दवा का ‘स्लो पॉइजन’ निगल रहा जिंदगी
देश में बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और दवाओं पर निर्भरता भी। यह रिपोर्ट बढ़ती रोगग्रस्तता, दवा बाजार, जेनेरिक दवाओं, नकली दवाओं और स्वस्थ जीवनशैली की अहमियत की गंभीर पड़ताल करती...

बीमारी का बाजार
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- बीमारी का बाजार
- जेनेरिक और ब्रांडेड दवा : क्या है अंतर?
- जेनेरिक दवाओं की सबसे बड़ी आपूर्ति भारत से
- तीन लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा दवा बाजार
- इन दवा कंपनियों ने बढ़ाई हिस्सेदारी
- दुनिया के बच्चों तक पहुंच रही भारत की वैक्सीन
- नकली दवाएं : बड़ा खतरा
- महंगी दवाएं भी बढ़ा रही हैं बोझ
- स्वस्थ जीवनशैली ही सबसे बड़ी दवा
दुनिया में मध्य अफ्रीकी गणराज्य ऐसा देश है, जहां लोग सबसे ज्यादा बीमार होते हैं। वहीं ताइवान और सिंगापुर के नागरिक सबसे सेहतमंद माने जाते हैं। स्वास्थ्य के मामले में ये दोनों देश पहले और दूसरे स्थान पर हैं, जबकि भारत 71वें पायदान पर है। भले वैश्विक रैंकिंग में भारत की स्थिति बहुत खराब न दिखे, लेकिन जमीनी हकीकत चिंता बढ़ाने वाली है। भारतीय पहले से ज्यादा बीमार हो रहे हैं और दवाओं पर उनकी निर्भरता लगातार बढ़ रही है। हाल में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि पिछले 30 वर्षों में देश में बीमारियों की दर लगभग दोगुनी हो गई है। आज हर 100 भारतीयों में 13 से 15 लोग किसी न किसी बीमारी से जूझ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और क्या दवाएं ही इसका एकमात्र समाधान हैं?
इसके पीछे बदलती जीवनशैली, शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित खान-पान, बढ़ता तनाव, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। इसके साथ ही दवाओं, विशेषकर एंटीबायोटिक के इस्तेमाल में भी तेज वृद्धि हुई है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत में एंटीबायोटिक की खपत लगभग 70 प्रतिशत बढ़ी है। अमेरिका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के एक शोध के मुताबिक, भारतीय औसतन हर साल 12 से 18 एंटीबायोटिक गोलियां लेते हैं। इनमें से लगभग 67 प्रतिशत लोग मामूली बीमारी होने पर भी डॉक्टर से सलाह लिए बिना मेडिकल स्टोर से दवा खरीदकर सेवन कर लेते हैं।
एक स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार, 12 से 15 करोड़ भारतीय अपने कुल घरेलू खर्च का 10 से 12 प्रतिशत स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च करते हैं। वहीं पांच करोड़ से अधिक लोग ऐसे परिवारों में रहते हैं, जहां कुल खर्च का 25 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इलाज और दवाओं पर चला जाता है। यही वजह है कि भारत का फार्मास्यूटिकल उद्योग उत्पादन के लिहाज से दुनिया में तीसरे और मूल्य के हिसाब से 11वें स्थान पर पहुंच चुका है। इस उद्योग में तीन हजार से अधिक कंपनियां और करीब 10,500 विनिर्माण इकाइयां काम कर रही हैं। भारत का घरेलू दवा बाजार 60 से 70 अरब डॉलर का है और अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 130 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।
जेनेरिक और ब्रांडेड दवा : क्या है अंतर?
ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं में सबसे बड़ा अंतर उनके नाम और कीमत का होता है। ब्रांडेड दवाएं बड़ी फार्मा कंपनियां विकसित करती हैं, जो शोध, परीक्षण और पेटेंट पर भारी निवेश करती हैं। इनके प्रचार-प्रसार पर भी काफी खर्च किया जाता है।
जब किसी ब्रांडेड दवा का पेटेंट समाप्त हो जाता है, तब दूसरी कंपनियां उसी दवा को उसके मूल सॉल्ट के नाम से कम कीमत पर बाजार में उतारती हैं। इन्हें जेनेरिक दवाएं कहा जाता है। गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभाव के मामले में ये ब्रांडेड दवाओं के बराबर होती हैं। इनकी कीमत कम इसलिए होती है क्योंकि इनमें शोध और विज्ञापन का अतिरिक्त खर्च शामिल नहीं होता।
यह धारणा गलत है कि जेनेरिक दवाएं कम असरदार होती हैं। भारत में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) और अमेरिका में एफडीए जैसी संस्थाएं इनकी गुणवत्ता की जांच करती हैं। सरकार भी आम लोगों तक सस्ती और प्रभावी दवाएं पहुंचाने के लिए जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा दे रही है।
जेनेरिक दवाओं की सबसे बड़ी आपूर्ति भारत से
वैश्विक जेनेरिक दवा आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है। देश में 60 से अधिक चिकित्सीय श्रेणियों की दवाएं बनाई जाती हैं। मजबूत विनिर्माण क्षमता, विदेशी निवेश और सरकारी योजनाओं ने इस क्षेत्र को नई मजबूती दी है। गुणवत्ता नियंत्रण, सस्ती दवाओं की उपलब्धता और लगातार नवाचार के कारण भारत वैश्विक फार्मा बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ हाल में हुए व्यापार समझौते भी इस क्षेत्र को नई गति देने वाले माने जा रहे हैं।
तीन लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा दवा बाजार
मई 2026 में 10.9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ भारत का दवा बाजार तीन लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया। डायबिटीज, हृदय रोग और वैक्सीन की बढ़ती मांग ने इस वृद्धि को गति दी।
फार्मारैक की रिपोर्ट के अनुसार, हृदय रोगों की दवाओं का बाजार 14.5 प्रतिशत, डायबिटीज की दवाओं का 13.1 प्रतिशत और श्वसन रोगों की दवाओं की बिक्री 12.2 प्रतिशत बढ़ी। सबसे तेज वृद्धि वैक्सीन श्रेणी में दर्ज की गई, जहां बाजार 21.9 प्रतिशत बढ़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि टीकाकरण और बीमारी की रोकथाम के प्रति बढ़ती जागरूकता इसकी प्रमुख वजह है।
इन दवा कंपनियों ने बढ़ाई हिस्सेदारी
मई 2026 तक बाजार हिस्सेदारी के आधार पर सन फार्मा 8.4 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर रही। इसके बाद एबॉट और सिप्ला का स्थान रहा, जिनकी हिस्सेदारी 5.9-5.9 प्रतिशत रही।
वृद्धि दर के लिहाज से टोरेंट फार्मा 14.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ सबसे आगे रही। इसके बाद इंटास (13.9 प्रतिशत), ग्लेनमार्क (13.4 प्रतिशत), सन फार्मा (12.9 प्रतिशत) और यूएसवी (12.7 प्रतिशत) रहे।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का दवा निर्यात 30.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वर्ष 2000-01 के 1.9 अरब डॉलर की तुलना में लगभग 16 गुना अधिक है।
दुनिया के बच्चों तक पहुंच रही भारत की वैक्सीन
देश में लगभग 500 कंपनियां सक्रिय औषधि संघटक (एपीआई) का उत्पादन करती हैं, जिनकी वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत है।
भारत डिप्थीरिया, टिटनेस, काली खांसी (डीपीटी), बीसीजी और खसरा जैसी वैक्सीन की आपूर्ति में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। भारतीय कंपनियां यूनिसेफ को लगभग 60 प्रतिशत वैक्सीन उपलब्ध कराती हैं। इसके अलावा डीपीटी और बीसीजी वैक्सीन की वैश्विक मांग का 40 से 70 प्रतिशत तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन की खसरा वैक्सीन की मांग का लगभग 90 प्रतिशत भारत पूरा करता है।
पिछले वित्तीय वर्ष में भारत ने दो लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की दवाओं का निर्यात किया। इनमें सबसे अधिक दवाएं अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड और फ्रांस भेजी गईं।
नकली दवाएं : बड़ा खतरा
यदि डॉक्टर की बताई दवा सही मात्रा और समय पर लेने के बावजूद बीमारी में सुधार नहीं हो रहा है, तो उसके पीछे नकली या घटिया दवा भी एक कारण हो सकती है।
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि भारत में बिकने वाली हर चौथी दवा नकली या निम्न गुणवत्ता की हो सकती है। बुखार, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, दर्द निवारक और यहां तक कि कैंसर की दवाओं में भी नकली उत्पाद मिलने के मामले सामने आते रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, नकली दवाओं का वैश्विक कारोबार लगभग 200 अरब डॉलर का है। इन दवाओं में अक्सर आवश्यक सॉल्ट या सक्रिय तत्व नहीं होते, जिससे मरीज को उपचार का लाभ नहीं मिलता और कई मामलों में जान तक जोखिम में पड़ जाती है। एसोचैम के एक अध्ययन में भी भारत में नकली और घटिया दवाओं की चुनौती को गंभीर बताया गया है।
महंगी दवाएं भी बढ़ा रही हैं बोझ
भारत में मरीजों की सबसे बड़ी शिकायत दवाओं की कीमतों को लेकर है। एक ही सॉल्ट वाली दवा अलग-अलग ब्रांड नामों से कई गुना अलग कीमत पर बिकती है। जो दवा एक दुकान पर 15 रुपये में मिलती है, वही दूसरी जगह 40 रुपये तक में बिक सकती है। मरीज अक्सर डॉक्टर द्वारा लिखे गए ब्रांड को ही खरीदने के लिए मजबूर होता है।
नई दवाओं या उन दवाओं की कीमत, जिन पर अभी सरकारी मूल्य नियंत्रण लागू नहीं हुआ है, कंपनियां अपनी मर्जी से तय कर सकती हैं। इसका सबसे अधिक असर डायबिटीज, हृदय रोग और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों के मरीजों पर पड़ता है, जिनका मासिक दवा खर्च हजारों रुपये तक पहुंच जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रांडेड दवाओं पर फार्मासिस्ट को सामान्यतः 5 से 20 प्रतिशत तक मार्जिन मिलता है, जबकि कई जेनेरिक दवाओं में थोक और खुदरा कीमत के बीच कई गुना अंतर देखने को मिलता है।
उदाहरण के तौर पर, पैरासिटामोल यदि उसके सॉल्ट के नाम से बेची जाए तो वह जेनेरिक दवा कहलाती है, जबकि किसी कंपनी के ब्रांड नाम से वही दवा ब्रांडेड दवा बन जाती है। सर्दी, खांसी, बुखार और बदन दर्द जैसी सामान्य समस्याओं के लिए जेनेरिक दवा कई बार 10 पैसे से डेढ़ रुपये प्रति टैबलेट तक उपलब्ध होती है, जबकि ब्रांडेड दवा की कीमत 35 रुपये प्रति टैबलेट तक पहुंच सकती है।
स्वस्थ जीवनशैली ही सबसे बड़ी दवा
स्वस्थ और खुशहाल जीवन के लिए केवल दवाइयों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार अच्छे स्वास्थ्य के चार मजबूत आधार हैं—संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनावमुक्त जीवन। भोजन का समय तय रखें और दिनभर का खाना 12 घंटे के भीतर लेने की आदत डालें। सप्ताह में दो दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जैसी हल्की कसरत मांसपेशियों को मजबूत बनाती है। रोज पर्याप्त नींद लें और कम से कम 20 मिनट धूप में जरूर बिताएं। सबसे जरूरी है कि हर दिन 15 मिनट केवल अपने लिए निकालें, तनाव कम करें और इस दौरान मोबाइल से दूरी बनाए रखें। आखिरकार, स्वस्थ जीवन की सबसे बड़ी दवा कोई गोली नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली है। छोटी-छोटी अच्छी आदतें ही लंबे समय तक बीमारी से बचाव और बेहतर स्वास्थ्य की सबसे मजबूत नींव बनती हैं।






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