बदलते राजनीतिक समीकरणों का दौर
जाने-माने शायर जावेद हसन उर्फ वसीम बरेलवी का एक शेर है –
“उसी को जीने का हक है इस जमाने में,
जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए।”
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आजकल देश की राजनीति में कुछ ऐसा ही हो रहा है। देश में इससे पहले दल-बदल का इतना बड़ा खेल शायद ही कभी हुआ हो, जितना आज देखने को मिल रहा है। खुला खेल फर्रुखाबादी है। पहले आम आदमी पार्टी, फिर तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बाद अब उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल में भी टूट-फूट की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है। ऐसा लगता है कि देश में सिद्धांतों की राजनीति की बजाय सुविधा की राजनीति हावी हो गई है। पता नहीं हमारे नेताओं की अंतरात्मा हमेशा सत्ता के साथ ही क्यों खड़ी दिखाई देती है।
दरअसल, सारा खेल परिसीमन विधेयक को लेकर बताया जा रहा है। याद कीजिए, दो माह पहले सरकार लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम की आड़ में संसदीय क्षेत्रों के नए सिरे से गठन के लिए संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई थी। तब विधेयक के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। सरकार का वह प्रयास सफल नहीं हो पाया था। इससे सरकार की काफी फजीहत भी हुई थी। हालांकि मीडिया प्रबंधन में माहिर सरकार ने पूरे मुद्दे को नारी शक्ति वंदन अधिनियम का रूप देकर विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर दिया था। एनडीए नेताओं का कहना था कि विपक्ष की मंशा महिला विरोधी है। बाद के विधानसभा चुनावों, खासकर पश्चिम बंगाल और असम में, एनडीए को इसका राजनीतिक लाभ भी मिला। विपक्ष एनडीए के इस नैरेटिव का प्रभावी जवाब नहीं दे सका।
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यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि सितंबर 2023 में संसद के विशेष अधिवेशन के दौरान नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका था और तब सत्ता पक्ष तथा विपक्ष- दोनों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन अब चर्चा इस बात की है कि सरकार इसकी आड़ में परिसीमन से जुड़ा विधेयक पारित कराना चाहती है।
कुछ दिन पहले तक लोकसभा में एनडीए की सदस्य संख्या 292 थी, जो तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उबाठा) में विभाजन के बाद बढ़कर 318 बताई जा रही है। सरकार की कोशिश इसे दो-तिहाई बहुमत यानी 362 से अधिक तक ले जाने की है। यही कारण है कि विपक्षी सांसद अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर तेजी से एनडीए के पाले में आते दिखाई दे रहे हैं। सरकार की यही कोशिश राज्यसभा में भी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की है, क्योंकि कोई भी संविधान संशोधन दोनों सदनों में विशेष बहुमत के बिना पारित नहीं हो सकता।
244 सदस्यीय राज्यसभा में एनडीए के सदस्यों की संख्या 152 बताई जा रही है, जो दो-तिहाई बहुमत से 11 कम है। इसी बीच मिजोरम से नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य लालतलुआंगकिमा ने कहा है कि वे संसद में तटस्थ सदस्य के रूप में रहेंगे, लेकिन कुछ शर्तों के साथ सत्तापक्ष को समर्थन जारी रखेंगे। ज्ञात हो कि वे मिजोरम की सत्तारूढ़ जोराम पीपुल्स मूवमेंट (जेपीएम) के एकमात्र राज्यसभा सदस्य हैं। उधर, अटकलें यह भी हैं कि आने वाले दिनों में कुछ और राज्यसभा सदस्य इस्तीफा दे सकते हैं।
यह सही है कि सत्ता के लिए बहुमत जरूरी होता है, लेकिन लोकतंत्र केवल अंकगणित का खेल नहीं है। यहां आंकड़ों की बाजीगरी के साथ-साथ लोकलाज और लोकहित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वरिष्ठ पत्रकार के.पी. सिंह कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने केवल संविधान की लिखित धाराओं के सहारे नहीं, बल्कि संवैधानिक परंपराओं, राजनीतिक मर्यादाओं और संस्थागत आत्मसंयम के आधार पर भी अपनी यात्रा तय की है।
उनके अनुसार, संविधान निर्माताओं ने स्वयं स्वीकार किया था कि किसी भी संविधान में शासन और राजनीति के हर संभावित विवाद का समाधान शब्दशः नहीं लिखा जा सकता। इसलिए संविधान के अक्षर के साथ-साथ उसकी मंशा, उसकी आत्मा और उसके मूल उद्देश्यों को भी समझना आवश्यक है। सवाल यह है कि क्या वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसा होता दिखाई देता है? इतिहास इसका मूल्यांकन अवश्य करेगा।
तिनका-तिनका बिखर रहा ममता का सपना
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित ममता बनर्जी के सामने अब पार्टी का अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। उनके 80 में से 62 विधायक स्वयं को असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधि बताते हुए सदन में अलग बैठने लगे हैं। इतना ही नहीं, बागी विधायकों में से एक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया है। इस पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी है।
इस बीच, बागी गुट ने स्वयं को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित करते हुए विधायक अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष बना दिया है। बागियों ने ममता बनर्जी को पार्टी में सलाहकार पद की पेशकश भी की है।
उधर, तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने अलग गुट बनाकर त्रिपुरा की एक गैर-मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का दावा किया है। बागी खेमे की नेता काकोली घोष दस्तीदार का कहना है कि वे अब देश के विकास में सहभागी बनना चाहते हैं और केंद्र की लोकप्रिय एनडीए सरकार का समर्थन करेंगे।
दूसरी ओर, राज्यसभा के चार सांसद- सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रे, प्रकाश बारिक और कोयल मलिक ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। अब यदि राज्यसभा की इन सीटों पर उपचुनाव होता है तो स्वाभाविक रूप से भाजपा के लिए अपने उम्मीदवारों को विजयी बनाना अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा।
कभी जिस तृणमूल कांग्रेस को ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत और जनाधार का पर्याय माना जाता था, आज वही पार्टी अपने सबसे बड़े अस्तित्वगत संकट से गुजरती दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी ने तीन दशक के लंबे राजनीतिक संघर्ष से जिस संगठन को खड़ा किया था, उसके भीतर पैदा हुई यह बगावत केवल नेतृत्व का संकट नहीं, बल्कि संगठनात्मक असंतोष की भी कहानी कहती है।
राजनीति में हार-जीत लगी रहती है, लेकिन चुनावी पराजय के बाद जिस तेजी से पार्टी के भीतर दरारें उभरती दिखाई दे रही हैं, उसने ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता और संगठन पर उनकी पकड़—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि यह सिलसिला आगे भी जारी रहा तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल इतना तय है कि ममता बनर्जी के लिए यह दौर राजनीतिक संघर्ष से कहीं अधिक राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई का बनता जा रहा है।
कभी विपक्षी एकता की धुरी मानी जाने वाली ममता बनर्जी आज अपने ही घर को संभालने में व्यस्त दिखाई दे रही हैं। यही राजनीति का सबसे बड़ा सच भी है, जो कल तक दूसरों की राजनीति तय कर रहा था, आज उसे अपनी राजनीति बचाने की चिंता सता रही है।
इंडी गठबंधन : अपनी ढपली, अपना राग
एक तरफ एनडीए अपना कुनबा बढ़ाने में जुटा है, तो दूसरी तरफ इंडी गठबंधन में सिर-फुटौव्वल जारी है। गठबंधन के घटक दल ही एक-दूसरे के उम्मीदवारों को हराने में जी-जान से जुटे दिखाई दे रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के चुनावी अनुभव बताते हैं कि विपक्षी एकता का दावा जितना मजबूत मंचों और प्रेस कॉन्फ्रेंसों में दिखाई देता है, जमीनी राजनीति में वह उतना ही कमजोर नजर आता है।
देश ने देखा है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, असम, केरल और पश्चिम बंगाल के चुनावों में इंडी गठबंधन के दल किस तरह आपसी खींचतान में उलझे रहे। नतीजा यह हुआ कि कई स्थानों पर एनडीए को अपेक्षाकृत आसान जीत मिलती चली गई। विपक्षी दलों के बीच समन्वय की कमी और नेतृत्व को लेकर असमंजस लगातार सामने आता रहा।
तमिलनाडु में तो स्थिति और भी दिलचस्प बताई जा रही है। कांग्रेस, कम्युनिस्ट दलों और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेताओं के टीवीके के साथ जाने की चर्चाओं ने डीएमके नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। कहा जा रहा है कि इस घटनाक्रम से मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन खासे असहज हैं। राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक चर्चा है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो डीएमके अपने राजनीतिक विकल्पों पर पुनर्विचार कर सकती है। हालांकि राजनीति में चर्चाएं और वास्तविकता हमेशा एक जैसी नहीं होतीं, फिर भी धुआं वहीं उठता है जहां कहीं न कहीं आग सुलग रही हो।
बिहार और झारखंड के हालिया राज्यसभा चुनावों ने भी इंडी गठबंधन की अंतर्विरोधों से भरी राजनीति को उजागर किया है। आरोप लगे कि कुछ विधायकों ने दलगत प्रतिबद्धता से अधिक व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता दी, जिसका नुकसान गठबंधन को उठाना पड़ा। राजनीति में संख्या बल जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण भरोसा भी होता है। और फिलहाल यही भरोसा विपक्षी खेमे में सबसे दुर्लभ वस्तु दिखाई दे रहा है।
मध्यप्रदेश में भी कई महत्वपूर्ण मौकों पर विपक्षी एकजुटता केवल बयानबाजी तक सीमित दिखाई दी। नेताओं के बीच तालमेल का अभाव और साझा रणनीति की कमी बार-बार सामने आती रही।
अगले वर्ष उत्तरप्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में विपक्षी राजनीति की असली परीक्षा अब शुरू होने वाली है। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बढ़ती दूरी किसी से छिपी नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद आम आदमी पार्टी ने अलग राह पकड़ ली है। दूसरी ओर, कांग्रेस अभी से पंजाब में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने में जुट गई है। दोनों दलों के बीच सहयोग की संभावनाएं लगातार कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं।
उत्तरप्रदेश में भी स्थिति कम दिलचस्प नहीं है। यहां टिकटों के बंटवारे को लेकर अभी से चर्चाओं का बाजार गर्म है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं। दोनों दलों के समर्थकों के बीच भी सीटों को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है।
उधर, समाजवादी पार्टी के भीतर संभावित असंतोष को लेकर भी अटकलों का दौर जारी है। राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव के नेतृत्व में संसदीय दल में टूट की आशंका व्यक्त की जा रही है। उत्तरप्रदेश सरकार के मंत्री ओमप्रकाश राजभर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य खुलकर ऐसी संभावना जता चुके हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी के नेता इन दावों को सिरे से खारिज कर रहे हैं, लेकिन रामगोपाल यादव की चुप्पी को लेकर राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं।
चर्चा यह भी है कि समाजवादी पार्टी आगामी राज्यसभा चुनाव में रामगोपाल यादव को दोबारा मौका नहीं दे सकती। मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल यादव पार्टी के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में यदि उन्हें लेकर कोई असहमति पैदा होती है, तो उसके राजनीतिक निहितार्थ दूरगामी हो सकते हैं।
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। एक ओर एनडीए अपने विस्तार और संख्याबल को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है, तो दूसरी ओर इंडी गठबंधन अपने अंतर्विरोधों से जूझता दिखाई दे रहा है। राजनीति में केवल सत्ता विरोध पर्याप्त नहीं होता; उसके लिए साझा दृष्टि, साझा नेतृत्व और साझा संघर्ष की भी आवश्यकता होती है।
फिलहाल विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती सत्ता पक्ष नहीं, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक कमजोरियां हैं। जब सहयोगी दल ही एक-दूसरे पर भरोसा न कर पा रहे हों, तब जनता को एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था का भरोसा दिलाना आसान नहीं होता। यही कारण है कि विपक्षी एकता का दावा जितना बड़ा दिखाई देता है, उसकी जमीन उतनी ही कमजोर नजर आती है।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि इंडी गठबंधन अपने अंतर्विरोधों पर काबू पाकर एक प्रभावी राजनीतिक विकल्प बन पाता है या फिर “अपनी ढपली, अपना राग” की स्थिति ही उसकी सबसे बड़ी पहचान बनकर रह जाती है।







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