सत्ता, संतुलन और दिल्ली दरबार
भजनलाल शर्मा सरकार पौने तीन साल पूरे करने के मुहाने पर है और प्रदेश चुनावी मोड में प्रवेश कर चुका है। सरकार अपनी उपलब्धियां गिना रही है, लेकिन नौकरशाही, कानून-व्यवस्था, सत्ता-संगठन तालमेल और दिल्ली...

प्रदेश राजनीति
राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली सरकार के पौने तीन साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। प्रदेश में अभी निकाय चुनावों की अधिसूचना जारी हो गई है और अगले महीने पंचायत चुनावों की घोषणा भी हो जाएगी। कुल मिलाकर तीन साल का कार्यकाल चुनाव होते-होते पूरा हो जाएगा यानी 2028 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाने का वक्त आ जाएगा। ऐसे में अब हिसाब भी लगाया जाने लगा है कि भजनलाल सरकार आम लोगों और पार्टी आलाकमान की अपेक्षाओं पर कितना खरी उतरी है।
Table Of Content
दिसम्बर 2023 में भाजपा नेतृत्व ने पहली बार के विधायक भजनलाल को राजस्थान की कमान सौंपी तो इसे राज्य की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात माना गया। पारम्परिक दिग्गज क्षत्रपों को दरकिनार कर उस वक्त के प्रदेश महामंत्री और संगठन की पृष्ठभूमि वाले एक अनाम कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना पार्टी नेतृत्व का एक साहसिक और दूरगामी प्रयोग था। अब जब भजनलाल को कमान सम्भाले तीन साल का वक्त होने को आया है तो उनकी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन फाइलों के निपटारे और घोषणाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं रह जाता। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या भजनलाल इन तीन सालों में अपनी स्वतंत्र, सर्वमान्य और सशक्त राजनीतिक पहचान स्थापित करने में कामयाब हो सके हैं?
सरकारी दावों पर भरोसा करें तो बेशक, इन तीन सालों में सरकार ने काफी काम किए हैं। इनमें सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में दशकों से अटके यमुना जल समझौते के क्रियान्वयन की शुरुआत, ईस्टर्न राजस्थान कैनाल परियोजना का शिलान्यास और राइजिंग राजस्थान के नाम पर निवेश को आकर्षित करना अहम माना जा सकता है, लेकिन यह सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाता है कि क्या भजनलाल खुद की एक प्रखर प्रशासक वाली छवि बना पाए हैं? फिर उनकी बार-बार दिल्ली यात्राएं हमेशा चर्चा में रहती हैं। हालांकि वे कहते हैं कि उनके दिल्ली दौरे वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन और राज्य की परियोजनाओं के क्रियान्वयन में केंद्र सरकार की अधिकाधिक मदद हासिल करने के लिए होते हैं, लेकिन उनके विरोधी और खासकर प्रतिपक्ष कांग्रेस के नेता अब भी भजनलाल सरकार को ‘परची सरकार’ की उपमा देते हुए हर काम के लिए दिल्ली की हरी झंडी के इंतजार का आरोप लगाते हैं। यहां तक आरोप लगा दिया जाता है कि नौकरशाहों के तबादले-पदस्थापन जैसे प्रशासनिक काम भी इस सरकार के हाथ में नहीं हैं। इसके लिए भी दिल्ली से हामी भरवानी पड़ती है। नतीजा यह है कि राज्य में नौकरशाही हावी होती जा रही है।
कई बार सरकार के अपने लोग भी दबी जुबान में इन आरोपों पर मुहर लगाते नजर आते हैं। मंत्री कहते हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। विधायक कहते हैं कि मंत्री उनके काम नहीं करते। कार्यकर्ता दोनों जगहों से खाली हाथ लौटता है। हाल ही में प्रदेश में हुए तबादलों के दौर में भी ऐसे ही स्वर सत्ता पक्ष की ओर से ज्यादा सुनाई दिए थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि तीन साल बाद भी भजनलाल प्रशासनिक से कहीं ज्यादा सियासी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
उपलब्धियां बनाम विपक्ष के दावे
सियासी विश्लेषक कहते हैं कि किसी भी सरकार का तीन वर्ष का कार्यकाल उसके नीतिगत दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है। भजनलाल सरकार ने सत्ता संभालते ही कुछ ऐसे संवेदनशील और बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया, जो पिछली सरकार के समय भाजपा के प्रमुख चुनावी हथियार बने थे। मसलन, पिछली अशोक गहलोत सरकार के वक्त प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं के लीक हुए पेपर बड़ा सियासी मुद्दा थे। भजनलाल ने आते ही इसे रोकने के लिए एसआईटी का गठन कर कार्रवाई शुरू की। भजनलाल आज भी इसे अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि बताते हैं कि तीन साल में हुई तीन सौ से अधिक परीक्षाओं में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ।
इसी तरह राज्य के पूर्वी हिस्से में आने वाले 13 जिलों की जीवनरेखा मानी जाने वाली ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट (ईआरसीपी) को लेकर चला आ रहा अन्तरराज्यीय गतिरोध खत्म करते हुए केंद्र और मध्यप्रदेश सरकारों के साथ संशोधित एमओयू पर हस्ताक्षर भी एक उपलब्धि के रूप में गिनाए जाते हैं। साथ ही हरियाणा के साथ यमुना जल बंटवारे का दशकों से लम्बित पड़ा मुद्दा भी सुलझाने का दावा किया गया है। संगठित अपराधों पर नियंत्रण के लिए एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स बनाकर कार्रवाई कर कानून-व्यवस्था में सुधार का दावा भी सरकार का है तो निवेश के जरिए औद्योगिक विकास में राइजिंग राजस्थान के तहत बड़ा निवेश उपलब्धि कहा जा रहा है।
दूसरी ओर, इन नीतिगत फैसलों के बावजूद नौकरशाही के रवैये, निचले स्तर पर विकास कार्यों की सुस्त गति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की कमी जैसी शिकायतें आम लोगों से लेकर खुद भाजपा कार्यकर्ताओं के स्तर तक उभरती रहती हैं। ईआरसीपी को केंद्रीय परियोजना घोषित करवाने की मांग पर सरकार को आज भी विपक्ष सदन और सड़क पर घेरता है तो यमुना जल बंटवारे के समझौते के पूरी तरह लागू होने पर संदेह जताया जा रहा है। आए दिन हो रही हत्याओं और लूटपाट की घटनाओं को गिनाते हुए कहा जा रहा है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा चुकी है। कोटा, बीकानेर, बांसवाड़ा, जोधपुर व अन्य शहरों में प्रसूताओं की मौत और आरजीएचएस व निशुल्क दवाओं के मुद्दे पर चिकित्सा व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता रहा है। देशभर में युवाओं के आंदोलन का सबब बने नीट पेपर लीक का राजस्थान लिंक पेपर लीक नहीं होने के सरकारी दावों पर पानी फेरता नजर आता है।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं है। झूठे दावों से सिर्फ अपनी पीठ थपथपाने का काम किया जा रहा है। बिजली-पानी, सड़क-सीवरेज और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।
गणित दिल्ली दौरों का
प्रदेश के सियासी गलियारों में मुख्यमंत्री भजनलाल के दिल्ली दौरे हमेशा चर्चा में रहे हैं। मुख्यमंत्री के हर महीने औसतन दो से तीन दिल्ली दौरे हो ही जाते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में ऐसे दौरों की बारम्बारता कम नजर आती थी। फिर भजनलाल बार-बार दिल्ली दरबार में क्यों हाजिरी देते हैं? इस सवाल के जवाब में सरकार और भजन समर्थकों का तर्क है कि डबल इंजन सरकार की अवधारणा के चलते केंद्र प्रायोजित योजनाओं के त्वरित अनुमोदन, राजस्थान को अधिकाधिक वित्तीय मदद, जल व बिजली परियोजनाओं की स्वीकृतियों में तेजी तथा केंद्रीय मंत्रियों से सीधा नीतिगत संवाद मुख्यमंत्री के लगातार दिल्ली दौरों से लाभदायक साबित होता है।
विश्लेषक इसे दूसरी नजर से देखते हैं। इनका कहना है कि प्रदेश में सत्ता के कई शक्ति केंद्र सक्रिय हैं। मंत्रिमंडल के प्रमुख फैसलों, वरिष्ठ नौकरशाहों के तबादलों, राजनीतिक नियुक्तियों व सत्ता-संगठन तालमेल जैसे हरेक संवेदनशील फैसले के लिए केंद्रीय नेतृत्व की सीधी सहमति इन दौरों का प्रमुख कारण है। साथ ही भजनलाल इन दौरों से अपने विरोधियों को लगातार यह संदेश देने की कोशिश भी करते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व का उनकी पीठ पर हाथ है। यानी वे अपनी स्थिति आलाकमान के समर्थन से लगातार मजबूत रखना चाहते हैं ताकि उन्हें कोई सीधी चुनौती नहीं मिल सके। फिर, पहली बार विधायक बनने के बाद सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल जाना और इसके कारण प्रशासनिक अनुभव की कमी को भी इन दौरों से जोड़ लिया जाता है।
सत्ता-संगठन में तालमेल
सत्ता के शक्ति केंद्रों को साधने के साथ-साथ भजनलाल के लिए पार्टी संगठन के साथ तालमेल भी एक बड़ी चुनौती है। हालांकि अभी प्रदेश संगठन और सरकार के बीच एक औपचारिक तालमेल तो नजर आता है, लेकिन धरातल पर कुछ अंतर्विरोध भी परिलक्षित होते हैं। संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं की दबी जुबान में शिकायत रहती है कि नौकरशाही के हावी हो जाने से कार्यकर्ताओं के छोटे-मोटे कामों को प्राथमिकता नहीं मिल पाती। ऐसे में जिला और मंडल स्तर पर सत्ता व संगठन के बीच तालमेल एक अहम मसला बना हुआ है।
इसी तरह मंत्रिमंडल में भी कई अलग-अलग शक्ति केंद्र हैं। कम अनुभव वाले उपमुख्यमंत्रियों दीया कुमारी व प्रेमचंद बैरवा के साथ मंत्रिमंडल में कई कद्दावर चेहरे भी हैं, जिन्हें लम्बा विधायी और प्रशासनिक अनुभव है या फिर ये संघ और पार्टी के भीतर गहरा जनाधार रखते हैं। कई मंत्री तो इस मामले में मुख्यमंत्री से कहीं ज्यादा अनुभवी हैं। ऐसे मंत्रियों को केंद्रीय नेतृत्व व मुख्यमंत्री कार्यालय के स्तर से चलने वाली केंद्रीकृत निगरानी व्यवस्था असहज करती है तो मुख्यमंत्री के सामने भी कैबिनेट में निर्विवाद नेतृत्व स्थापित करने में परोक्ष रूप से परेशानी ही है।
वसुंधरा की खामोशी, मनोवैज्ञानिक दबाव
राजस्थान में भाजपा की राजनीति का प्रमुख चेहरा रही पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मौजूदा समय में प्रदेश के सियासी समीकरणों का सबसे पेचीदा अध्याय हैं। पार्टी की लगातार तीसरी बार राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाई गई वसुंधरा राजे भले ही राज्य की राजनीति से एक तरह से बाहर की जा चुकी हैं, लेकिन वे सीधे किसी नीति या निर्णय पर सार्वजनिक विरोध करने की बजाय आज भी वक्त-बेवक्त अपनी व्यापक जनस्वीकार्यता और जनाधार को रेखांकित करती रहती हैं। राज्य के कई क्षेत्रों में उनके निष्ठावान नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मजबूत नेतृत्व सक्रिय है। यह भजनलाल शर्मा सरकार के लिए हमेशा एक अदृश्य मनोवैज्ञानिक दबाव की तरह काम करता है। बार-बार यह हूक उठती दिखती है कि आज वसुंधरा मुख्यमंत्री होतीं तो यह स्थिति नहीं होती। फिर पार्टी आलाकमान के लिए भी वसुंधरा के प्रभाव को पूरी तरह अनदेखा करना सम्भव नहीं हो पा रहा। इधर, वसुंधरा की खामोशी हर समय मुख्यमंत्री पर एक दबाव के रूप में हावी रहती है।
स्वतंत्र पहचान का संकट
क्या मुख्यमंत्री भजनलाल पौने तीन साल के कार्यकाल में अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाए हैं? यह सवाल आज भी राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सर्वाधिक विचारणीय है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल में सहज, सरल, मिलनसार और सुलभ जननेता की छवि बनाई है। वे कार्यकर्ताओं व आम लोगों से जनसुनवाई और सम्पर्क पोर्टल हेल्पलाइन से सीधा संवाद करने, ग्रामीण चौपाल के जरिए लोगों से जुड़ने और सामाजिक आयोजनों में आमजन के बीच सहजता से उपलब्ध होते हैं, लेकिन जब एक कठोर प्रशासक और सर्वमान्य क्षत्रप की बात आती है तो वे पीछे रह जाते हैं। आज भी आम लोगों में बनी यह धारणा तोड़ पाने में भजनलाल पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं कि उनकी सरकार के सभी बड़े फैसलों की डोर दिल्ली दरबार के हाथ में है। वैसे भी स्वतंत्र सियासी पहचान सिर्फ व्यक्तिगत सरलता से नहीं, बल्कि कड़े राजनीतिक फैसलों, संकट प्रबंधन की क्षमता और विरोधियों पर निर्विवाद प्रभुत्व से स्थापित होती है। भजनलाल अब भी अपनी स्वतंत्र सियासी विरासत गढ़ने में संघर्षशील ही नजर आते हैं।
चुनौतियां व चुनावी बिसात
सरकार के आखिरी दो साल जनविश्वास हासिल करने की दिशा में काफी अहम साबित होते हैं। इस साल दिसम्बर में सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद सरकार को अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में भी जुटना होता है। इनमें से आखिरी छह महीने तो राजनीतिक चुनौतियां इतनी बड़ी हो जाती हैं कि वक्त इनसे निपटने में ही निकल जाता है। ऐसे में सरकार के पास अब मुश्किल डेढ़ साल का समय बचेगा और इसमें भजनलाल के सामने वित्तीय प्रबंधन, जल संकट का समाधान, रोजगार सृजन और आधारभूत ढांचे का विकास जैसी प्रशासनिक जिम्मेदारियां कुशलता से पूरी करने की चुनौती है।
पार्टी के भीतर सभी गुटों और वरिष्ठ नेताओं को एक मंच पर साधे रखना, नौकरशाही पर मजबूत पकड़ साबित करना, साल 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी में खुद को एक निर्विवाद, जनप्रिय व सर्वस्वीकार्य नेता के रूप में स्थापित करना और दिल्ली पर अत्यधिक निर्भरता की आम धारणा को मिटाना मुख्यमंत्री भजनलाल के लिए किसी पहाड़ को तोड़ने जैसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे में क्या वे राजस्थान में हर पांच साल में कांग्रेस-भाजपा के पारम्परिक सत्ता परिवर्तन के चक्र को तोड़ने की पार्टी नेतृत्व की आकांक्षा पर खरा उतरकर नया इतिहास रच पाएंगे, इसका जवाब तो भविष्य के गर्त में छिपा है। फिलहाल, चुनौतियां बड़ी हैं और इनसे निपटते हुए चुनावी बिसात बिछाना नामुमकिन तो नहीं, लेकिन मुश्किल जरूर नजर आता है।






No Comment! Be the first one.