जीवन प्रबंधन
लियो टॉलस्टॉय का प्रसिद्ध कथन है, “यदि मनुष्य पूर्णता ढूंढ रहा है तो यकीन मानिए कि वो कभी संतुष्ट नहीं हो सकता।” पूर्णता का अर्थ है सबकुछ खुद की सोच के अनुसार हो और उसमें किसी तरह की गलती न हो। ये असंभव है। “सब कुछ मेरे अनुसार हो जाए और जो हो अपने आप में सम्पूर्ण और परिपूर्ण हो”, की चाहत में व्यक्ति नाखुश हो रहा है, उसमें कुंठा बढ़ रही है और धैर्य कम को रहा है। व्यक्ति के भीतर नकारात्मकता घर कर रही है। मनुष्य की इच्छाएं अनंत हैं और इन सबकी पूर्ति नामुमकिन है। मनुष्य मन की संतुष्टि और शान्ति को बाहर के भौतिक जगत में तलाशता फिर रहा है, जबकि असली खुशी और संतुष्टि तो भीतर छिपी हुई है।
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तात्कालिक और वास्तविक खुशी
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए शोध के अनुसार, खुशी को तात्कालिक रूप से नहीं मापा जा सकता। जैसे नई गाड़ी या आपकी पसंदीदा नौकरी आपको कुछ पल की खुशी दे सकती है, क्योंकि ये तात्कालिक खुशियां हैं। शोध कहता है कि तात्कालिक खुशी अस्थायी और अल्प समय के लिए होती है। जैसे गाड़ी खरीदने पर आज आप खुश होंगे, लेकिन चार दिन उन भावनाओं में कमी आएगी। इसके विपरीत स्थायी खुशी अंतर्मन की होती है और इसके लिए ज़रूरी है योजनाबद्ध जीवन शैली, कार्यस्थल पर साम्य, नकारात्मकता का त्याग, ‘लोग क्या कहेंगे’ की सोच से मुक्ति तथा धन को ही सर्वोपरि न मानने के भाव का विकास।
कृत्रिम खुशी
व्यक्ति कृत्रिम सुख या बाहरी खुशी की प्राप्ति के स्वप्न को जी रहा है। कृत्रिम खुशी क्षणिक है। कृत्रिम खुशी बाहरी संसाधनों जैसे टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया के लाइक्स, महंगे ब्रांडेड कपड़े, गाड़ियां, पर्यटन यात्राओं आदि से प्राप्त होती हैं। ये कुछ क्षणों तक सुख देती हैं। वास्तविक खुशी आंतरिक है जो संयम, सेवा, करुणा और संतोष से जन्म लेती हैं। ये बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होतीं।
देने के भाव में छिपा है सुख
शोध अध्ययनों के अनुसार, दूसरों की प्रसन्नता में प्रसन्न होना और दूसरों के दुःख में दुखी होना ही जीवन है। विस्कौन्सिक विश्वविद्यालय द्वारा करवाए गए शोध के अनुसार, जब व्यक्ति दूसरों को प्रसन्न करने या कुछ देने के भाव से काम करता है तो उसके मस्तिष्क में गामा तरंगें उत्पन्न होती हैं। ये गामा तरंगें नया सीखने, ध्यान करने और स्मृतियों से जुड़ी हैं। ये तरंगें जितनी उच्च होंगी, व्यक्ति उतना ही खुश होगा।
सबसे प्रसन्न व्यक्ति की सोच
विश्वविद्यालय ने यह प्रयोग प्रसिद्ध लेखक और बौद्ध भिक्षु मैथ्यू रिकॉर्ड पर किया। मैथ्यू को संसार का सबसे प्रसन्न व्यक्ति होने का खिताब दिया गया है और उनके अनुसार, वे इसलिए प्रसन्न हैं क्योंकि वे दूसरों के प्रति मानवीय और संवेदनशील रवैया रखते हैं। इससे यह बात साफ़ है कि व्यक्ति में जितनी करुणा, प्रेम और सहानुभूति होगी, वो उतना ही प्रसन्न होगा।
क्या कहता है शास्त्र?
सूक्ष्म और स्थूल – भारतीय शास्त्रों में प्रेम, दया, करुणा, भक्ति, समर्पण, ईमानदारी आदि गुणों को माइक्रो या सूक्ष्म एलिमेंट्स कहा गया है, जबकि जमीन, पैसा, जायदाद, पद आदि को मैक्रो या स्थूल एलिमेंट्स। भारतीय शास्त्र समझाते हैं कि स्थूल और सूक्ष्म; दोनों तत्त्व व्यक्ति में होने चाहिए, लेकिन अधिक महत्त्व सूक्ष्म गुणों का है, क्योंकि ये तत्त्व कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर के जैसे हैं, जबकि मैक्रो या स्थूल गुण हार्डवेयर या बाहरी मशीन जैसे। कंप्यूटर बाहर से जैसा भी दिखे, अन्दर से मज़बूत हो। यही बात जीवन में भी लागू होती है। आंतरिक गुणों को मज़बूत बनाने से प्रसन्नता बढ़ती है।
गीता – भगवद्गीता के अनुसार, जो व्यक्ति बाह्य भोग-विलास में आसक्त नहीं होता और जिसका चित्त स्थिर रहता है, वह शाश्वत सुख को प्राप्त करता है। इससे स्पष्ट है कि चिर स्थायी खुशी अनासक्त रहने में, बाहरी भोग विलास के कुचक्र को त्यागने में और अपने मन को स्थिर रखने में है। अच्छी या बुरी- जो भी परिस्थिति हो, उसे स्वीकारते हुए या उसे ईश्वरीय कृत्य मानते हुए अपना कार्य करते रहना व्यक्ति में खुशी का संचार करता है।
उपनिषद – कठोपनिषद कहता है कि त्याग से शांति प्राप्त होती है और यही सच्चा सुख है। इससे स्पष्ट है कि बाहरी संसाधनों, सम्पत्ति, मिल्कियत आदि से बंधन ही दुःख का मूल है। अतः अनासक्त भाव रखें। “मेरा कुछ नहीं है” का भाव रखना ही खुशी प्राप्ति का पहला सूत्र है।
ह्यूगे और इकिगाई
ह्यूगे – डेनमार्क में खुश रहने की “ह्यूगे शैली” अपनाई जाती है। ह्यूगे का अर्थ है- छोटे-छोटे पलों में खुशी ढूंढना। बड़ी घटनाओं और खुशियों के बजाय इस पल की खुशी का आनंद लेना ही ह्यूगे है। भारत तो इस तकनीक को सहस्रों वर्षों से जी रहा है। आपने मंदिरों में उद्घोष सुना होगा- “आज के आनंद की जय”। ये ह्यूगे शैली ही तो है। इस शैली में परिवारजन सुखपूर्वक साथ में अध्ययन करते हैं, चाय कॉफ़ी पीते हैं या संगीत सुनते हैं। वे खुश होने के लिए किसी मेगा इवेंट का इंतज़ार नहीं करते।
इकिगाई – इसी तरह जापान में इकिगाई संस्कृति है। इकिगाई का अर्थ है जीने के कारण की खोज। ये जीने की प्रेरणा देता है। इकिगाई के चार सूत्र हैं। आपको किससे प्रेम है? आप किस चीज़ में कुशल हैं? आपकी क्या आवश्यकता है? आप किस चीज़ से आजीविका कमा सकते हैं? इन चार प्रश्नों का उत्तर शान्ति से दीजिए। आपको जीवन का उद्देश्य मिल जाएगा। आपको खुशी मिलेगी। अतः बाहरी के बजाय अंतर्मन में खुशी तलाशें। यही जीने का तरीका है।







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