बारूद का गणित और लाइसेंस का चमत्कार
मजेदार बात यह है कि जिन जगहों पर सुरक्षा नियमों की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहीं नियम सबसे कम दिखाई देते हैं। स्कूल, कॉलेज, छात्रावास और आबादी के पास गोदाम ऐसे खड़े हैं जैसे बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ...

बात बेलगाम
जयपुर में अवैध पटाखा गोदामों पर छापे पड़ रहे हैं और बारूद का ऐसा गणित सामने आ रहा है कि गणितज्ञ भी माथा पकड़ लें। लाइसेंस 600 किलो का, लेकिन गोदाम में 1000 किलो से ज्यादा माल! लगता है बारूद ने भी महंगाई के दौर में आत्मनिर्भर होकर खुद को बढ़ाना सीख लिया है। मजेदार बात यह है कि जिन जगहों पर सुरक्षा नियमों की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहीं नियम सबसे कम दिखाई देते हैं। स्कूल, कॉलेज, छात्रावास और आबादी के पास गोदाम ऐसे खड़े हैं जैसे बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ आतिशबाजी का प्रायोगिक प्रशिक्षण भी चल रहा हो। कागजों में सब कुछ व्यवस्थित रहता है लाइसेंस, क्षमता और नियम। बस जमीन पर पहुंचते ही बारूद का वजन, गोदाम की सीमा और जिम्मेदारी, तीनों का रूपांतरण हो जाता है। हादसा होने तक सब सामान्य रहता है, और हादसे के बाद अचानक सबको सुरक्षा याद आ जाती है। लगता है हमारे यहां बारूद से ज्यादा विस्फोटक चीज अगर कोई है, तो वह है लापरवाही जो हर जांच में नए रिकॉर्ड बना रही है।
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वंदे भारत का खिलौना संस्करण
झुंझुनू रेलवे स्टेशन पर खिलौना वंदे भारत दौड़ी तो लगा कि शेखावाटी ने आखिरकार अपनी रेल नीति खुद बना ली है। जब असली ट्रेन न मिले, तो खिलौने से ही काम चलाओ। देश के कई शहर वंदे भारत की रफ्तार नाप रहे हैं, जबकि शेखावाटी अभी भी आश्वासनों के प्लेटफॉर्म पर खड़ी अगली घोषणा का इंतजार कर रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां ट्रेनें चलती हैं, यहां मांगपत्र। रेल मंत्रालय के आंकड़ों में शेखावाटी शायद नक्शे पर मौजूद है, लेकिन रेल सुविधाओं की प्राथमिकता सूची में उसकी बोगी अभी तक जोड़ी नहीं गई। इसलिए लोगों ने खिलौना ट्रेन चलाकर याद दिलाया कि यह इलाका केवल चुनावी भाषणों का स्टेशन नहीं, लाखों यात्रियों की जरूरतों का भी जंक्शन है। विडंबना देखिए, जिन पटरियों पर लोग वंदे भारत की उम्मीद कर रहे हैं, वहां फिलहाल प्रतीक्षा ही सबसे नियमित सेवा है। अब सवाल यह है कि पहले असली ट्रेन आएगी या अगले प्रदर्शन में खिलौना ट्रेन का नया मॉडल?
बुलडोजर का भूगोल
जैसलमेर में सौ करोड़ की सरकारी जमीन आखिरकार सरकार को वापस मिल गई। यह खबर सुनकर जमीन भी शायद राहत की सांस ले रही होगी कि चलो, वर्षों बाद असली मालिक को मेरी याद तो आई। हमारे यहां जमीन का भी बड़ा दिलचस्प चरित्र है। जब तक वह बंजर रहती है, कोई उसे पूछता नहीं। जैसे ही सड़क, बाईपास या विकास की हवा लगती है, अचानक कई लोगों को सपना आने लगता है कि यह जमीन तो उनके पुरखों ने ही छोड़ी थी। फिर रातों-रात चारदीवारी उगती है, टीनशेड खिलते हैं और कब्जे की फसल लहलहाने लगती है। प्रशासन भी कम दिलचस्प नहीं। वह वर्षों तक दूरबीन से देखता रहता है और एक दिन अचानक बुलडोजर के साथ प्रकट होकर बताता है कि जमीन सरकारी है। इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले अक्सर उसे अपनी समझ लेते हैं, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड की स्मृति उनसे कहीं अधिक लंबी होती है। बुलडोजर देर से आता है, मगर जब आता है तो भूगोल का पाठ नए सिरे से पढ़ा जाता है।
कागज़ के बैसाखीधारी
सरकारी नौकरी की दौड़ में जहां हजारों वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थी वर्षों तक दर-दर भटकते हैं, वहीं कुछ लोग केवल कागज़ी बैसाखियों के सहारे मंज़िल तक पहुंच जाते हैं। कमाल यह कि उनकी चाल भी दुरुस्त रहती है और नौकरी भी सुरक्षित। झालावाड़ का मामला बताता है कि हमारे यहां दिव्यांगता शरीर में कम और फाइलों में ज़्यादा पाई जाती है। मेडिकल बोर्ड ने जब परतें खोलीं तो एक शिक्षक की दिव्यांगता छह प्रतिशत निकली और दूसरे की शून्य। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में दोनों इतने दिव्यांग थे कि आरक्षण का लाभ लेकर वर्षों से वेतन भी लेते रहे। हैरानी इस बात की नहीं कि फर्जी प्रमाण-पत्र बने, हैरानी यह है कि बारह साल तक व्यवस्था की आंखों पर भी शायद वही कागज़ी पट्टी बंधी रही। नौकरी मिल गई, वेतन मिलता रहा, पदोन्नति की उम्मीदें भी पलती रहीं और किसी को भनक तक नहीं लगी। अब गिरफ्तारी हुई है तो सवाल केवल दो शिक्षकों पर नहीं, उन दरवाजों पर भी है जहां से फर्जीवाड़ा मुस्कुराते हुए भीतर घुसा। वरना शून्य प्रतिशत दिव्यांगता का चालीस प्रतिशत आरक्षण में बदल जाना किसी चमत्कार से कम नहीं, और चमत्कार आमतौर पर सरकारी फाइलों में नहीं होते।
ताले में बंद करोड़ों का विकास
बाड़मेर में विकास का नया मॉडल सामने आया है। पहले करोड़ों रुपये खर्च कर निर्माण करो, फिर उसे ताले में बंद कर दो। पीजी कॉलेज के पास बना सुलभ कॉम्प्लेक्स लम्बे समय से बंद पड़ा है, मानो आमजन की सुविधा नहीं बल्कि कोई खजाना हो। महिलाओं के लिए लाखों रुपये से बना पिंक टॉयलेट भी महीनों से उद्घाटन की प्रतीक्षा में धूल फांक रहा है। सबसे दिलचस्प हाल 16 करोड़ रुपये के टाउन हॉल का है। भवन तैयार, कुर्सियां तैयार, सुविधाएं तैयार, लेकिन उद्घाटन का मुहूर्त शायद अभी तक नहीं निकला। ऐसा लगता है कि यहां निर्माण कार्य पूरा होना पर्याप्त नहीं, किसी वीआईपी के फीता काटने की कृपा भी जरूरी है। जनता पूछ रही है कि सुविधाएं उपयोग के लिए बनती हैं या ताले सजाने के लिए? यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी आम आदमी को लाभ नहीं मिले, तो विकास कागजों में जरूर दिखाई देगा, जमीन पर नहीं। बाड़मेर में फिलहाल ताले ही सबसे बड़े लाभार्थी नजर आते हैं।






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