गड्ढों का स्मार्ट सिटी मॉडल
जयपुर की टोंक रोड पर सड़क धंस गई। बरसात ने फिर साबित कर दिया कि हमारे यहां सड़कें डामर से नहीं, भरोसे से बनती...

बात बेलगाम
जयपुर की टोंक रोड पर सड़क धंस गई। बरसात ने फिर साबित कर दिया कि हमारे यहां सड़कें डामर से नहीं, भरोसे से बनती हैं। पहली बारिश आते ही सड़क ने धरती माता की गोद में समर्पण कर दिया। लगता है ठेकेदार ने सड़क नहीं, सरप्राइज पैकेज बनाया था। कब कौन-सा हिस्सा नीचे चला जाए, कोई नहीं जानता। अब गड्ढा भी साधारण नहीं रहा, वह विकास का प्रतीक है। जितना बड़ा गड्ढा, उतना बड़ा बजट और उतनी ही बड़ी मरम्मत। जनता हर साल टैक्स देती है, सरकार हर साल सड़क बनवाती है और बारिश हर साल गुणवत्ता की जांच मुफ्त में कर देती है। सुझाव है कि अगली बार सड़क के उद्घाटन पर फीता काटने की जगह लाइफ जैकेट बांटी जाए। आखिर स्मार्ट सिटी में सड़क पर चलना भी अब साहसिक पर्यटन जैसा अनुभव बन चुका है। यहां मंजिल तक पहुंचना नहीं, बीच रास्ते धंसने से बचना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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खेजड़ी इन दिनों सियासत के कटघरे में
मरुस्थल की बूढ़ी खेजड़ी इन दिनों सियासत के कटघरे में खड़ी है। अपराध बस इतना है कि वह पेड़ है। उसकी जड़ें मिट्टी में हैं, लेकिन उसकी शाखाओं पर राजनीति ने अपना झंडा टांग दिया है। कल तक जिन्हें पेड़-पौधों का अंतर नहीं मालूम था, वे आज पत्तियों से राजनीति और टहनियों से तर्क निकाल रहे हैं। लगता है मानो राजस्थान की सारी समस्याएं किसी खेजड़ी की डाल पर बैठी हों। खेजड़ी मुस्कुरा रही है। उसे याद है, कभी लोग उसे बचाने के लिए अपने सिर कटवा देते थे; आज उसके नाम पर एक-दूसरे का सिर खाने को तैयार हैं। पहले कुल्हाड़ी तने पर चलती थी, अब ज़ुबानें चलती हैं। फर्क केवल औज़ार का है। बेचारी खेजड़ी शायद यही कहना चाहती है मेरे नाम पर बहस मत करो, मेरे जैसे पेड़ बचाओ।
पाठ्यपुस्तक में जगह, संविधान में इंतज़ार
आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी राजस्थानी भाषा का भाग्य किसी सरकारी फाइल जैसा है चलती बहुत है, पहुंचती कहीं नहीं। स्कूलों में राजस्थानी पढ़ाई जा रही है, बच्चे म्हारो और थारो सीख रहे हैं, लेकिन संविधान की आठवीं अनुसूची के दरवाज़े अब भी उसके लिए बंद हैं। अजीब विडंबना है। सरकार कहती है, पढ़ो भी, पढ़ाओ भी, लेकिन जब भाषा सम्मान की कुर्सी मांगती है तो जवाब मिलता है, मामला विचाराधीन है। लगता है राजस्थानी का सबसे बड़ा अपराध यही है कि वह सदियों से जीवित है, इसलिए उसे जीवित रहने का प्रमाण-पत्र बार-बार देना पड़ता है। हर चुनाव में भाषा के नाम पर वादों की पगड़ी बांधी जाती है और चुनाव बाद वही पगड़ी किसी फाइल पर धूल झाड़ने के काम आ जाती है। राजस्थानी आज भी मुस्कराकर पूछ रही है मान्यता कद मिलसी?
अपने घर में बेगानी राजस्थानी
लोकभवन से फरमान आया है कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में अब मराठी पढ़ाई जाएगी। निर्णय अच्छा है, भारतीय भाषाओं का सम्मान होना ही चाहिए। लेकिन ज़रा यह भी बता दीजिए कि राजस्थानी भाषा का नंबर किस जन्म में आएगा? विडंबना देखिए राजस्थान की धरती पर राजस्थानी आज भी अपने ही घर में किराएदार बनी हुई है। विश्वविद्यालयों में उसके लिए स्थायी ठिकाना नहीं, लेकिन बाहर की भाषाओं के स्वागत में कालीन बिछाए जा रहे हैं। लगता है नीति यह बन गई है कि घर की मुर्गी दाल बराबर, पड़ोसी की भाषा मालामाल। मराठी का सम्मान कीजिए, अवश्य कीजिए। लेकिन क्या यह पूछना गुनाह है कि जिस भाषा में पाबूजी, ढोला-मारू, मीरा, दुरसा आढ़ा और अनगिनत लोककाव्य जन्मे, उसे अपने ही प्रदेश में सम्मान दिलाने की फुर्सत किसे नहीं मिली? डर इस बात का है कि कहीं आने वाले समय में राजस्थान का छात्र मराठी तो धाराप्रवाह पढ़ ले, लेकिन अपनी दादी की राजस्थानी सुनकर शब्दकोश खोजने लगे। तब शायद सरकार एक और केंद्र खोले राजस्थान में राजस्थानी समझो अभियान!
कढ़ाई में तेल, सिर पर कानून
पहले शादी में हलवाई कढ़ाई संभालता था, अब लगता है उसे आधा समय फाइलें और रजिस्टर संभालने में लगेगा। सरकार को अब यह भी जानना है कि कितने मेहमान आए, कितनी पूड़ियां तली गईं और कढ़ाई में तेल ज़्यादा था या नियम। ऐसा लगता है कि अगला आदेश यह होगा कि हर गुलाबजामुन का जन्म प्रमाणपत्र और हर जलेबी का आधार नंबर भी बनाया जाए। बारात के आगे बैंड नहीं, निरीक्षण दल चलेगा और फेरों से पहले फॉर्म भरवाए जाएंगे। भोजन की शुद्धता पर सख्ती ज़रूरी है, लेकिन सवाल यह है कि मिलावटखोर फैक्ट्रियों और नकली घी बेचने वालों पर जितनी मुस्तैदी दिखनी चाहिए, उतनी दिखती क्यों नहीं? आसान निशाना फिर वही हलवाई बन गया, जो शादी वाले दिन सबसे ज़्यादा पसीना बहाता है। अब शादी का नया मुहावरा होगा दूल्हा बाद में आएगा, पहले निरीक्षक और रजिस्टर पधारेंगे।
जीआई की दौड़ में जूती आगे
राजस्थान की जूती ने आखिर जीआई टैग की मंज़िल पा ली। यानी अब वह सिर्फ़ पैरों की शोभा नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बन गई। उधर राजस्थान के दूसरे पारंपरिक उत्पाद अभी भी सरकारी फाइलों की मैराथन दौड़ रहे हैं। लगता है यहां उत्पाद पहले बनता है, पहचान बाद में और कागज़ सबसे आखिर में। विडंबना देखिए, सदियों से दुनिया को स्वाद देने वाला जीरा, शान बढ़ाने वाला साफा और अनेक हस्तशिल्प अब भी कतार में खड़े हैं। जैसे रेलवे की वेटिंग लिस्ट हो कन्फर्म होने का भरोसा नहीं, उम्मीद पूरी। जीआई टैग की असली रेस बाजार में नहीं, दफ्तरों में जीतनी पड़ती है। जो फाइल तेज दौड़ गई, वही वैश्विक ब्रांड बन गई। बाकी कारीगर अपने हुनर से कम और आवेदन की प्रगति से ज़्यादा परिचित हो गए हैं। उम्मीद है अगली बार राजस्थान के उत्पाद कतार में नहीं, पहचान की दौड़ में सबसे आगे दिखाई देंगे।





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