साक्षात्कार – सीए अनिल जैन
राजस्थान में जल संकट, भूजल दोहन और भविष्य की जल सुरक्षा पर जल संचयन विशेषज्ञ एवं सीए अनिल जैन लंबे समय से काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि राज्य की सबसे बड़ी चुनौती पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसके संरक्षण और पुनर्भरण की है। राजस्थान के जल भविष्य, भूजल संकट और संभावित समाधानों पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश गांधी की सीए अनिल जैन के साथ बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल : राजस्थान में अच्छी बारिश वाले वर्षों के बाद भी जल संकट बना रहता है। सबसे बड़ी चूक कहां हो रही है?
अनिल जैन : राजस्थान की समस्या केवल कम वर्षा नहीं है। असली समस्या यह है कि जो वर्षा होती है, उसका बड़ा हिस्सा हम सहेज नहीं पाते। बारिश का पानी बहकर निकल जाता है, जबकि उसे तालाबों, जोहड़ों, चेक डैमों और रिचार्ज संरचनाओं के माध्यम से जमीन में उतारा जाना चाहिए। यदि हर गांव और हर शहर अपने हिस्से का वर्षा जल संरक्षित करने लगे तो भूजल स्तर में बड़ा सुधार संभव है। मेरे विचार से जल संकट का सबसे बड़ा समाधान पानी को रोकने और जमीन में पहुंचाने की संस्कृति को फिर से स्थापित करना है।
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सवाल : बड़े बांध और नहरें बनने के बावजूद भूजल संकट क्यों बढ़ता गया?
अनिल जैन : बड़े बांधों और नहरों ने राजस्थान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इंदिरा गांधी नहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन हमारी अधिकांश योजनाओं का उद्देश्य पानी पहुंचाना था, पानी को वापस जमीन में पहुंचाना नहीं। आज पेयजल और सिंचाई व्यवस्था का बड़ा हिस्सा भूजल पर आधारित है, जबकि भूजल पुनर्भरण पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। भविष्य की जल नीति में आपूर्ति और पुनर्भरण दोनों को समान महत्व देना होगा।
सवाल : राजस्थान के भूजल संकट का सबसे बड़ा कारण क्या है—प्रकृति या हमारी नीतियां?
अनिल जैन : कम वर्षा एक कारण है, लेकिन पूरी कहानी नहीं। असली समस्या यह है कि हम भूजल निकाल अधिक रहे हैं और भर कम रहे हैं। कई क्षेत्रों में पानी सैकड़ों फीट नीचे से निकाला जा रहा है। यदि निकासी लगातार बढ़े और पुनर्भरण सीमित रहे तो भूजल स्तर का गिरना स्वाभाविक है। इसलिए जल संकट को केवल प्राकृतिक समस्या मानना उचित नहीं होगा। इसमें हमारी विकास और जल उपयोग नीतियों की भी बड़ी भूमिका है।
सवाल : राजस्थान में 2025 में सामान्य से काफी अधिक वर्षा हुई, फिर भी बड़ी संख्या में भूजल इकाइयां अति-दोहित बनी हुई हैं। इस विरोधाभास को आप कैसे देखते हैं?
अनिल जैन : यही राजस्थान की सबसे बड़ी जल चुनौती है। रिकॉर्ड वर्षा का मतलब यह नहीं कि भूजल स्वतः भर जाएगा। यदि बारिश कम समय में बहुत अधिक हो और उसका पानी तेजी से बहकर निकल जाए, तो उसका लाभ सीमित रह जाता है। हमें वर्षा की मात्रा से अधिक उसके संरक्षण और पुनर्भरण पर ध्यान देना होगा। भविष्य में जल सुरक्षा का पैमाना यही होगा कि बारिश का कितना पानी जमीन तक पहुंचा।
सवाल : क्या राजस्थान को अपनी कृषि नीति और फसल पैटर्न पर पुनर्विचार करना होगा?
अनिल जैन : बिलकुल। राजस्थान के कुल जल उपयोग का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि में जाता है। ऐसे क्षेत्रों में जहां भूजल तेजी से गिर रहा है, वहां कम पानी वाली और अधिक मूल्य वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकें जल उपयोग की दक्षता बढ़ा सकती हैं। आने वाले समय में खेती और जल प्रबंधन को अलग-अलग नहीं देखा जा सकेगा।
सवाल : एक तरफ पानी की कमी है, दूसरी तरफ कई क्षेत्रों में फ्लोराइड और नाइट्रेट जैसी समस्याएं भी हैं। क्या भविष्य में जल गुणवत्ता बड़ी चुनौती बनेगी?
अनिल जैन : निश्चित रूप से। जल संकट केवल मात्रा का नहीं, गुणवत्ता का भी है। कई क्षेत्रों में पानी उपलब्ध है, लेकिन वह पीने योग्य नहीं है। फ्लोराइड, नाइट्रेट और लवणता जैसी समस्याएं स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। भूजल स्तर गिरने के साथ यह चुनौती और बढ़ती है। इसलिए भविष्य की जल नीति में जल गुणवत्ता को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी जितनी जल उपलब्धता को दी जाती है।
सवाल : क्या पारंपरिक जल संरचनाएं आज भी समाधान का हिस्सा बन सकती हैं?
अनिल जैन : राजस्थान का इतिहास बताता है कि पारंपरिक जल संरचनाएं केवल विरासत नहीं, बल्कि व्यवहारिक समाधान हैं। बावड़ियां, जोहड़, तालाब और टांके सदियों तक जल सुरक्षा का आधार रहे हैं। अलवर सहित कई क्षेत्रों में इनके पुनर्जीवन से सकारात्मक परिणाम मिले हैं। हालांकि केवल पारंपरिक प्रणालियां पर्याप्त नहीं होंगी। हमें परंपरा और आधुनिक तकनीक का संतुलित संयोजन अपनाना होगा।
सवाल : आने वाले वर्षों में राजस्थान की सबसे बड़ी जलवायु चुनौती क्या होगी?
अनिल जैन : मुझे लगता है कि भविष्य में चुनौती केवल कम वर्षा नहीं होगी, बल्कि अनियमित वर्षा होगी। कुछ दिनों में अत्यधिक बारिश और लंबे शुष्क अंतराल नई परिस्थितियां पैदा करेंगे। ऐसे में जल संरक्षण की भूमिका और अधिक बढ़ जाएगी। हर बूंद का महत्व पहले से कहीं ज्यादा होगा।
सवाल : कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि बड़े पैमाने पर नदी जल पुनर्भरण या नदी आधारित जल प्रबंधन परियोजनाएं तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि से जटिल हैं। आप इस आलोचना को कैसे देखते हैं?
अनिल जैन : हर बड़ी परियोजना का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय मूल्यांकन आवश्यक है। मेरा मानना है कि किसी भी समाधान को स्थानीय परिस्थितियों, पर्यावरणीय संतुलन और दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर ही लागू किया जाना चाहिए। जल संकट का कोई एकमात्र समाधान नहीं है। वर्षा जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जल दक्षता, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक जल प्रबंधन—इन सभी को साथ लेकर चलना होगा।
सवाल : यदि आपको राजस्थान सरकार और प्रदेशवासियों को केवल एक साझा सलाह देनी हो, तो वह क्या होगी?
अनिल जैन : मेरी सलाह बहुत सरल है—हर बूंद को रोकिए, सहेजिए और जमीन में उतारिए। जल संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाना होगा। जब तक हम भूजल निकालने और उसे वापस भरने के बीच संतुलन स्थापित नहीं करेंगे, तब तक जल संकट बना रहेगा।
सवाल : यदि आज का एक युवा वर्ष 2040 के राजस्थान की कल्पना करे, तो क्या उसे पानी को लेकर आश्वस्त होना चाहिए या चिंतित?
अनिल जैन : उसे न तो निराश होना चाहिए और न ही निश्चिंत। हमारे पास संसाधन हैं, तकनीक है और अनुभव भी है। सवाल केवल इच्छाशक्ति और प्राथमिकताओं का है। यदि हम अभी से जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और जल दक्षता को प्राथमिकता दें तो 2040 का राजस्थान आज की तुलना में अधिक जल-सुरक्षित हो सकता है।
सबसे बड़ी गलती यह होगी कि हम भूजल को बैंक खाते की तरह केवल निकालते रहें और उसमें जमा करना भूल जाएं। 2040 का राजस्थान प्यासा होगा या जल-सुरक्षित, इसका फैसला बादल नहीं करेंगे। यह फैसला हम आज करेंगे।
“राजस्थान में पानी की कमी से ज्यादा पानी को सहेजने की कमी है।”
“रिकॉर्ड बारिश भी जल सुरक्षा की गारंटी नहीं है, यदि पानी जमीन तक न पहुंचे।”
“2040 का राजस्थान प्यासा होगा या जल-सुरक्षित, इसका फैसला हम आज करेंगे।”







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