सत्ता और संगठन के तालमेल से बदलेगी सत्ता की सूरत और सीरत
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
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राजस्थान में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की डबल इंजन सरकार ने अपना आधा कार्यकाल पूरा कर लिया। बीते ढाई वर्ष के दौरान सरकार ने कुछ बड़े फैसलों पर काम किया तो कई चुनौतियों ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका भी दिया। ऐसे में बचे हुए कार्यकाल में प्रदेश सरकार और भाजपा संगठन के समक्ष सबसे बड़ा काम और जिम्मा फिर से सत्ता में आने और परंपरा को बदलने पर होगा। राज्य में बीते कई दशकों में कांग्रेस और भाजपा की सरकारें निरंतर अंतराल में रही हैं। कोई भी प्रमुख पार्टी यहां दोबारा सत्ता में वापसी नहीं कर सकी। हाल ही पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल करने के बाद भाजपा की नजर 2027 में पंजाब और हिमाचल प्रदेश समेत सात राज्यों के चुनावों के साथ 2028 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी टिकी होंगी। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है तो हिमाचल में कांग्रेस की। दोनों ही बड़े राज्यों में सत्ता पर काबिज होने के लिए भाजपा ने तैयारियां तेज कर दी हैं। वहीं 2028 में राजस्थान के साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव होंगे। इनमें भी जहां पर भाजपा की सरकारें हैं, वहां पर जीत के लिए जमकर पसीना बहाना पड़ेगा।
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इधर, राजस्थान में आने वाले कुछ महीनों में भाजपा सरकार और संगठन के सामने सबसे बड़ा टास्क स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों का होगा। साथ ही बोर्ड, आयोग, प्राधिकरण और अकादमियों में राजनीतिक नियुक्तियों के साथ सरकार में बदलाव को लेकर भी सियासी दांव खेला जाएगा। इसकी शुरुआत राजस्थान लोक सेवा आयोग और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में हाल में की गई नियुक्तियों से हो गईं। सरकार ने आरपीएससी में प्रो. संतोष आनंद और डॉ. दीपक कुमार शर्मा को बतौर सदस्य नियुक्त किया तो माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में हनुमानसिंह राठौड़ को अध्यक्ष बनाया गया। करीब 11 महीने के अंतराल के बाद हुई नियुक्तियों को सरकार की ओर से राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर नई नियुक्तियों के संकेत के रूप में देखा गया। इन नियुक्तियों के साथ भाजपा सरकार की ओर से किए गए राजनीतिक और संवैधानिक नियुक्तियों की संख्या बढ़कर 12 हो गई। इससे पहले राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष के रूप में अरुण चतुर्वेदी की नियुक्ति अगस्त-2025 में हुई थी।
महत्वपूर्ण पदों पर जल्द नियुक्तियों के आसार
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राजस्थान में आमतौर पर सरकारें कार्यकाल के मध्य चरण में बोर्डों, आयोगों और वैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियों की प्रक्रिया तेज करती हैं। भाजपा सरकार भी अपने कार्यकाल के मध्य बिंदु को पार कर चुकी, इसलिए कई महत्वपूर्ण पदों पर जल्द नियुक्तियां होने की संभावना है। वर्तमान में लोकायुक्त समेत कई महत्वपूर्ण संस्थाओं और आयोगों के शीर्ष पद खाली पड़े हैं। पूर्व में कुछ आयोगों में नियुक्तियों में देरी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट को भी हस्तक्षेप करना पड़ा था। आने वाले दिनों में उन बड़ी संस्थाओं पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी, जिनके अध्यक्षों को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया था। इनमें बीस सूत्री कार्यक्रम एवं समन्वय समिति, राजस्थान खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड और राजस्थान राज्य कृषि उद्योग विकास बोर्ड प्रमुख हैं। कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल में 100 से अधिक राजनीतिक नियुक्तियां की थीं। इनमें चार नेताओं को कैबिनेट मंत्री और 31 से अधिक को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया था। कई नियुक्तियां विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुई थीं और कुछ नियुक्त व्यक्ति आचार संहिता लागू होने के कारण कार्यभार तक ग्रहण नहीं कर पाए थे।
इन आयोग और बोर्ड को मिले धणी-धोरी
भाजपा सरकार राजस्थान हेरिटेज संरक्षण प्राधिकरण, किसान आयोग, राज्य पशु कल्याण बोर्ड, सैनिक कल्याण सलाहकार समिति, अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास आयोग, देवनारायण बोर्ड, श्रीयादे माटी कला बोर्ड, विश्वकर्मा कौशल विकास बोर्ड, राज्य वित्त आयोग, आरपीएससी और आरबीएसई सहित 11 प्रमुख संस्थाओं में नियुक्तियां कर चुकीं।
भाजपा ने राजस्थान में बीते दिनों नए प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार की नियुक्ति की। उनको पूर्व संगठन महामंत्री चंद्रशेखर की जगह भेजा गया। राजस्थान में भाजपा सरकार के गठन के बाद यह पहला मौका होगा जब स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव नए संगठन महामंत्री के नेतृत्व में लड़े जाएंगे। ये चुनाव साल 2028 के विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल होंगे। पंचायत और निकाय चुनावों के परिणाम केवल स्थानीय सत्ता का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह संकेत भी देंगे कि प्रदेश में भाजपा सरकार और संगठन के प्रति जनता का भरोसा कितना मजबूत बना हुआ है। वहीं सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना भी अजेय कुमार की सबसे अहम जिम्मेदारी होगी। क्योंकि भाजपा के काम करने की शैली जिस तरह से है, उसमें सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को प्रभावी तरीके से जनता तक पहुंचाया जाए तो जीत की राह आसान हो जाती है। इसके लिए भाजपा संगठन काम करता है और बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क, कार्यकर्ता संवाद और जनसंपर्क अभियान चलाने की रणनीति बनाता है। निकाय चुनाव के दौरान सत्ता और संगठन का यही तालमेल जीत की राह को तैयार करेगा।
बचे कार्यकाल में इन चुनौतियों से निपटना होगा
सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती प्रदेश पर गहराता वित्तीय संकट है। पिछली सरकारों की योजनाओं और भारी कर्ज के बोझ के कारण सरकार खाली खजाने की समस्या से जूझ रही है। इसके चलते नगरीय निकायों और विभागों के लिए बजट की कमी बड़ी बाधा बनी हुई है। इससे स्थानीय विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। प्रमुख योजनाओं को निरंतर फंड देना और राज्य के विकास के लिए नए संसाधन जुटाने के लिए कड़ी परीक्षा देनी पड़ रही है। दूसरी बड़ी चुनौती नौकरशाही और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर है। मंत्रियों-विधायकों और अधिकारियों में समन्वय की कमी के कारण कलह की खबरें अक्सर सामने आती हैं। इसके कारण निर्णय और क्रियान्वयन के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। सरकार ने कई नीतियां और घोषणाएं कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर नौकरशाही में तालमेल बैठाकर उन्हें त्वरित गति से लागू करना बीते ढाई साल में बड़ी चुनौती बनी रही। इसी तरह से रोजगार और पेपर लीक के कारण सरकार पर युवाओं का दबाव बना रहा। पेपरलीक प्रकरण में बड़े मगरमच्छों पर कार्रवाई नहीं होने से विपक्ष भी सरकार पर कड़े सवाल उठाता रहा। खासकर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा सरकार को इस मसले पर घेरते रहे। वहीं ढाई लाख नौकरियां और अन्य रोजगार सृजन के वादों को पूरा करने की मांग युवाओं के बीच बनी हुई है। कांग्रेस की पिछली गहलोत सरकार को युवाओं की नाराजगी सबसे ज्यादा भारी पड़ी थी। ऐसे में सरकार के समक्ष युवाओं को साधे रखना बड़ी चुनौती बना रहेगा।
इन बड़ी योजनाओं पर काम दिखाना ही होगा
मुख्यमंत्री शर्मा 292 चुनावी संकल्पों में से 75 फीसदी से ज्यादा को पूरा किए जाने पर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। वे बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि राष्ट्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन में राजस्थान अग्रणी प्रदेश बन गया। उनकी सरकार ने कांग्रेस के पिछले कार्यकाल की तुलना में तेज प्रगति से काम किया। लेकिन जिन बड़ी योजनाओं को सरकार ने धरातल पर उतारा उनके नतीजों को लेकर संशय बना हुआ है। मसलन पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) की डीपीआर कब तैयार होगी और 21 जिलों को सिंचाई और पेयजल का लाभ कैसे मिलेगा? इसी तरह से राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट में 35 लाख करोड़ के एमओयू में से प्रदेश में निवेश और रोजगार के अवसर कितने पैदा होंगे और किस तरह से राज्य की किस्मत चमकेगी? पर्यटन नीति, टाउनशिप नीति, ऊर्जा नीति और मेडिकल टूरिज्म नीति तो घोषित कर दी गई, लेकिन इन पर काम फाइलों में दौड़ रहा है। धरातल पर इनको साकार करना सरकार के लिए कठिन काम होगा।
आसान नहीं वरिष्ठ नेताओं को साथ में लेकर चलना
सरकार के मुखिया भजनलाल और संगठन के मुखिया प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के लिए घर के अंदर तालमेल बिठाना भी बचे हुए ढाई साल और सत्ता वापसी के लिए कठिन लक्ष्य होगा। राज्यसभा की दो सीटों के लिए पूर्व अध्यक्ष सतीश पूनिया और राष्ट्रीय महासचिव अलका गुर्जर को भेजने के बाद भी राज्य में कई और वरिष्ठ नेता हैं, जिनको साथ लेकर चलना चुनौतीपूर्ण काम होगा। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और राजेन्द्र राठौड़ जैसे कई बड़े नेता फिलहाल राज्य की सत्ता से दूर हैं और संगठन के काम में लगे हैं। पूनिया और गुर्जर को राज्यसभा में भेजकर शीर्ष नेतृत्व ने राजस्थान में बड़े नेताओं और उनके समर्थकों की नाराजगी को दूर करने का प्रयास किया। साथ ही जातिगत समीकरण भी साध दिए। जाट और गुर्जर समुदाय लंबे समय से खुद को सत्ता में भागीदारी से दूर मानकर अंदरखाने नाराज चल रहे थे। आने वाले समय में सरकार और संगठन के प्रयास इसी दिशा में होंगे कि वे सबको साथ लेकर आगे बढ़ें। खासकर राजनीतिक नियुक्तियों में जातिगत संतुलन बनाने पर काम करें।







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