चकाचौंध में गुम हो रहीं असली खुशियां
बाज़ारों की चकाचौंध, सोशल मीडिया और दिखावे की अंधी दौड़ में त्योहारों की असली सादगी, आत्मीयता व मानसिक शांति खो रही है। जानिए खुशियों की ख़रीदारी के बीच परंपरा बचाने की...

उपभोक्तावाद और त्योहार
मधुलिका सिंह,
वरिष्ठ पत्रकार
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मानसून की विदाई के साथ ही हवा में एक हल्की सी सिहरन घुलती है और इसके साथ ही दस्तक देता है त्योहारों का वह अनवरत सिलसिला, जो हर भारतीय के दिल की धड़कन से जुड़ा है। झिलमिलाती रोशनी, मिट्टी के दीयों की सोंधी महक, अपनों का साथ और पकवानों की खुशबू—यही तो पहचान रही है हमारे उत्सवों की।
लेकिन, पिछले कुछ दशकों में इस खुशनुमा माहौल के समानांतर एक और बदलाव बहुत खामोशी से हमारे घरों में दाखिल हुआ है। त्योहारों के आने की आहट अब दिल में कम और स्मार्टफोन के नोटिफिकेशन, ई-कॉमर्स वेबसाइटों के ‘मेगा सेल’ के विज्ञापनों और बाजारों की अंधी चकाचौंध में ज्यादा सुनाई देती है। आज जब हम त्योहारों के मौसम में खुद को चारों तरफ से सामानों से घिरा पाते हैं, तो एक गंभीर और बुनियादी सवाल हमारे अंतर्मन को झकझोरता है— क्या हम सचमुच त्योहार मना रहे हैं, या सिर्फ खरीदारी कर रहे हैं? क्या खुशी खरीदने की इस अंतहीन होड़ में हम अपनी जेब, अपनी मानसिक शांति, अपनी सादगी और सबसे बढ़कर अपनी वास्तविक खुशियों को कहीं खोते तो नहीं जा रहे हैं?
शो आफ इवेंट में बदल रहे त्योहार
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो त्योहार कभी मन की शुद्धि, प्रकृति के प्रति आभार और अपनों से मेल-मिलाप का जरिया थे, वे आज एक दिखावापूर्ण ‘इवेंट’ में तब्दील हो गए हैं? क्यों त्योहार आते ही नई गाड़ी, महंगे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, डिजाइनर कपड़े, आलीशान उपहार और दूसरों से बेहतर दिखने की एक अदृश्य, मगर बेहद क्रूर होड़ शुरू हो जाती है?
इसका सीधा संबंध आधुनिक समाज की सबसे बड़ी बीमारी से है, जिसे हम उपभोक्तावाद कहते हैं। उपभोक्तावाद की मूल फिलासफी ही इस बात पर टिकी है कि ‘आपके पास जो है, वह पर्याप्त नहीं है, और जब तक आप नया या अधिक नहीं खरीदेंगे, तब तक आप खुश या सफल नहीं कहलाएंगे।’ जब यह विचारधारा हमारे पारंपरिक उत्सवों से हाथ मिला लेती है, तो जन्म लेता है एक भयावह सामाजिक दबाव ।
आज के दौर में स्टेटस सिंबलह मारे अस्तित्व की पहचान बन गया है। हम क्या हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि हमारे पास क्या-क्या है। इस सामाजिक दबाव का सबसे बड़ा शिकार देश का मध्यवर्ग हो रहा है। पड़ोस के घर में आई बड़ी स्क्रीन की टीवी, रिश्तेदारों द्वारा भेजे गए महंगे मेवों के हैम्पर्स या किसी परिचित की महंगी विदेश यात्रा की तस्वीरें—ये सब मिलकर आम इंसान के भीतर एक हीनभावना और असुरक्षा पैदा करते हैं। ‘हम किसी से कम न दिखें’ या ‘समाज में हमारी नाक न कट जाए’, इस झूठी प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिए लोग अपनी क्षमता से बाहर जाकर खर्च करते हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि लोग त्योहार मनाने के लिए ‘पर्सनल लोन’ ले रहे हैं या अपने क्रेडिट कार्ड को उसकी आखिरी सीमा तक स्वाइप कर रहे हैं। हम कर्ज लेकर जो खुशियां घर ला रहे हैं, वे असल में खुशियां हैं ही नहीं, बल्कि आने वाले महीनों का मानसिक तनाव हैं।
विज्ञापन कंपनियां और सोशल मीडिया का अल्गोरिदम
हम अक्सर सोचते हैं कि बाजार से कोई सामान खरीदना हमारा अपना स्वतंत्र फैसला होता है। लेकिन क्या यह सच है? वास्तविकता यह है कि आज के डिजिटल युग में हमारी इच्छाएं अब हमारी अपनी नहीं रहीं, उनकी बाकायदा ‘प्रोग्रामिंग’ की जा रही है। कॉरपोरेट जगत, विज्ञापन कंपनियां और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम मिलकर एक ऐसा मायाजाल बुनते हैं, जिसमें फंसा हुआ आम उपभोक्ता खुद को असहाय पाता है।
विज्ञापनों की दुनिया अब सिर्फ सामान के फीचर्स (गुण) नहीं बेचती, वे आपकी भावनाओं, आपके रिश्तों और आपकी आकांक्षाओं को बेचते हैं। एक विज्ञापन आपको दिखाता है कि अगर आप एक खास ब्रांड की महंगी हीरे की अंगूठी अपनी पत्नी को नहीं देते, तो आपका प्यार अधूरा है। दूसरा विज्ञापन यह संदेश देता है कि जब तक आप एक महंगे ब्रांड की सिल्क साड़ी पहनकर पूजा में नहीं बैठतीं, तब तक त्योहार की शुचिता अधूरी है। ये विज्ञापन हमारे भीतर एक कृत्रिम आवश्यकता पैदा करते हैं। वे हमें यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाते हैं कि भौतिक वस्तुओं को खरीदे बिना खुशी का अहसास असंभव है।
इस आग में घी डालने का काम करता है सोशल मीडिया सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति के हाथ में एक ऐसा मंच दे दिया है जहाँ हर कोई अपनी जिंदगी का केवल ‘बेस्ट और सबसे चमकीला हिस्सा’ ही प्रदर्शित कर रहा है। त्योहारों के दिनों में जब हम अपनी स्क्रीन स्क्रॉल करते हैं, तो हमें केवल परफेक्ट फैमली फोटोज, परफेक्टली डेकोरेटेड होम्स और डिजाइनर कपड़ों में मुस्कुराते हुए चेहरे दिखते हैं। इस ‘डिजिटल चकाचौंध’ का मनोवैज्ञानिक असर यह होता है कि इंसान अपनी वास्तविक, साधारण और सुंदर जिंदगी से भी असंतुष्ट होने लगता है। हमें लगता है कि बाकी पूरी दुनिया बेहद खुश और समृद्ध है, बस कमी हमारे ही जीवन में है। इस खालीपन को भरने के लिए हम तुरंत ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स का रुख करते हैं और उस सामान को भी आर्डर कर देते हैं जिसकी हमें कोई वास्तविक जरूरत नहीं थी।
क्या खो रहे हैं हम इस अंधी दौड़ में?
जब हम खुशी खरीदने की इस होड़ में शामिल होते हैं, तो हम केवल पैसा नहीं खोते। पैसा तो एक ऐसी चीज है जो आज गया है, तो कल दोबारा कमाया जा सकता है। लेकिन इस होड़ में हम कुछ ऐसा खो रहे हैं जिसकी भरपाई दुनिया की कोई भी दौलत नहीं कर सकती:
मानसिक शांति : जब त्योहारों का उद्देश्य आनंद होना चाहिए, तब हम बजट के बिगड़ने, उपहारों की लिस्ट तैयार करने, दूसरों से बेहतर दिखने की प्लानिंग करने के चक्कर में भयंकर एंग्जायटी और तनाव के शिकार हो जाते हैं। उत्सव के दिन हम अंदर से शांत होने के बजाय थके हुए और चिड़चिड़े होते हैं।
रिश्तों की गर्माहट: पहले त्योहारों का मतलब होता था— हफ्तों पहले से रिश्तेदारों के आने का सिलसिला, घर के आंगन में मिलकर पापड़-मठरी बनाना, देर रात तक गप्पें मारना और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करना। आज हमने इस शारीरिक और भावनात्मक उपस्थिति को ‘डिजिटल फॉरवर्डेड मैसेज’ और महंगे रेडीमेड ‘गिफ्ट हैम्पर्स’ से बदल दिया है। हम उपहार तो भेज रहे हैं, लेकिन उनमें से आत्मीयता गायब है।
हमारी जड़ें और परंपराएं: कुम्हार के चाक पर बनी मिट्टी के दीयों की जगह जब चीन से आई सस्ती और चमकीली प्लास्टिक की झालरें ले लेती हैं, तो हम केवल एक दीया नहीं खोते, हम अपनी संस्कृति का एक हिस्सा और उस गरीब कारीगर की रोजी-रोटी भी खो देते हैं। सादगी, जो हमारे त्योहारों का मूल मंत्र थी, वह अब कॉर्पोरेट कमर्शियलाइजेशन (व्यावसायिकता) की भेंट चढ़ चुकी है।
सादगी की वापसी: क्या कम खर्च में उत्सव सार्थक हो सकता है?
इस उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच, क्या हमारे पास कोई विकल्प है? क्या यह संभव है कि हम बिना भारी-भरकम खर्च किए भी त्योहारों को उतनी ही धूमधाम और सार्थकता से मना सकें? जवाब है— हाँ, यह न केवल संभव है, बल्कि आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत भी है।
जरा अपनी स्मृतियों के गलियारे में पीछे मुड़कर देखिए। अपने बचपन के उन त्योहारों को याद कीजिए जब न तो इतने बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स थे, न ही हर हाथ में स्मार्टफोन था। ई-कॉमर्स की सेल का तो तब नामोनिशान भी नहीं था। फिर भी, वे त्योहार आज भी हमारे जीवन की सबसे खूबसूरत और जीवंत यादें क्यों हैं? क्योंकि तब त्योहारों का पैमाना ‘खर्च’ नहीं, बल्कि ‘जुड़ाव’ था।
कम खर्च में त्योहार को सार्थक बनाने के कुछ बेहद सरल और व्यावहारिक तरीके हमारे ही पास मौजूद हैं:
हाथ से बनी चीजों को तरजीह देना : बाजार से महंगी सजावट खरीदने के बजाय अगर पूरा परिवार मिलकर घर पर ही रंगोली बनाए, कागज के तोरण तैयार करे या पुराने दीयों को दोबारा रंगों से सजाए, तो वह समय परिवार को एक सूत्र में बांधता है। वह सजावट केवल घर को नहीं, बल्कि रिश्तों को भी महकाती है।
किचन में अपनों का साथ : बाजार की मिलावटी और महंगी मिठाइयों को खरीदने की जगह, घर पर पारंपरिक पकवान बनाना एक उत्सव जैसा अनुभव होता है। रसोई से उठती हुई इलाइची और घी की खुशबू बच्चों के जहन में उम्र भर के लिए त्योहार की पहचान बन जाती है।
अनुभवों पर निवेश : उपहारों पर हजारों रुपए खर्च करने के बजाय, वह समय और पैसा किसी ऐसी गतिविधि में लगाएं जो यादें बनाए। जैसे— परिवार के साथ मिलकर किसी अनाथालय या वृद्धाश्रम में जाकर खुशियां बांटना, या किसी जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा का जिम्मा उठाना। दूसरों के चेहरे पर लाई गई एक सच्ची मुस्कान जो आत्मिक संतोष देगी, उसकी तुलना किसी महंगे गैजेट से नहीं की जा सकती।
खुशियों का कोई प्राइस टैग नहीं होता
हमें एक समाज के रूप में सामूहिक तौर पर जागना होगा और इस सच को स्वीकार करना होगा कि खुशियों का मूल्य कभी भी खर्च की गई रकम से तय नहीं होता, बल्कि उनके अनुभव से तय होता है। बाजार हमें भ्रम बेचता है। वह हमें यह समझाता है कि भौतिक वस्तुएं ही सुख का पर्याय हैं। लेकिन सच यह है कि कोई भी महंगी कार, ब्रांडेड कपड़े या पांच सितारा होटल का डिनर हमें कुछ पलों का संभ्रमित (अस्थायी) सुख तो दे सकता है, पर आंतरिक शांति और सच्चा आनंद नहीं दे सकता।
सच्चा आनंद संतुष्टि से आता है, प्रदर्शन से नहीं। त्योहार हमें खुद को खाली करने और दूसरों को अपनाने का संदेश देते हैं, न कि अपने घरों को फालतू के सामान से भरने का। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को भी यही सिखाना होगा कि उत्सव का मतलब ‘कंज्यूम करना’ (उपभोग करना) नहीं, बल्कि ‘शेयर करना’ (बांटना) है।






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