विलायती मुहर से मिली मेट्रो की इज्जत
देसी जनता टिकट काटे, सरकारें प्रचार करें और तारीफ की मुहर विलायती मेम लगाए। वाह रे आत्मनिर्भर भारत, आत्मसम्मान अभी आयात में...

बात बेलगाम
जयपुर मेट्रो को आए 11 साल से ज्यादा हो गए। करोड़ों देसी यात्री इसमें धक्के खाकर नहीं, बाकायदा टिकट लेकर सफर कर चुके हैं। मगर मेट्रो की असली इज्जत तब जागी, जब एक विलायती मेम ने सफाई देखकर तारीफ कर दी। बस, सोशल मीडिया ऐसा उछला, मानो जयपुर मेट्रो चांद पर पहुंच गई हो! सिर्फ 54 रुपये के टिकट पर दो यात्रियों का सफर हुआ, लेकिन वाहवाही का भाव सातवें आसमान पर पहुंच गया। देसी यात्री रोज सफर करें, सफाई देखें, व्यवस्था पर राय दें। उनकी बात में कौन-सा विदेशी करंट है! विलायती मेम ने रेटिंग क्या दी, मेट्रो को अंतरराष्ट्रीय प्रमाण-पत्र मिल गया। अपना भी गजब का आत्मविश्वास है! जब तक विदेशी हमारी पीठ न थपथपाए, हमें अपनी पीठ सीधी करने में भी संकोच होता है। अपने शहर की तारीफ खुद करें तो आत्ममुग्धता, विदेशी कर दे तो वैश्विक उपलब्धि! वैसे मेट्रो साफ है, अच्छी बात है। मगर सफाई और व्यवस्था का इम्तिहान एक वायरल वीडियो नहीं, रोज सफर करने वाले यात्रियों का अनुभव है। देसी जनता टिकट काटे, सरकारें प्रचार करें और तारीफ की मुहर विलायती मेम लगाए। वाह रे आत्मनिर्भर भारत, आत्मसम्मान अभी आयात में है!
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संस्कारों का विदेशी आयात!
पाली के परशुराम महादेव मंदिर में विदेशी पर्यटक धोती-कुर्ता पहनकर, माथे पर त्रिपुंड लगाकर ‘हर-हर महादेव’ कर रहे हैं। विदेशी हमारी संस्कृति अपनाने पहाड़ों की सीढ़ियां उतर रहे हैं और हम हैं कि अपनी परंपराओं को पिछड़ेपन की गठरी समझकर उतार फेंकने में जुटे हैं! कमाल है! विदेशी मंदिर में मर्यादा सीख रहे हैं और हम मर्यादा को अपनी आजादी में बाधा मान बैठे हैं। वे शिवभक्ति में रम रहे हैं, हम सोशल मीडिया पर भक्ति का स्टेटस लगाकर कर्तव्य पूरा समझ लेते हैं। अब तो पर्यटन विभाग को विदेशी श्रद्धालुओं के साथ एक प्रमाण–पत्र भी देना चाहिए कि आपने भारतीय संस्कृति को अपनाकर देशवासियों को संस्कारों का महत्त्व समझाया। लगता है, अब संस्कृति स्वदेशी है, लेकिन संस्कारों की मांग विदेशी बाजार से पूरी होगी!
किसान की दीपावली में इस बार अंधेरा!
मानसून की बेरुखी ने किसानों की दीपावली का उजाला छीन लिया। जवाई बांध में बीस प्रतिशत से भी कम पानी बचा है, खेत सूखे हैं और किसानों की आंखों में भविष्य की चिंता। जिन हाथों को फसल काटकर घर में खुशहाली लानी थी, वे अब अगली बारिश की बाट जोह रहे हैं। दीपावली पर बाजारों में रौनक होगी, मिठाइयों की खरीदारी होगी, घर जगमगाएंगे और आतिशबाजी आसमान रोशन करेगी। मगर किसान के घर इस बार त्योहार भी हिसाब-किताब लेकर आएगा। बच्चों की फीस, घर का खर्च और अगली फसल की चिंता के बीच मिठाई खरीदना भी सवाल बन गया है। किसान तेजाराम और पेमाराम जैसे परिवारों के लिए दीपावली अब उत्सव कम, मजबूरी ज्यादा है। विडंबना देखिए, जिस अन्नदाता के पसीने से दूसरों के घरों में समृद्धि के दीप जलते हैं, उसी के घर उम्मीद का दीया बुझने की कगार पर है। बांध सूखे तो पानी की चिंता बढ़ी, लेकिन किसान की आंखों में सूखे आंसुओं का हिसाब कौन रखेगा? इस दीपावली शहर रोशनी से नहाएगा, मगर पाली के किसान का घर पूछेगा जब खेत ही उजड़ गया, तो त्योहार में खुशियां कहां से बोएं?
इलाज का बिल, हिसाब बेहिसाब!
निजी अस्पतालों के चमचमाते बोर्ड पर सेहत की गारंटी लिखी होती है, मगर भीतर के हिसाब-किताब की सेहत कैसी है, यह आयकर विभाग की दस्तक ही बताती है। झुंझुनूं के एक निजी अस्पताल में कथित 20 करोड़ रुपये की टैक्स चोरी की आशंका ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की बिलिंग पर सवालिया निशान लगा दिया है। मरीज अस्पताल में बीमारी लेकर पहुंचता है और उम्मीद करता है कि सरकारी योजना उसका आर्थिक दर्द कम करेगी। मगर बिलों का मर्ज ही गंभीर हो, तो इलाज किसका होगा मरीज का या खातों का? पांच गाड़ियों में पहुंची अधिकारियों की टीम तीन दिन से कागजों और कम्प्यूटरों की नब्ज टटोल रही है। अब देखना यह है कि रिकॉर्ड से कितनी सच्चाई बाहर आती है। विडंबना देखिए, मरीज को छुट्टी मिलते ही अस्पताल से विदा होना पड़ता है, लेकिन हिसाब-किताब की जांच को छुट्टी नहीं मिल रही। आखिर स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता भी जरूरी है, क्योंकि बीमारी का इलाज होना चाहिए, बिलों का खेल नहीं!
बाघ बढ़े जंगल में, इंसान घटाए जंगल!
सरिस्का में बाघिन एसटी-26 दो नन्हे शावकों के साथ कैमरे में क्या कैद हुई, खुशियों का कुनबा बढ़ गया! बाघों की कुल संख्या 58 पहुंचने की खबर ने वन्यजीव प्रेमियों के चेहरे खिला दिए। मगर सवाल यह है कि बाघों की आबादी बढ़ रही है, तो उनके रहने के लिए जंगल कितना बढ़ रहा है? बाघिन ने न उद्घाटन समारोह किया, न विकास का श्रेय लिया और न ही शावकों के स्वागत में होर्डिंग लगवाए। चुपचाप अपना परिवार बढ़ा लिया। इधर इंसान है कि जंगल काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े करता है और फिर वन्यजीव संरक्षण के नारे लगाता है। हमारी तरक्की का गणित भी गजब है। पहले पेड़ काटो, जमीन पर कब्जे बढ़ाओ, सड़कों का जाल फैलाओ और फिर बाघों के आबादी में आने पर चिंता जताओ। बाघ जंगल में दिख जाए तो रोमांच, सड़क पर आ जाए तो सेल्फी और बस्ती में घुस जाए तो हंगामा! वन विभाग के लिए भी अब असली परीक्षा है। कैमरा ट्रैप में शावकों की तस्वीर कैद होना अच्छी खबर है, लेकिन उनकी सुरक्षा तस्वीरों से नहीं, सुरक्षित आवास और शिकार की उपलब्धता से होगी। बाघों की गिनती बढ़ाना उपलब्धि है, लेकिन उनका घर बचाना असली जिम्मेदारी। वरना इंसान जंगल निगलता रहेगा और बाघ कैमरों में ही अच्छे लगेंगे!






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