मारवाड़ी मेरे दिल की जुबान : के.सी. बोकाड़िया
बातचीत जयपुर प्रवास के दौरान फिल्म निर्माता के.सी. बोकाड़िया ने ‘राजस्थान टुडे’ के लिए वरिष्ठ पत्रकार बलवंत राज मेहता से बातचीत की। पढ़ें प्रमुख अंश- फिल्मों की दुनिया बदल गई है। कहानी...

बातचीत
जयपुर प्रवास के दौरान फिल्म निर्माता के.सी. बोकाड़िया ने ‘राजस्थान टुडे’ के लिए वरिष्ठ पत्रकार बलवंत राज मेहता से बातचीत की। पढ़ें प्रमुख अंश-
फिल्मों की दुनिया बदल गई है। कहानी कहने का तरीका बदला है, दर्शकों की पसंद बदली है और सिनेमा के माध्यम भी बदल गए हैं। लेकिन कुछ फिल्मकार ऐसे हैं जिनके लिए सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, रिश्तों और जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी रहा है। फिल्म निर्माता-निर्देशक के.सी. बोकाड़िया उन्हीं नामों में हैं। बोकाड़िया ने वर्तमान फिल्मों, पारिवारिक मूल्यों, राजस्थान, मारवाड़ी बोली, जैन संस्कारों और अपने फिल्मी सफर से जुड़े कई पहलुओं पर खुलकर बात की।
वर्तमान फिल्मों पर चर्चा चली तो उन्होंने अपने अंदाज में कहा, “आजकल की फिल्मों में वो बात नहीं है, जो मेरी सोच है। समझ के बाहर है। दाल-रोटी के स्वाद का शौकीन दूसरे स्वाद को कैसे पसंद करेगा।” उनके इस कथन में केवल फिल्मों को लेकर असहमति नहीं, बल्कि अपनी पसंद, अपनी सोच और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की भावना भी दिखाई देती है।
निर्माता और निर्देशक के रूप में उन्होंने हिंदी सिनेमा की कई चर्चित फिल्मों से जुड़कर अपनी अलग पहचान बनाई। इस दौरान उन्होंने अनेक बड़े कलाकारों के साथ काम किया और व्यावसायिक सिनेमा से लेकर पारिवारिक तथा सामाजिक सरोकारों वाले विषयों तक अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन इस लंबे फिल्मी सफर के बीच उनके व्यक्तित्व में राजस्थान की मिट्टी से जुड़ाव आज भी दिखाई देता है। वे मूलतः मेड़ता (राजस्थान) से हैं। मारवाड़ी का जिक्र आया तो बोकाड़िया का अंदाज आत्मीय हो गया। उन्होंने कहा, “मारवाड़ी मेरे दिल की जुबान है। घर में आज भी मारवाड़ी में ही संवाद होता है। कोई मुझसे मारवाड़ी में बात करता है तो मुझे बहुत खुशी होती है और मैं भी उससे मारवाड़ी में ही बतियाता हूं।” बोकाड़िया के लिए मारवाड़ी अपने घर, अपने लोगों और अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ने का माध्यम है। मारवाड़ी में किसी का संवाद करना महज बातचीत नहीं, बल्कि अपनत्व का अहसास है। परिवार और संस्कारों को उन्होंने अपने दिल के करीब बताया।
के.सी. बोकाड़िया द्वारा लिखित और निर्मित धारावाहिक ‘संस्कार’ दूरदर्शन नेशनल पर प्रसारित होने वाला लोकप्रिय पारिवारिक धारावाहिक रहा है। इसकी केंद्रीय भावना परिवार, रिश्तों और जीवन-मूल्यों के इर्द-गिर्द रही। संयुक्त परिवार की एकता, आपसी प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को कथा के माध्यम से सामने रखने का प्रयास इसमें किया गया। ‘संस्कार’ की मूल भावना यह है कि आधुनिक जीवन की आपाधापी के बीच परिवार और नैतिक मूल्य अपनी प्रासंगिकता न खोएं।
बोकाड़िया के लिए यह विषय केवल पटकथा का विषय नहीं लगता। बातचीत में उनके शब्दों से महसूस होता है कि परिवार और संस्कार उनके निजी जीवन-दर्शन से भी जुड़े हुए हैं। राजस्थान की चर्चा होते ही बोकाड़िया के भीतर का राजस्थानी मन सामने आता है। उन्होंने राजस्थानी विषयों और संस्कृति के साथ-साथ नारी सशक्तिकरण जैसे विषयों में भी अपनी रुचि व्यक्त की। राजस्थान की लोकसंस्कृति, भाषा, जीवनशैली और सामाजिक परिवेश में ऐसी अनेक कहानियां मौजूद हैं जिन्हें बड़े पर्दे तक पहुंचाया जा सकता है। उनका मानना है कि सिनेमा में मनोरंजन के साथ सामाजिक सरोकारों के लिए भी जगह होनी चाहिए। विशेषकर महिलाओं के संघर्ष, आत्मसम्मान और अपनी पहचान बनाने की कहानियां समाज के सामने सकारात्मक संवाद खड़ा कर सकती हैं। राजस्थान की लोककथाओं और सामाजिक जीवन में भी ऐसे अनेक चरित्र और प्रसंग हैं जिनमें सिनेमा के लिए पर्याप्त कथात्मक संभावनाएं हैं।
बातचीत का एक आत्मीय पहलू तब सामने आया जब जैन संस्कारों का जिक्र हुआ। बोकाड़िया ने कहा कि जैन संस्कार उनके लिए आदर्श रहे हैं। जैन परंपरा में अहिंसा, संयम और अपरिग्रह जैसे मूल्यों को विशेष महत्व दिया जाता है। बोकाड़िया के अपने शब्दों में इन संस्कारों का उनके जीवन और काम पर प्रभाव दिखाई देता है।
उन्होंने फिल्म शूटिंग के दौरान खान-पान को लेकर अपने अनुशासन का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार उनके शूटिंग सेट पर मांसाहार पर सख्त पाबंदी रहती है, चाहे कलाकार कितना भी बड़ा क्यों न हो। उनके लिए यह व्यक्तिगत आस्था और जीवन-पद्धति से जुड़ा निर्णय है।
फिल्म उद्योग में जहां सितारों की लोकप्रियता और बाजार की मांग अक्सर निर्णयों को प्रभावित करती है, वहीं बोकाड़िया अपने व्यक्तिगत मूल्यों को लेकर स्पष्ट दिखाई देते हैं। लंबे फिल्मी सफर में उन्होंने अनेक बड़े कलाकारों के साथ काम किया, लेकिन बातचीत में स्टारडम से अधिक जोर कहानी, संस्कार और अपनी सोच पर दिखाई देता है। मायानगरी में दशकों बिताने के बाद भी अपनी मातृभूमि और अपनी बोली से उनका रिश्ता सहज बना हुआ है।
मेड़ता की मिट्टी से शुरू हुई यात्रा मुंबई की चकाचौंध तक पहुंची। बड़े पर्दे पर अनेक कहानियां बनीं, बड़े सितारों के साथ काम हुआ और फिल्मी दुनिया में लंबा सफर पूरा हुआ। लेकिन उन्होंने अपनी मिट्टी से जुड़ाव बनाए रखा। मायानगरी के फिल्मकार के भीतर आज भी मेड़ता की मिट्टी की खुशबू है, घर में मारवाड़ी की मिठास है।
शायद इसीलिए ‘संस्कार’ उनके लिए महज एक धारावाहिक का नाम नहीं, बल्कि उस सोच का विस्तार है जिसे वे जीवन में भी महत्वपूर्ण मानते हैं। समय बदल सकता है, जीवनशैली बदल सकती है, लेकिन अच्छे संस्कारों और अपनी जड़ों से जुड़ाव की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।






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