभी तक होना बाकी हैं।
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लीकेज ने खोली जलदाय विभाग की पोल
जिले में जगह-जगह टूटी पाइपलाइनें, महीनों तक बहता पानी और मरम्मत में लापरवाही अब आम दृश्य बन चुके हैं। कई स्थानों पर पाइपलाइन से पानी सीधे नालों, खेतों और खाली जमीन में बह जाता है। यह केवल पानी की बर्बादी नहीं, बल्कि सरकारी धन और जनता के भरोसे की भी बर्बादी है। अगर 41 प्रतिशत पानी रास्ते में ही नष्ट हो रहा है तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की गंभीर प्रशासनिक विफलता है।
नर्मदा आई, फिर भी ट्यूबवेलों का सहारा
नर्मदा परियोजना का उद्देश्य था कि जालोर जैसे सूखा प्रभावित जिले को स्थायी पेयजल उपलब्ध कराया जाए। लेकिन आज भी शहर की करीब 40 प्रतिशत जलापूर्ति स्थानीय ट्यूबवेलों से करनी पड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक गांव अभी भी भूजल पर निर्भर हैं। ऐसे में सवाल यही है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च कर बनाई गई परियोजना का पूरा लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
हर गर्मी में वही संकट, वही दावे
गर्मी शुरू होते ही जलापूर्ति में कटौती, कम दबाव, टैंकरों पर निर्भरता और पेयजल संकट की खबरें आम हो जाती हैं। दूसरी ओर अधिकारी हर साल नए दावे और योजनाओं की घोषणाएं करते हैं, लेकिन जमीनी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। यदि समय रहते रिसाव रोकने, पुरानी पाइपलाइन बदलने और वितरण व्यवस्था सुधारने पर ध्यान दिया जाता, तो आज लाखों लीटर पानी बचाया जा सकता था।
जवाबदेही तय करना जरूरी
पानी की कमी का रोना रोने से पहले यह जवाब देना होगा कि जो पानी उपलब्ध है, उसे बचाने के लिए क्या किया गया? आखिर करोड़ों लीटर पानी रोज बहने के बावजूद किसी अधिकारी की जवाबदेही क्यों तय नहीं होती? कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई? कितने लीकेज स्थायी रूप से ठीक किए गए?
यदि इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो यह मानना पड़ेगा कि जल संकट प्राकृतिक कम और प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम अधिक है।
अब ठोस कार्रवाई की जरूरत
जालोर की जनता को भाषण नहीं, पर्याप्त और नियमित पानी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि-
जिले में पुरानी व क्षतिग्रस्त पाइपलाइनें बदली जाएं।
सभी लीकेज की समयबद्ध मरम्मत हो।
पानी की बर्बादी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
नर्मदा परियोजना का लाभ हर गांव और शहर तक पहुंचे।
जल वितरण प्रणाली की स्वतंत्र तकनीकी जांच हो।
पानी की एक-एक बूंद बचाने का संदेश जनता को दिया जाता है, लेकिन जब करोड़ों लीटर पानी सरकारी व्यवस्था की लापरवाही से सड़कों और खेतों में बह जाए, तो सबसे पहले जवाबदेही सरकार और संबंधित विभागों की बनती है। यदि अब भी व्यवस्था नहीं सुधरी, तो आने वाले वर्षों में जालोर का जल संकट और गहराएगा, और इसकी जिम्मेदारी केवल प्रकृति नहीं बल्कि प्रशासनिक उदासीनता होगी।







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