गहलोत बनाम पायलट
साल 2022 के एपिसोड के बाद से अशोक गहलोत राजस्थान तक ही सीमित हैं। पिछले करीब तीन दशकों में शायद यह पहला मौका है, जब चुनाव हारने या सत्ता गंवाने के बाद गहलोत किसी केंद्रीय भूमिका में नहीं हैं। इतना ही नहीं, लंबे समय बाद वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के सदस्य भी नहीं हैं। वे राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के रूप में सक्रिय राजनीति कर रहे हैं। इससे पहले 2003 हो या 2013, कांग्रेस की हार के बावजूद गहलोत कभी संगठन महामंत्री तो कभी एआईसीसी सदस्य के रूप में कांग्रेस आलाकमान के नजदीक बने रहे।
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इसके उलट, 2023 की हार के बाद सचिन पायलट कांग्रेस आलाकमान की आंखों के तारे बने हुए हैं। वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और छत्तीसगढ़ के प्रभारी हैं, लेकिन उनका मन अब भी राजस्थान की राजनीति में ही रमा हुआ है। कुल मिलाकर, 2020 में शुरू हुई गहलोत बनाम पायलट की लड़ाई अब भी जारी है। यह विवाद आज भी कांग्रेस के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं है। गहलोत गाहे-बगाहे मानेसर प्रकरण को याद कर भाजपा का नाम लेते हुए पायलट पर निशाना साधते रहे हैं। जैसे-जैसे गांधी परिवार से पायलट की नजदीकी बढ़ने और उन्हें मेहनत का फल मिलने की चर्चाएं तेज होती हैं, गहलोत मानेसर का मुद्दा सामने ले आते हैं।
इस बार तो उन्होंने 14 अप्रैल से ही मानेसर के बहाने पायलट को घेरने का कोई अवसर नहीं छोड़ा। यहां तक कि हाल ही में भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी राधामोहन अग्रवाल ने टोंक में पायलट को ‘भगौड़ा’ कहा तो गहलोत ने उनका बचाव करते हुए भी मानेसर प्रकरण का उल्लेख करना नहीं भूले। इसके बाद उन्होंने नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को सूत्रधार बताते हुए भी मानेसर का जिक्र कर दिया।
फिर मई के आखिरी दिनों में गहलोत ने बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते थे, लेकिन उनके खिलाफ साजिश रची गई। इसमें भी उनका निशाना पायलट ही थे। चार वर्ष पुरानी घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लोग उन्हें आलाकमान की अवहेलना का ‘क्रिएटर’ मानते हैं, जबकि उनके समर्थकों की बगावत कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ नहीं, बल्कि पायलट के खिलाफ थी। यह बात पायलट को समझ में नहीं आ रही और बेवजह उन्हें खलनायक साबित किया जा रहा है।
गहलोत का यह दांव राजनीतिक हलकों में ‘शह और मात’ का खेल माना गया। अच्छे-अच्छे राजनीतिक पर्यवेक्षक भी सकते में आ गए और लगा कि अब गहलोत पायलट को आगे बढ़ाने वाली कांग्रेस आलाकमान की नीति के खिलाफ खुलकर सामने आ जाएंगे। लेकिन इसी दौरान पायलट से एक राजनीतिक भूल हो गई। उन्होंने करौली में अपने पिता राजेश पायलट की प्रतिमा के अनावरण समारोह में दिए गए भाषण में गहलोत और अपने पिता के बीच रही अदावत का परोक्ष उल्लेख कर दिया। उन्होंने गहलोत पर परोक्ष निशाना साधा, लेकिन यहां राजेश पायलट का उल्लेख राजनीतिक रूप से सचिन पायलट के लिए उलटा पड़ गया। कारण यह कि जिस आलाकमान की अवहेलना के लिए वे गहलोत को घेरते हैं, उनके पिता भी सीताराम केसरी के खिलाफ चुनाव लड़कर कांग्रेस आलाकमान की अवहेलना कर चुके थे।
गहलोत के बाद पायलट का बयान भी आलाकमान को नागवार गुजरा। दिल्ली से संभवतः गहलोत और पायलट दोनों को चेतावनी दी गई। इसके अगले दिन पायलट ने दौसा में कहा कि हम सब कांग्रेस पार्टी के सैनिक हैं और गहलोत उन्हें पुत्रवत स्नेह करते हैं। यानी उन्होंने ताजा विवाद को समाप्त करने के संकेत दे दिए। गहलोत ने भी पायलट की तारीफ कर दी। गहलोत के पक्ष में एक बात यह रही कि तीखा बयान देने के बाद उन्होंने विवाद को आगे नहीं बढ़ाया। इसका अर्थ यह निकाला गया कि उनका उद्देश्य अपना पक्ष दर्ज कराना था, कोई स्थायी युद्ध छेड़ना नहीं।
सुलह के संकेत
दूसरी ओर, पायलट ने भी एक परिपक्व राष्ट्रीय नेता के रूप में संयमित प्रतिक्रिया देकर खुद को धैर्यवान नेता के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश की। इसका असर हाल ही में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की कोटा यात्रा के दौरान दिखाई दिया। इतनी तल्खी और उसके बाद सुलह के संकेतों के बीच गहलोत और पायलट, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और अन्य नेताओं के साथ खिलखिलाकर हंसते हुए नजर आए। उनकी यह तस्वीर काफी चर्चा में रही।
दरअसल, राजस्थान ऐसा राज्य है, जहां अन्य राज्यों की तुलना में भाजपा को अपेक्षाकृत कड़ी चुनौती मिल रही है। कांग्रेस की अगुवाई वाला विपक्ष सड़क से लेकर सदन तक सक्रिय और आक्रामक नजर आता है। ऐसे में भाजपा की रणनीति भी यही रहती है कि गहलोत बनाम पायलट के विवाद को जीवित रखा जाए। यही कारण है कि कभी भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष पायलट को भाजपा में आने का न्योता देते हैं तो कभी राजेंद्र राठौड़ जैसे नेता कहते हैं कि गहलोत कभी पायलट को आगे नहीं आने देंगे।
एकता का संदेश देने की कांग्रेस की कोशिश
उधर कांग्रेस भी समझ चुकी है कि गहलोत-पायलट की लड़ाई का सीधा लाभ भाजपा को हो सकता है। इसलिए पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व पिछले कुछ समय से एकता का संदेश देने की कोशिश कर रहा है। राजस्थान उन राज्यों में शामिल है, जहां कांग्रेस भाजपा को मजबूत चुनौती दे सकती है। ऐसी स्थिति में यदि गहलोत और पायलट फिर से खुली लड़ाई में उतरते हैं तो दिल्ली नेतृत्व की पूरी रणनीति प्रभावित होगी। संभवतः यही कारण है कि दोनों नेताओं को सार्वजनिक बयानबाजी में संयम बरतने की हिदायत दी गई है।
हालांकि पिछले कुछ समय से कुछ भाजपा नेता और गहलोत विरोधी समूह सोशल मीडिया पर यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं कि राजस्थान में गहलोत युग अब अवसान की ओर है, लेकिन फिलहाल ऐसा संभव नहीं दिखता। कांग्रेस नेतृत्व यह भलीभांति जानता है कि 2023 की हार के बावजूद गहलोत आज भी पार्टी के सबसे अनुभवी चुनावी रणनीतिकारों में शामिल हैं। हाल के दिनों में भी वे लगातार भाजपा सरकार पर हमलावर हैं और राष्ट्रीय मुद्दों से लेकर राजस्थान के स्थानीय मुद्दों तक सरकार को घेरते रहे हैं।
कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गहलोत केवल एक नेता नहीं, बल्कि राजस्थान कांग्रेस के अनेक सामाजिक वर्गों—विशेषकर ओबीसी, अल्पसंख्यक और पारंपरिक कांग्रेस समर्थक तबकों के लिए भरोसेमंद चेहरा हैं।
कांग्रेस के पास फिलहाल ऐसा दूसरा नेता नहीं है, जो इन सभी वर्गों को एक साथ साध सके। दूसरी ओर, पायलट निःसंदेह युवाओं में लोकप्रिय हैं। वे एक बड़े जनाधार वाले नेता के रूप में उभर रहे हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक जड़ें अभी राजस्थान की राजनीति में गहलोत जितनी मजबूत नहीं हैं।
फिर भी कांग्रेस में नई पीढ़ी को आगे लाने की जो रणनीति चल रही है, उसके हिसाब से पायलट के अवसर बनते हैं। लेकिन पार्टी फिलहाल संतुलन की राजनीति पर चलना चाहती है। राजस्थान विधानसभा चुनाव में अभी करीब ढाई वर्ष का समय बाकी है। कांग्रेस अभी से किसी एक चेहरे को घोषित करने का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राजस्थान कांग्रेस की राजनीति का अगला अध्याय ‘गहलोत बनाम पायलट’ नहीं, बल्कि गहलोत की विरासत और पायलट के भविष्य के बीच संतुलन तय करेगा।







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