रामलला के नए-नवेले रिश्तेदार!
बोल हरि बोल – आस्था कोई ऐप नहीं कि जरूरत पर डाउनलोड और माहौल बदला तो अनइंस्टॉल हरीश मलिक,वरिष्ठ व्यंग्यकार और लेखक हमारे गांवों में एक आम कहावत प्रचलित है- ‘जब गुड़ बंटता है, तब...

बोल हरि बोल – आस्था कोई ऐप नहीं कि जरूरत पर डाउनलोड और माहौल बदला तो अनइंस्टॉल
हरीश मलिक,
वरिष्ठ व्यंग्यकार और लेखक
हमारे गांवों में एक आम कहावत प्रचलित है- ‘जब गुड़ बंटता है, तब रिश्तेदारों की संख्या अचानक बढ़ जाती है।’
राम मंदिर के साथ भी कुछ वैसा ही हुआ। मंदिर बन गया तो रिश्तेदार बढ़ गए। चढ़ावा आया तो चोर और शुभचिंतक दोनों बढ़ गए। चोरी हुई तो संरक्षक बढ़ गए। परंतु राजनीति बड़ी विलक्षण और सयानी है। वहां बिवाई फटे न फटे, पराई पीर अवश्य प्रकट हो जाती है। बस, सियासी अवसर का घी मिलना चाहिए। पहले जिनकी श्रद्धा छुट्टी पर थी, आज वही आस्था के महालेखाकार बने घूम रहे हैं। कुछ महाशयों की भक्ति ऐसी फूटी कि मानो वे जन्म-जन्मांतर से रामलला के कोषाध्यक्ष रहे हों।
अब हर कोई ऐसे बोल रहा है जैसे रामलला ने अपने मंदिर की दूसरी चाबी इन्हीं के पास रख छोड़ी हो। वे पहले तो राम लला अस्तित्व पर सवाल उठाते थे। रामभक्तों को अयोध्या आने से रोकते थे। अब वे उनकी चौखट पर आंसुओं की बाल्टी लेकर खड़े हैं। दरअसल, राजनीति में संवेदना भी बड़ी हिसाबी चीज होती है। जहां वोट दिखाई देते हैं, वहां आंखें अपने-आप नम हो जाती हैं।
राजनीति का यह नया चमत्कार देखने लायक है। कल तक जिन्हें मंदिर का रास्ता लंबा लगता था, आज गर्भगृह तक उनकी भावनाएं दौड़ी चली आ रही हैं। संवेदना का ज्वार उमड़ पड़ा है। लगता है जैसे भक्ति कोई साधना नहीं, मोबाइल ऐप हो कि जरूरत पड़ी, डाउनलोड कर लिया। माहौल बदला, अनइंस्टॉल कर दिया। दरअसल, इनकी श्रद्धा पंचांग देखकर नहीं, चुनावी कैलेंडर देखकर जागती है। सावन, भादो, चैत्र या कार्तिक से इसका कोई संबंध नहीं। इसका मौसम सियासी गुणा-भाग, चुनावी चकल्लस और मुद्दे देखकर तय होता है।
अयोध्या में चढ़ावे की चोरी क्या हुई, अचानक देश में रामलला के ऐसे-ऐसे रिश्तेदार प्रकट हो गए कि मां सीताजी भी सोच रहीं होंगी कि ये लोग प्रभु के वनवास (टैंट का प्रवास) के समय कहां थे? तब इनकी आस्था अस्ताचलगामिनी थी। जब मंदिर बन रहा था, तब इनकी श्रद्धा ट्रैफिक जाम में फंसी थी। जब प्राण प्रतिष्ठा हुई, तब इन्हें अचानक लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता और नानी-दादी सब एक साथ याद आ गए थे।
अपने रामलला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और किसी से भी नाराज नहीं होते। शबरी के जूठे बेर भी खा लेते हैं और निषादराज को गले भी लगा लेते हैं। क्योंकि वे मन की थाली देखते हैं, बयान की बाजी नहीं। यही वजह है कि वे अब भी गर्भगृह में मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। यहां राम दरबार लगा है और प्रभु राम मुस्कान के बीच क्रोधित लक्ष्मण कह रहे हैं…
‘भैया, देखो! जिनके कदम पहले मंदिर की दहलीज तक नहीं पहुंचे, उनकी भावनाएं आज सीधे गर्भगृह तक पहुंच गई हैं।’
‘कल तक जिन्हें आपका नाम लेने में राजनीतिक बुखार चढ़ जाता था, आज वही आपकी संपत्ति के स्वयंभू मुनीम बने बैठे हैं।’
राम अपने चित-परिचित शांत स्वर में कहते हैं..
‘प्रिय लक्ष्मण, रहने दो। यह कलियुग है। सबकी अपनी-अपनी श्रद्धा और आस्था है। कुछ भक्त सर्वस्व समर्पण भाव से आते हैं। उनके लिए आस्था से बढ़कर कुछ भी नहीं। और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो चौखट पर आरती की थाली नहीं, माइक लेकर आते हैं। इनके अधरों पर आरती के बोल नहीं, बयान ज्यादा आते हैं।’
इसी बीच पवनपुत्र बोल उठे…
‘प्रभु, आप ठीक कहते हैं। कुछ नेता लोग दर्शन करने नहीं आए… बल्कि दर्शन देने के भाव से आते हैं। अगले साल चुनाव हैं, सो शक्ल दिखलाने आते हैं।’
‘इन्होंने आस्था को अवसर, श्रद्धा को रणनीति और भगवान को प्रेस कॉन्फ्रेंस का प्रॉप बना दिया है।’
इसमें कोई दो राय नहीं कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी निश्चय ही महापाप है। जिन विधर्मियों ने भी भगवान के दानपात्र पर हाथ डाला, उसने केवल चढ़ावा नहीं चुराया, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंचाई है। रामजी उनको कठोरतम दंड दें। यही न्याय है। रामायण हमें यह नहीं सिखाती कि हर घटना पर शोर मचाओ। वह यह सिखाती है कि अन्याय का प्रतिकार करो, अपराधी को दंड दो और मर्यादा बनाए रखो। इसलिए चढ़ावे चोरी के घोर अपराध का दोषी चाहे कोई भी हो, उसे कठोरतम दंड मिलना ही चाहिए
लेकिन कुछ सियासी लोगों यह कतई मंजूर नहीं कि चोरी की जांच पुलिस करे, न्यायालय फैसला दे और मुद्दा खत्म हो जाए। उनको तो सीधे धर्म का ठेकेदार खुद बनना है। क्योंकि इन्हें आस्था का दुःख कम, सुर्खियों का सुख ज्यादा दिखाई देता है। इसलिए अगर भक्ति भी मौसम को देखकर आने लगे, तो समझ लीजिए कि चोर मंदिर में नहीं, जमीर में घुस आया है।
राम लला पर दोष मढ़ना बंद कीजिए…
चलते-चलते : एक सवाल कि आपके अपने घर पर चोरी होती है तो आप चोर को जिम्मेदार ठहराते हैं या घर को? अरे इतना भी नहीं पता… दोषी तो चोर ही होगा ना। तब कृपया आप राम लला या राम मंदिर पर दोष मढ़ना बंद कीजिए!






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