हरीश मलिक,
वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक
Table Of Content
- रणनीतिक नीति से आंतरिक संकट तक
- बलूचिस्तान: संसाधनों की धरती पर विद्रोह की आग
- पीओके : अधिकारों, संसाधनों और प्रतिनिधित्व का सवाल
- बढ़ती राजनीतिक आकांक्षाएं और विरोध प्रदर्शन
- एक भूगोल, दो तस्वीरें: जे एण्ड के और पीओके
- पीओके पर भारत का संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण
- खैबर-पख्तूनख्वा : आतंकवाद का लौटता हुआ साया
- शारदा पीठ और सांस्कृतिक विरासत का प्रश्न
- आर्थिक चुनौतियों से घिरा पाकिस्तान
- राजनीति, सेना और लोकतंत्र की चुनौती
- भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ
- पाकिस्तान इतिहास से सबक लेकर क्या आत्ममंथन करेगा?
कभी दक्षिण एशिया में अपनी सामरिक स्थिति और परमाणु शक्ति के कारण स्वयं को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने वाला पाकिस्तान आज अनेक आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहा है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद की पुनरावृत्ति, बलूचिस्तान में अलगाववादी गतिविधियां, खैबर-पख्तूनख्वा में बढ़ती हिंसा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में उभरता असंतोष उसके सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। दशकों तक सुरक्षा-केंद्रित नीतियों और सैन्य प्रभाव के बीच विकसित हुई व्यवस्था अब नई चुनौतियों का सामना कर रही है। हालात ऐसे हैं कि पाकिस्तान के सामने केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि शासन, विकास और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार का प्रश्न भी खड़ा हो गया है।
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रणनीतिक नीति से आंतरिक संकट तक
पाकिस्तान की सुरक्षा नीति का सबसे विवादास्पद पहलू यह रहा है कि उसने कुछ चरमपंथी समूहों को क्षेत्रीय रणनीति के उपकरण के रूप में देखा। लेकिन समय के साथ यही नीति उसके लिए गंभीर चुनौती बन गई। खैबर-पख्तूनख्वा और उससे लगे क्षेत्रों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। हाल के महीनों में हुए कई हमलों ने सुरक्षा एजेंसियों और आम नागरिकों दोनों को प्रभावित किया है। इससे स्पष्ट होता है कि आतंकवाद अब केवल क्षेत्रीय राजनीति का विषय नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है।
बलूचिस्तान: संसाधनों की धरती पर विद्रोह की आग
पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा और समुद्री संसाधनों से समृद्ध है। ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा को पाकिस्तान अपनी आर्थिक क्रांति की आधारशिला बताता है, लेकिन स्थानीय बलूच समूहों का लंबे समय से आरोप रहा है कि उनके क्षेत्र की संपत्ति का लाभ उन्हें नहीं मिलता। इस क्षेत्र से निकलने वाले संसाधनों का उपयोग पाकिस्तान के अन्य हिस्सों के विकास के लिए किया जाता है। इसी असंतोष ने कई दशकों से बलूच विद्रोह को जन्म दिया है। बलूच राष्ट्रवादी संगठनों का आरोप है कि क्षेत्र के संसाधनों का पर्याप्त लाभ स्थानीय आबादी तक नहीं पहुंचता। वहीं पाकिस्तान सरकार का कहना है कि विकास परियोजनाओं के माध्यम से क्षेत्र में निवेश बढ़ाया जा रहा है। हालांकि दशकों से जारी संघर्ष, जबरन गुमशुदगी के आरोप और सुरक्षा बलों के साथ टकराव ने बलूचिस्तान को पाकिस्तान की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौतियों में शामिल कर दिया है। इसीलिए बलूच राष्ट्रवादी संगठन पाकिस्तान सरकार और सेना पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाते रहे हैं। दशकों से चल रहे विद्रोह, जबरन गुमशुदगी के आरोप और सेना के साथ संघर्ष ने इस क्षेत्र को पाकिस्तान की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में बदल दिया है। बलूच अलगाववादी संगठन लगातार पाकिस्तान की सुरक्षा संस्थाओं और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा से जुड़ी परियोजनाओं को निशाना बनाते रहे हैं। यह विद्रोह पाक की क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।
पीओके : अधिकारों, संसाधनों और प्रतिनिधित्व का सवाल
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी हालात बदतर हैं। पिछले कुछ वर्षों में यहां महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक अधिकारों की कमी जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन हुए हैं। स्थानीय संगठनों और आम नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर आर्थिक राहत और राजनीतिक अधिकारों की मांग की है। यह असंतोष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारों और संसाधनों के बंटवारे से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे सवालों से भी जुड़ा हुआ है। इससे पाकिस्तान के उस दावे को खुलेआम चुनौती मिलती है कि उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में पूरी स्थिरता और संतोष का वातावरण है।
बढ़ती राजनीतिक आकांक्षाएं और विरोध प्रदर्शन
पीओके में विभिन्न समूह अधिक स्वायत्तता, राजनीतिक अधिकारों और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान सहित कई क्षेत्रों में हुए विरोध प्रदर्शनों ने यह संकेत दिया है कि स्थानीय आबादी के एक वर्ग में शासन और संसाधनों के बंटवारे को लेकर असंतोष मौजूद है। इन आंदोलनों के दौरान कई बार प्रमुख मार्गों और व्यापारिक संपर्कों पर भी असर पड़ा है।
एक भूगोल, दो तस्वीरें: जे एण्ड के और पीओके
1947 के विभाजन की त्रासदी यह भी रही कि एक ही सांस्कृतिक और भौगोलिक विरासत वाले क्षेत्रों की विकास यात्रा अलग-अलग दिशाओं में चली गई। भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, तकनीक और आधारभूत संरचना के क्षेत्रों में बड़े निवेश हुए हैं, वहीं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के क्षेत्रों में विकास, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं की बदतर हालात को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। दोनों क्षेत्रों की तुलना लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है। भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर और पीओके की विकास यात्रा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है। भारत प्रशासित क्षेत्रों में हाल के वर्षों में सड़क, रेल, स्वास्थ्य, पर्यटन और आधारभूत ढांचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। दूसरी ओर पीओके में विकास, रोजगार और संसाधनों के वितरण को लेकर समय-समय पर असंतोष सामने आता रहा है। यही वजह है कि पीओके के कई हिस्सों में स्थानीय असंतोष बार-बार सामने आता है।
पीओके पर भारत का संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत एक संघ है, जिसमें राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं। जम्मू और कश्मीर, जिसमें पीओके भी शामिल है, भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा है। भारतीय संसद ने 1994 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान के कब्जे में कश्मीर का जो हिस्सा (पीओके) है वो भारत का हिस्सा है और इसे वापस लिया जाएगा।
- भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार, आप जन्म से, वंशानुगत आधार पर और रजिस्ट्रेशन के माध्यम से भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं। भारतीय संविधान के मुताबिक, पीओके के लोग पहले से ही भारत के नागरिक माने जाते हैं, क्योंकि भारतीय संविधान जम्मू और कश्मीर, जिसमें पीओके भी शामिल है, के सभी निवासियों को भारतीय नागरिक मानता है।
- पीओके की जनता का आरोप यह है कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को कभी भी विकास की मुख्यधारा में शामिल ही नहीं किया। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद यहां उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर अत्यंत सीमित हैं। परिणामस्वरूप निराश युवाओं में भारत में विलय की चाहत नजर आने लगी है।
- 23वें कारगिल दिवस पर जम्मू में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा था, भारत का हिस्सा है और हमेशा-हमेशा रहेगा।
खैबर-पख्तूनख्वा : आतंकवाद का लौटता हुआ साया
पाकिस्तान का खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत एक बार फिर आतंकवादी हिंसा की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे संगठनों के हमले सुरक्षा बलों और आम नागरिकों दोनों को प्रभावित कर रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन चरमपंथी समूहों को कभी क्षेत्रीय रणनीति के तहत सहन किया गया या उपयोगी माना गया, वही अब पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। इससे वहां सामान्य जनजीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
शारदा पीठ और सांस्कृतिक विरासत का प्रश्न
हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल शारदा पीठ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित है। हिंदू परंपरा में इसे ज्ञान की देवी सरस्वती से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। भारत में कई नेताओं और सांस्कृतिक संगठनों ने इसके दर्शन खोलने और संरक्षण को लेकर अपनी इच्छा व्यक्त की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि बाबा अमरनाथ शिव के रूप में हमारे साथ हैं तो मां शारदा की शक्तिपीठ एलओसी के दूसरी तरफ कैसे रह सकती है? कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी मां शारदा की इस पीठ पर हिंदू देवी सरस्वती का मंदिर है, जिन्हें शारदा भी कहा जाता है।
आर्थिक चुनौतियों से घिरा पाकिस्तान
पाकिस्तान की आर्थिक कहानी भी चिंताजनक है। बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे पर दस्तक देना उसकी आर्थिक नीतियों की विफलता को दर्शाता है। पाकिस्तान के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार मार्च 2025 तक देश का सार्वजनिक कर्ज लगभग 76 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच गया था। इसके अलावा लगभग 87 अरब अमेरिकी डॉलर का बाहरी कर्ज भी था। पाक में वैश्विक संकट के चलते हाल के वर्षों में महंगाई भी बढ़ी है। यहां की अर्थव्यवस्था अब भी आईएमएफ की कठोर शर्तों, बिजली दरों में वृद्धि और कर सुधारों के दबाव में है। देश को बार-बार राहत पैकेजों की आवश्यकता पड़ रही है और ऊर्जा व ईंधन क्षेत्र का संकट अभी भी बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
राजनीति, सेना और लोकतंत्र की चुनौती
पाकिस्तान के इतिहास का एक स्थायी सच यह भी रहा है कि वहां सत्ता के दो केंद्र हमेशा मौजूद रहे हैं। एक निर्वाचित सरकार और दूसरा सैन्य प्रतिष्ठान। कई प्रधानमंत्रियों की सत्ता से विदाई और राजनीतिक दलों के बीच लगातार संघर्ष इस बात को दर्शाते हैं कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं अभी भी पूरी तरह स्वतंत्र और मजबूत नहीं हो पाई हैं। इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद उत्पन्न राजनीतिक तनाव और उनके समर्थकों तथा सुरक्षा एजेंसियों के बीच टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान की राजनीति केवल चुनावों से संचालित नहीं होती, बल्कि सेना और सत्ता प्रतिष्ठान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बनी रहती है।
भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ
- पाकिस्तान के भीतर पैदा हुए संकट भारत के लिए केवल राजनीतिक घटनाक्रम नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय रणनीति के दृष्टिकोण से बेहद अहम भी हैं। पहला लाभ यह है कि पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा तंत्र को अब अपनी आंतरिक समस्याओं बलूचिस्तान, खैबर-पख्तूनख्वा, पीओके और आतंकी हिंसा पर अधिक संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं।
- दूसरा बड़ा बदलाव यह है कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की नई सुरक्षा नीति का संकेत दिया है कि सीमा पार आतंकवादी हमलों का जवाब केवल कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहेगा। इस ऑपरेशन में केवल 25 मिनट में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों से जुड़े नौ अड्डे को नेस्तनाबूत किया गया। साथ ही लगभग 100 आतंकवादी मार गिराए।
- तीसरा लाभ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की आतंकवाद से जुड़ी छवि को लेकर बढ़ती आलोचना के रूप में दिखाई देता है। अब वैश्विक परिदृश्य में पाक की छवि आतंकी राष्ट्र या आतंक को संरक्षण देने वाली बन गई है।
- हालांकि किसी भी परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी की अस्थिरता भारत के लिए पूरी तरह लाभकारी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इससे सीमा सुरक्षा, शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसी नई चुनौतियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।
पाकिस्तान इतिहास से सबक लेकर क्या आत्ममंथन करेगा?
बलूचिस्तान से लेकर खैबर-पख्तूनख्वा और पीओके से इस्लामाबाद तक उभरती असंतोष की आवाजें संकेत देती हैं कि पाकिस्तान केवल आर्थिक या राजनीतिक संकट से नहीं जूझ रहा, बल्कि एक व्यापक संस्थागत और वैचारिक चुनौती का सामना कर रहा है। आने वाले वर्षों में उसकी स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं को कितना मजबूत बना पाता है, आर्थिक सुधारों को किस गति से आगे बढ़ाता है और क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रश्नों का समाधान किस प्रकार खोजता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पाकिस्तान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अपने अतीत की नीतियों और भविष्य की दिशा—दोनों पर गंभीर आत्ममंथन करना होगा।







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