टूटते सांसदों की नई फसल!
अब एक नई फसल उगी है- टूटते हुए सांसदों की फसल। इसकी खासियत यह है कि इसे किसी खाद, पानी या वैचारिक सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। केवल सत्ता की धूप, सिक्कों की खाद और संभावनाओं की हवा मिल जाए तो यह...

बोल हरि बोल – पार्टीगण कृपया ध्यान दें, आपके माननीय कुछ ही क्षणों में बदलने वाले हैं..
हरीश मलिक,
वरिष्ठ लेखक और व्यंग्यकार
हमारा लोकतंत्र बड़ा उर्वर है। इसकी बड़ी विशेषता है कि यहां हर चीज बदल सकती है- सरकार, विचार, नारे, घोषणाएं और कभी-कभी नेताओं की अंतर्आत्मा भी। केवल एक चीज स्थिर है- कुर्सी। हर दल-बदल की यात्रा अंततः कुर्सी की दिशा में जाती है। इस यात्रा में हर मौसम में कुछ न कुछ उगता रहता है। कभी विचारधाराएं उगती थीं, आंदोलन उगते थे, नेता उगते थे। अब एक नई फसल उगी है- टूटते हुए सांसदों की फसल। इसकी खासियत यह है कि इसे किसी खाद, पानी या वैचारिक सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। केवल सत्ता की धूप, सिक्कों की खाद और संभावनाओं की हवा मिल जाए तो यह अपने-आप दूसरी जमीन पर लहलहाने लगती है।
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दिलचस्प यह भी है कि जिस सियासत में पहले चुनाव जीतने की दौड़ में शामिल होते थे, वहां अब पार्टी छोड़ने की दौड़ में शामिल हो रहे हैं। सांसदों की हालत ऐसी हो गई है जैसे किसी स्टेशन पर आखिरी ट्रेन खड़ी हो और सबको डर हो कि कहीं सीट न छूट जाए। पुराने जमाने में दल बदलने से पहले नेता अपने विचार बदलते थे। अब विचारों को ज्यादा परेशान नहीं किया जाता, उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता है और केवल सांसद महोदय अपना पता बदल लेते हैं। लोकतंत्र भी बड़ा सहनशील है। वह हर पांच साल में जनता से पूछता है, ‘आपने जिन्हें भेजा था, वे अभी वहीं हैं या किसी और पार्टी के घर चाय पी रहे हैं?’
पार्टी छोड़ने की इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता का खास नहीं आम सांसदों ने उद्घाटन किया। आम आदमी पार्टी के सांसद भाजपा में चले गए। यह राजनीति का वह अध्याय है, जिसमें विचारधारा को सम्मानपूर्वक कुर्सी के नीचे रख दिया जाता है और नेता नई पार्टी में प्रवेश करते समय कहते हैं- ‘मेरे विचार तो वही हैं, बस उनका पता बदल गया है।’ आम आदमी पार्टी का हाल कुछ वैसा है जैसे कोई व्यक्ति मोहल्ले में स्वच्छता अभियान चलाए और एक दिन पता चले कि उसके अपने घर के लोग ही सामान समेटकर पड़ोस में रहने चले गए हैं।
जिन लोगों ने राजनीति में नई संस्कृति, नई भाषा और नए आदर्शों का बोर्ड लगाया था, आज उन्हें अपने ही सांसदों के जाने के बाद पुराने राजनीतिक मुहावरे खोजने पड़ रहे हैं। वैसे ‘आप’ को आत्मनिरीक्षण तो करना चाहिए। जिसने राजनीति में ईमानदारी और नई संस्कृति का झाड़ू लगाने का दावा किया था, आज उसके अपने सांसद ही घर की धूल बनकर क्यों उड़ रहे हैं?
टीएमसी सांसदों ने तो दल-बदल की दुनिया में शोध का नया अध्याय लिख दिया। लोग जब घर छोड़ते हैं तो कम से कम ऐसे घर में जाते हैं, जिसका पता पड़ोसी जानते हों। लेकिन टीएमसी के सांसद अनाम-सी नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में चले गए। ऐसा लगा जैसे कोई आदमी अपना पुराना महल छोड़कर ऐसी झोपड़ी में रहने चला जाए, जिसका पता खुद झोपड़ी को भी मालूम न हो। हालत यह हो गई कि देश की जनता तो छोड़िए, शायद गूगल बाबा को भी चश्मा साफ करके देखना पड़ा कि आखिर यह नई राजनीतिक प्रजाति कहां से प्रकट हो गई। टीएमसी को जरूर सोचना चाहिए कि बंगाल में कभी जिसकी आवाज तूफान जैसी गूंजती थी, उसके सांसद अब फुसफुसाहट की तरह गायब क्यों हो रहे हैं?
इस बीच शिवसेना (उद्धव) की कहानी तो किसी पुराने मकान जैसी हो गई, जिसमें पहले दीवारें टूटीं, फिर दरवाजे उखड़े और अब खिड़कियां भी दूसरी इमारत में फिट होने के लिए निकल रही हैं। सुनते हैं कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ चला है। बाघ जंगल छोड़ रहा है और जंगल के मालिक को समझ नहीं आ रहा कि दहाड़े या रोए। संजय राउत का दर्द भी बड़ा मानवीय है। कल तक जिन नेताओं के साथ फोटो खिंचवाते हुए मुस्कान कान तक पहुंच जाती थी, आज उन्हीं के लिए शब्द ऐसे निकल रहे हैं, जैसे शब्दकोश ने बदला लेने की कसम खा ली हो। जब तक सांसद अपने रहे, वे शेर हैं; दूसरे के हुए तो गद्दार का तमगा मिल गया।
उत्तर प्रदेश की सियासत भी इस टूट महोत्सव से अछूती नहीं रहना चाहती। एसबीएसपी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के 25 सांसदों के टूटने का दावा करके राजनीतिक बाजार में नया शेयर छोड़ दिया। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने तो बड़ी मासूमियत से कह दिया कि हम तो किसी को तोड़ नहीं रहे, सांसद खुद ही टूटने को तैयार बैठे हैं। यह बयान सुनकर बुजुर्गों को पुराने दिनों की बैलगाड़ी याद आ गई होगी, जो खुद चलकर दूसरे गांव चली जाती थी और मालिक बाद में कहता था कि हमने तो भेजा ही नहीं था, बैल की अपनी ही इच्छा थी। क्षेत्रीय दलों की सियासत में हालात ऐसे हो गए हैं कि आने वाले समय में संसद के बाहर एक नया बोर्ड लगाना पड़ेगा- “राजनीतिक दलों से अनुरोध है कि कृपया अपना सामान संभालकर रखें। सांसदों की पार्टी कभी भी बदल सकती है।”






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