स्वस्थ नागरिक हों विकास की पहचान
यदि अस्पतालों की संख्या बढ़ना विकास का पैमाना बन जाए, तो आत्ममंथन जरूरी है। स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा, जब नीति का केंद्र इलाज नहीं, बल्कि नागरिकों का स्वास्थ्य...

रोकथाम की नीति
सुबह की सैर पर निकलिए। पार्क में एक ओर योग कर रहे लोग दिखेंगे, दूसरी ओर मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग की दवाइयों पर चर्चा करते बुजुर्ग। अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें हैं, दवा बाजार निरंतर बढ़ रहा है, स्वास्थ्य बीमा का कारोबार नए कीर्तिमान बना रहा है, फिर भी भारत पहले से अधिक बीमार क्यों दिखाई देता है? यह प्रश्न केवल चिकित्सा व्यवस्था का नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली, भोजन, शहरों और सरकारी नीतियों का भी है।
स्वास्थ्य का अर्थ केवल अस्पताल, डॉक्टर और दवा नहीं है। स्वास्थ्य की शुरुआत घर की रसोई से होती है, विद्यालय के खेल मैदान से होती है, शहर के पार्क और पैदल मार्ग से होती है और परिवार की दिनचर्या से होती है। दुर्भाग्य से हमने स्वास्थ्य को जीवनशैली का विषय नहीं, बल्कि बीमारी का विषय बना दिया है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार विश्व में होने वाली लगभग 74 प्रतिशत मौतें असंक्रामक रोगों जैसे हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और श्वसन रोग के कारण होती हैं। भारत भी इसी चुनौती का सामना कर रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अध्ययन के अनुसार देश के लगभग 11.4 प्रतिशत वयस्क मधुमेह, 35.5 प्रतिशत उच्च रक्तचाप और लगभग हर तीसरा वयस्क अधिक वजन या मोटापे की समस्या से जूझ रहा है। दूसरी ओर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) बताता है कि भारत में अभी भी लाखों बच्चे कुपोषित हैं। अर्थात एक ही देश में भूख भी है और मोटापा भी। यह विरोधाभास हमारी विकास यात्रा का सबसे बड़ा प्रश्न है।
विडंबना देखिए कि जितना खर्च इलाज पर बढ़ रहा है, उतना निवेश बीमारी रोकने पर नहीं हो रहा। चिकित्सा उद्योग, औषधि उद्योग और स्वास्थ्य बीमा का विस्तार आवश्यक है, लेकिन यदि किसी समाज की पहचान अस्पतालों की बढ़ती संख्या से होने लगे, तो यह चेतावनी है, उपलब्धि नहीं।
भोजन बदला, बीमारियां भी बदल गईं
कुछ दशक पहले भारतीय थाली में बाजरा, ज्वार, दाल, छाछ, मौसमी सब्जियां और मोटा अनाज प्रमुख था। आज उसकी जगह अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मीठे पेय, अधिक नमक और हानिकारक वसा वाले खाद्य पदार्थों ने ले ली है। परिणाम सामने है मधुमेह और मोटापा अब सम्पन्नता के नहीं, सामान्य परिवारों के रोग बन चुके हैं।
आईसीएमआर के नवीन आहार दिशानिर्देश स्पष्ट कहते हैं कि भोजन में साबुत अनाज, दालें, हरी सब्जियां, मौसमी फल और सीमित मात्रा में चीनी, नमक तथा तेल होना चाहिए। यह आधुनिक विज्ञान भी वही कह रहा है जो भारतीय रसोई सदियों से जानती थी।
श्रीअन्न: भविष्य की थाली
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित कर भारत की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को वैश्विक सम्मान दिया। बाजरा, ज्वार और रागी जैसे श्री अन्न केवल किसानों की फसल नहीं, बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य सुरक्षा हैं। इनमें रेशेदार तत्व, लौह, कैल्शियम और सूक्ष्म पोषक तत्व अधिक हैं तथा ये रक्त शर्करा को नियंत्रित रखने में सहायक माने जाते हैं।
योग: दुनिया अपना रही, हम भूल रहे
आज 190 से अधिक देशों में योग का अभ्यास हो रहा है, जबकि भारत में इसे अक्सर केवल एक दिवस के आयोजन तक सीमित कर दिया जाता है। यदि प्रत्येक विद्यालय, कार्यालय और उद्योग में प्रतिदिन 20 मिनट योग अनिवार्य हो जाए, तो भविष्य में लाखों लोगों को जीवनशैली संबंधी रोगों से बचाया जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण
विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे चुका है कि अवसाद आने वाले वर्षों में कार्यक्षमता घटाने वाले प्रमुख कारणों में रहेगा। भारत में भी तनाव, अकेलापन, डिजिटल निर्भरता और प्रतिस्पर्धा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। स्वस्थ भारत केवल स्वस्थ शरीर से नहीं, बल्कि स्वस्थ मन से बनेगा।
मिलावट: धीमा ज़हर
दूध, घी, मसाले, तेल और मिठाइयों में मिलावट की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का ‘ईट राइट इंडिया’ अभियान महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन जब तक खाद्य अपराधों पर कठोर दंड, नियमित जांच और उपभोक्ता जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक शुद्ध भोजन सुनिश्चित नहीं होगा।
स्वस्थ शहर, स्वस्थ नागरिक
भारत के अधिकांश शहर वाहन-केंद्रित हो गए हैं। फुटपाथ गायब हैं, साइकिल पथ नहीं हैं और बच्चों के खेल मैदान सिकुड़ रहे हैं। यदि शहर चलने लायक नहीं होंगे, तो अस्पताल भरते रहेंगे। नगर नियोजन में पार्क, पैदल मार्ग, साइकिल ट्रैक और हरित क्षेत्र को स्वास्थ्य अवसंरचना का हिस्सा मानना होगा।
बीमारी की अर्थव्यवस्था या स्वास्थ्य की संस्कृति?
भारत में दवा उद्योग, अस्पताल, जांच प्रयोगशालाएं और स्वास्थ्य बीमा का बाजार लगातार बढ़ रहा है। यह आर्थिक गतिविधि का संकेत अवश्य है, लेकिन किसी राष्ट्र की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि उसने कितने अस्पताल बनाए। वास्तविक उपलब्धि तब होगी, जब अस्पतालों की भीड़ कम होने लगे। सरकार की हर नीति कृषि, शिक्षा, शहरी विकास, खाद्य सुरक्षा, खेल और पर्यावरण का पहला प्रश्न होना चाहिए कि क्या इससे नागरिक अधिक स्वस्थ होंगे?
भारत को चिकित्सा महाशक्ति बनने से पहले स्वास्थ्य महाशक्ति बनने का लक्ष्य निर्धारित करना होगा। इसके लिए अस्पतालों से अधिक निवेश रोकथाम आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था में करना होगा। शुद्ध भोजन, पोषण, योग, खेल, मानसिक स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण, आयुष पद्धतियों के समन्वित उपयोग और व्यापक जनजागरूकता को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाना होगा।
किसी राष्ट्र की समृद्धि उसके अस्पतालों की ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले स्वस्थ, सक्रिय और प्रसन्न नागरिकों से मापी जाती है। जिस दिन भारत इलाज केंद्रित सोच से आगे बढ़कर स्वास्थ्य केंद्रित संस्कृति को अपनाएगा, उसी दिन विकसित भारत की मजबूत नींव रखी जाएगी। स्वस्थ भारत का मार्ग ऑपरेशन थिएटर से नहीं, बल्कि रसोई, खेत, विद्यालय, खेल मैदान, स्वच्छ वातावरण और अनुशासित जीवनशैली से होकर गुजरता है। यही भविष्य के भारत की सबसे बड़ी पहचान होनी चाहिए।






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