मातृत्व की राह में मौत का साया
कोटा और बीकानेर के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौत और किडनी फेल होने की घटनाएं चिंताजनक हैं। अब जोधपुर में भी सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की हालत बिगड़ने के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं...

सिजेरियन डिलीवरी के बाद कोटा में पांच व बीकानेर में दो प्रसूताओं की मौत ने खड़े किए कई सवाल
कोटा और बीकानेर के मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की मृत्यु और किडनी प्रभावित होने के मामले सामने आने से एक बार फिर राज्य की चिकित्सा व्यवस्था कटघरे में आ गई है। इसी कड़ी में जोधपुर के पावटा अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं की हालत बिगड़ना अस्पतालों में बरती जा रही भारी लापरवाही की ओर संकेत करता है। पिछले दिनों प्रतापगढ़ और सलूंबर में करीब डेढ़ दर्जन बच्चों की मौतों ने आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति को उजागर किया था, जबकि गत वर्ष कफ सिरप से बच्चों की मौतों ने सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए थे। अब कोटा और बीकानेर में प्रसूताओं की मौतों के संभावित कारणों में नकली ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की आशंका भी जताई जा रही है। ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का मुख्य उपयोग प्रसव प्रक्रिया को सुगम बनाने तथा प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। यदि इस प्रकार के महत्वपूर्ण इंजेक्शन भी नकली पाए जाते हैं, तो यह महिलाओं के जीवन के लिए गंभीर खतरा है।
Table Of Content
- सिजेरियन डिलीवरी के बाद कोटा में पांच व बीकानेर में दो प्रसूताओं की मौत ने खड़े किए कई सवाल
- कोटा में पांच प्रसूताओं की मौत
- जोधपुर में भी प्रसूताओं की हालत बिगड़ी
- बीकानेर में दो प्रसूताओं की मौत, चार की किडनी फेल
- क्या होता है मातृ मृत्यु अनुपात
- मातृ मृत्यु अनुपात को कम करने के क्या हैं उपाय
- संविदा पर कार्मिकों की भर्ती से भी बिगड़े हालात
- बढ़ रही हैं सिजेरियन डिलीवरी
- सरकार और सिस्टम की घोर विफलता
- पूरी क्षमता के साथ सेवाएं दे रहे हैं चिकित्सक
- मातृ मृत्यु के मामलों में भारत दूसरे स्थान पर
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सिजेरियन डिलीवरी के बाद कोटा में पांच प्रसूताओं की मृत्यु हो गई, जबकि बीकानेर में दो महिलाओं की जान चली गई। प्रसव के बाद हुए संक्रमण के कारण बीकानेर में छह प्रसूताओं की किडनी प्रभावित हो गई, जिनमें से दो की मृत्यु हो चुकी है। जोधपुर में सिजेरियन डिलीवरी के बाद आठ महिलाओं की हालत गंभीर बनी हुई है। एक ओर सरकार जच्चा-बच्चा की सुरक्षा के लिए महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रोत्साहित करती है और उन्हें आर्थिक सहायता भी प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी प्रसूताओं की मृत्यु के मामले सामने आ रहे हैं।
हाल ही में एसआरएस 2022-24 में मातृ मृत्यु अनुपात से जुड़े जो आंकड़े सामने आए हैं, वे भी इसी प्रकार के संकेत देते हैं। गौरतलब है कि एसआरएस 2021-23 में राजस्थान का मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) 86 था, जो एसआरएस 2022-24 में बढ़कर 87 हो गया है। यद्यपि यह वृद्धि मामूली है, फिर भी यह दर्शाती है कि मातृ मृत्यु अनुपात में कमी लाने के प्रयास आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। राज्य सरकार को यह समझना होगा कि समस्या की अनदेखी करने से स्थिति और गंभीर हो सकती है। सरकार को चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता, जवाबदेही और उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
कोटा में पांच प्रसूताओं की मौत
गत माह कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज और जेके लोन अस्पताल में एक के बाद एक पांच प्रसूताओं की मृत्यु तथा कुछ महिलाओं की किडनी फेल होने की घटनाओं से हड़कंप मच गया था। मामला सामने आने पर सबसे पहले स्थानीय जांच समिति का गठन किया गया। इसके बाद जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के चिकित्सकों की एक जांच समिति बनाई गई। एम्स की टीम ने भी मामले की जांच की। इन तीनों जांच समितियों की रिपोर्ट के आधार पर एक उच्च स्तरीय समिति को अंतिम रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
जोधपुर में भी प्रसूताओं की हालत बिगड़ी
जोधपुर के पावटा स्थित जिला अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद आठ महिलाओं की तबीयत बिगड़ गई। इनमें से दो प्रसूताओं को किडनी में संक्रमण हुआ है। सभी महिलाओं के ऑपरेशन एक ही दिन हुए थे। संक्रमण की आशंका के चलते ऑपरेशन थिएटर सील कर दिया गया है। गौरतलब है कि जिस दिन महिलाओं की हालत बिगड़ी, उस दिन चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर जोधपुर में ही थे, लेकिन उन्हें इस बात की जानकारी नहीं मिली।
बीकानेर में दो प्रसूताओं की मौत, चार की किडनी फेल
बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज से जुड़े पीबीएम अस्पताल में भी दो प्रसूताओं की मृत्यु हो चुकी है। यहां डिलीवरी के बाद एक-एक कर छह महिलाओं की किडनी फेल हो गई। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कई प्रसूताओं को बार-बार डायलिसिस कराना पड़ा। यहां भी ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और इंजेक्शन लगाए जाने के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने की बात सामने आई है।
मृत्यु का वास्तविक कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन अस्पताल की व्यवस्थाओं और संक्रमण नियंत्रण उपायों को लेकर भी प्रबंधन पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या होता है मातृ मृत्यु अनुपात
एक निश्चित समयावधि में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर होने वाली मातृ मृत्यु की संख्या को ‘मातृ मृत्यु अनुपात’ (एमएमआर) कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों के तहत वैश्विक मातृ मृत्यु अनुपात को प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 70 से कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
मातृ मृत्यु अनुपात को कम करने के क्या हैं उपाय
किशोरियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और बाल विवाह पर रोक लगाने के साथ-साथ प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना तथा एनीमिया और कुपोषण नियंत्रण कार्यक्रमों का विस्तार करना आवश्यक है। आपातकालीन प्रसूति एवं नवजात देखभाल सेवाओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की विशेष निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने के साथ ही अस्पतालों और बाजार में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
अस्पतालों में स्वच्छता तथा ऑपरेशन थिएटर और उपकरणों को संक्रमणमुक्त रखने में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अस्पताल से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति में मरीजों के प्रति संवेदनशीलता और अपने दायित्वों के प्रति ईमानदारी की भावना हो।
संविदा पर कार्मिकों की भर्ती से भी बिगड़े हालात
राजस्थान में अस्पतालों की व्यवस्था प्रभावित होने का एक बड़ा कारण संविदा पर कर्मचारियों की भर्ती को भी माना जाता है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में लगभग 20,000 ठेकाकर्मी कार्यरत हैं। तकनीशियन, फार्मासिस्ट, नर्सिंगकर्मी और कंप्यूटर ऑपरेटर सहित अनेक कर्मचारी संविदा पर सेवाएं दे रहे हैं। स्थिति यह है कि पूरी ड्यूटी देने के बावजूद कई कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल पाती।
अल्प वेतन पर कार्य करने वाले संविदा कार्मिकों से उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं की अपेक्षा करना कठिन है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अस्पतालों में संविदा भर्ती पर निर्भरता कम कर नियमित कर्मचारियों की नियुक्ति पर अधिक जोर दिया जाए।
बढ़ रही हैं सिजेरियन डिलीवरी
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार राजस्थान के शहरी निजी अस्पतालों में प्रसव के लिए जाने वाली लगभग हर दूसरी महिला की सिजेरियन डिलीवरी होती है। हाल ही में जारी एक सर्वे के अनुसार राज्य में सिजेरियन डिलीवरी की औसत दर 35 प्रतिशत है। शहरी निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा 49.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है। देश के निजी अस्पतालों में भी लगभग 54 प्रतिशत प्रसव सिजेरियन डिलीवरी के माध्यम से होते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश या समाज में 10 से 15 प्रतिशत की सिजेरियन दर को स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त माना जाता है। इस दृष्टि से राजस्थान की 35 प्रतिशत तथा शहरी निजी अस्पतालों की 49.4 प्रतिशत सिजेरियन दर डब्ल्यूएचओ के मानकों से बहुत अधिक है।
देशभर में पिछले दो दशकों के दौरान सिजेरियन प्रसव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके बावजूद बिहार में कुल डिलीवरी में सिजेरियन डिलीवरी का हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत ही है, जबकि झारखंड और मध्य प्रदेश में यह करीब 16 प्रतिशत है। हालांकि, इसका एक प्रमुख कारण इन राज्यों के सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन की सीमित सुविधाएं भी हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि जिन राज्यों में सिजेरियन ऑपरेशन कम हो रहे हैं, वे अन्य राज्यों के लिए आदर्श उदाहरण हैं। अनावश्यक सिजेरियन डिलीवरी से बचना आवश्यक है, लेकिन प्रसूता की जान जोखिम में डालकर सामान्य प्रसव पर जोर देना भी उचित नहीं है। मरीज की स्थिति को देखते हुए अंतिम निर्णय चिकित्सक ही बेहतर तरीके से कर सकता है।
सरकार और सिस्टम की घोर विफलता
कोटा में पांच प्रसूताओं की मौतें सामान्य घटनाएं नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की घोर संवेदनहीनता का परिणाम हैं। ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण की आशंका जताई गई है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब भी कई महिलाएं जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही हैं तथा किडनी फेल होने जैसी गंभीर स्थिति में उपचाराधीन हैं। सरकार को तत्काल घोषणा करनी चाहिए कि यदि प्रभावित महिलाओं की किडनी स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होती है, तो उनके किडनी प्रत्यारोपण और भविष्य के संपूर्ण उपचार का खर्च सरकार वहन करेगी। केवल कोटा ही नहीं, बीकानेर की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। वहां भी प्रसूताओं की किडनी फेल होने के पीछे अस्पतालों की बदहाली, गंदगी और ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण की आशंकाएं सामने आई हैं।
ये घटनाएं संकेत देती हैं कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। कोटा और बीकानेर की इन घटनाओं को महज हादसा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए तथा पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए। यह पूरे सिस्टम की गंभीर विफलता है, जिसकी कीमत निर्दोष महिलाओं को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ रही है। – अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री
पूरी क्षमता के साथ सेवाएं दे रहे हैं चिकित्सक
कोटा और बीकानेर में प्रसूताओं की मौत के मामलों में सरकारी अस्पतालों पर लापरवाही के आरोप लगाए जा रहे हैं, लेकिन इस विषय को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। सरकारी अस्पताल सबसे जटिल और गंभीर परिस्थितियों वाले मरीजों का उपचार करते हैं तथा चिकित्सक पूरी क्षमता और समर्पण के साथ अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
सरकारी अस्पतालों में अधिकांश ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी स्थिति पहले से ही अत्यंत गंभीर होती है। कई बार निजी अस्पताल उपचार से इनकार कर देते हैं या अधिक खर्च के कारण मरीज सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं। आपातकालीन और गंभीर मरीजों का उपचार करना स्वास्थ्य सेवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे मामलों में मरीजों के बचने की संभावना सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कम होती है। इसके बावजूद चिकित्सक हर संभव प्रयास करते हैं। दुर्भाग्यवश जब कोई अप्रिय घटना होती है, तो उसकी चर्चा अधिक होती है, जबकि गंभीर मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। किसी मरीज को वेंटिलेटर पर रखना इस बात का संकेत है कि उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर है। ऐसे मामलों में भी चिकित्सक मरीज को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं।
महिलाओं की मृत्यु को प्रसव के दौरान उत्पन्न जटिलताओं से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन चिकित्सा प्रोटोकॉल के पालन, प्रसव प्रक्रिया तथा प्रसूताओं की देखभाल में संभावित लापरवाही से जुड़ी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। घटना के बाद कई दवाओं के नमूने जांच के लिए भेजे गए, जिनमें ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के कुछ नमूनों में दवा का कंटेंट शून्य पाया गया। इससे नकली या गुणवत्ताहीन दवाओं की आशंका को बल मिला है। यदि बाजार में नकली दवाएं और इंजेक्शन उपलब्ध हैं, तो यह दवा निगरानी व्यवस्था और सरकारी तंत्र दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। – गजेंद्र सिंह खींवसर, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री, राजस्थान
मातृ मृत्यु के मामलों में भारत दूसरे स्थान पर
एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में होने वाली मातृ मृत्यु के 36 प्रतिशत मामले केवल पांच देशों—नाइजीरिया, भारत, इथियोपिया, पाकिस्तान और कैमरून—में दर्ज किए जाते हैं। ‘द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी एंड विमेंस हेल्थ’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वर्ष 2023 में नाइजीरिया में सबसे अधिक मातृ मृत्यु दर्ज की गई। इस मामले में भारत दूसरे स्थान पर है, जहां वर्ष 2023 में 24,700 महिलाओं की मातृत्व संबंधी कारणों से मृत्यु हुई।
विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। एसआरएस 2022-24 की रिपोर्ट के अनुसार देश का मातृ मृत्यु अनुपात 87 है, जो संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य के निर्धारित स्तर 70 से 17 अंक अधिक है। स्पष्ट है कि वर्ष 2030 तक इस लक्ष्य को हासिल करने के मार्ग में अभी कई चुनौतियां मौजूद हैं।
गौरतलब है कि मातृ मृत्यु अनुपात को किसी भी क्षेत्र में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार गर्भावस्था के दौरान अथवा गर्भावस्था समाप्त होने के 42 दिनों के भीतर किसी महिला की मृत्यु को मातृ मृत्यु की श्रेणी में रखा जाता है।






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