उत्सव मेरा, जिम्मेदारी भी मेरी
दीपावली केवल घर की चौखट तक खुशियां और रोशनी समेटने का पर्व नहीं है। उत्सव की असली सार्थकता तब है, जब हमारी रौनक दूसरों के लिए परेशानी न बने और सार्वजनिक परिवेश स्वच्छ...

दायित्व बोध
डॉ. मधु बनर्जी,
वरिष्ठ पत्रकार
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दीपावली रोशनी, खुशियों और आपसी मेल-मिलाप का त्योहार है। घरों की सफाई से शुरू होने वाली तैयारियां गलियों, बाजारों और मोहल्लों तक उत्सव का रंग बिखेर देती हैं। दीप जलते हैं, आतिशबाजी होती है, मिठाइयां बांटी जाती हैं और लोग अपनों के साथ खुशियां साझा करते हैं। लेकिन पर्व का उल्लास धीमा पड़ते ही एक दूसरी तस्वीर भी सामने आने लगती है। सड़कों पर बिखरे पटाखों के अवशेष, प्लास्टिक की थैलियां, मिठाइयों के डिब्बे और जगह-जगह जमा गंदगी एक जरूरी सवाल खड़ा करती है। क्या हमारी भूमिका केवल पर्व मनाने तक सीमित है, या उसके बाद आसपास के परिवेश को स्वच्छ बनाए रखना भी हमारा कर्तव्य है?
दरअसल, किसी भी आयोजन की सार्थकता इस बात में है कि उसका उल्लास दूसरों के लिए असुविधा या संकट का कारण न बने। हम अपने घर को चमकाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, लेकिन दहलीज के बाहर कदम रखते ही सार्वजनिक स्थलों के प्रति हमारा दायित्व बोध कमजोर पड़ जाता है। जिस गली से हम रोज गुजरते हैं, जिस पार्क में हमारे बच्चे खेलते हैं और जिस सड़क का इस्तेमाल पूरा मोहल्ला करता है, उसकी स्वच्छता को हम अक्सर नगर निगम या सफाईकर्मियों की जिम्मेदारी मान लेते हैं। यही सोच बदलने की जरूरत है।
नागरिकता केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी
नागरिक होने का अर्थ केवल सुविधाएं प्राप्त करना, अधिकारों की मांग करना या प्रशासन से अपेक्षाएं रखना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ उस साझा जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी है, जिसका हिस्सा हम सभी हैं। सड़क, पार्क, बाजार और सार्वजनिक चौक किसी एक व्यक्ति के नहीं होते। इनका उपयोग सभी करते हैं, इसलिए इन्हें साफ और व्यवस्थित रखने में भी सबकी भागीदारी जरूरी है।
यदि हम अपने घर का कचरा सड़क पर डालकर आगे बढ़ जाते हैं, तो कुछ क्षणों के लिए सुविधा जरूर मिल सकती है, लेकिन उसका नुकसान पूरे समुदाय को उठाना पड़ता है। यही स्थिति सार्वजनिक स्थानों पर थूकने, प्लास्टिक फैलाने और तेज आवाज में लाउडस्पीकर या आतिशबाजी करने से पैदा होती है। हमारी छोटी-सी लापरवाही किसी दूसरे के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।
इसलिए स्वच्छता को केवल सफाई अभियान या सरकारी कार्यक्रम मानने के बजाय नागरिक संस्कार के रूप में अपनाना होगा। सार्वजनिक जगहों को भी अपने घर का विस्तार समझने की आदत विकसित हो जाए, तो स्वच्छता के लिए केवल निर्देशों और जुर्माने पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।
उत्सव के बाद कचरे का सवाल
दीपावली के दौरान खरीदारी, मिठाइयों की पैकिंग, उपहारों की सजावट और आतिशबाजी के कारण कचरे की मात्रा बढ़ जाती है। कागज, गत्ता, प्लास्टिक, फूल-मालाएं और पटाखों के अवशेष अलग-अलग तरह के कचरे के रूप में सामने आते हैं। इन्हें बिना छंटाई के एक साथ फेंक देने से उपयोगी सामग्री के पुनर्चक्रण की संभावना भी कम हो जाती है।
समस्या केवल कचरे की मात्रा नहीं, बल्कि उसके निस्तारण की हमारी आदत भी है। गीले और सूखे कचरे को अलग रखना, प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना और पटाखों के अवशेषों को सुरक्षित तरीके से समेटना उपयोगी कदम हैं। इनके लिए बड़े बजट की नहीं, बल्कि जागरूकता और नियमितता की जरूरत है।
ध्वनि प्रदूषण पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। त्योहार की खुशी किसी बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति, छोटे बच्चे या ध्वनि के प्रति संवेदनशील व्यक्ति के लिए परेशानी नहीं बननी चाहिए। उत्सव मनाते समय दूसरों की सुविधा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना सामाजिक संवेदनशीलता का हिस्सा है। खुशी तभी सार्थक है, जब उसमें दूसरों के सम्मान और सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए।
मोहल्ले से शुरू हो सकती है बदलाव की पहल
सामुदायिक जीवन की ताकत यह है कि छोटे स्तर पर मिलकर किए गए प्रयास बड़े बदलाव का आधार बन सकते हैं। दीपावली के अगले दिन मोहल्ले के लोग अपने आसपास की सफाई की पहल कर सकते हैं। आवासीय सोसायटियां सफाईकर्मियों के साथ समन्वय बनाकर कचरा एकत्र करने के लिए उचित स्थान तय कर सकती हैं। स्थानीय दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर कूड़ेदान रखें और ग्राहकों को भी कचरा निर्धारित स्थान पर डालने के लिए प्रेरित करें।
बच्चों और युवाओं की भागीदारी इस दिशा में विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। स्कूलों, कॉलोनियों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से उन्हें कचरा पृथक्करण, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के व्यावहारिक तरीके सिखाए जा सकते हैं। बच्चे जब अपने घर में कचरा अलग-अलग रखने की आदत अपनाते हैं, तो वे कई बार बड़ों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं।
हालांकि, सामुदायिक सफाई का अर्थ यह नहीं है कि लोग सुरक्षा की परवाह किए बिना पटाखों के अवशेष उठाने लगें। सफाई के दौरान दस्ताने, उचित उपकरण और सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है। खतरनाक अवशेषों को प्रशिक्षित सफाईकर्मियों या संबंधित एजेंसी की मदद से हटाया जाना चाहिए।
स्थानीय संस्थाएं और प्रशासन निभाएं अपनी भूमिका
मोहल्ला समितियां, आवासीय सोसायटियां, व्यापार मंडल, युवा संगठन और सामाजिक संस्थाएं लोगों को एक मंच पर लाकर स्वच्छता की पहल को नियमित बना सकती हैं। इसके लिए प्रत्येक मोहल्ले में सफाई संबंधी समस्याओं की पहचान, कचरा संग्रहण के समय और स्थान की जानकारी, गीले और सूखे कचरे के लिए अलग-अलग डिब्बों की व्यवस्था तथा प्लास्टिक के स्थान पर पुनः उपयोग योग्य थैलों को प्रोत्साहन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
सफाई व्यवस्था में कमी दिखाई देने पर संबंधित विभाग को सूचना देना और समाधान होने तक संवाद बनाए रखना भी जरूरी है। केवल एक दिन का औपचारिक कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय नियमित प्रयास किए जाएं, तो उनका असर अधिक स्थायी हो सकता है।
इस पूरी व्यवस्था में नगर निकायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। त्योहारों के बाद बढ़ने वाले कचरे को देखते हुए सफाई और कचरा संग्रहण की व्यवस्था स्थानीय जरूरतों के अनुरूप मजबूत की जानी चाहिए। नियमित कचरा उठाव, पर्याप्त संसाधन और नागरिकों की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई से व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकती है। नागरिकों से जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा के साथ प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी। स्वच्छता का स्थायी समाधान दोनों के सहयोग से ही संभव है।
बदलाव की शुरुआत अपने व्यवहार से
किसी भी सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत दूसरों को उपदेश देने से नहीं, अपने व्यवहार में बदलाव लाने से होती है। हम चाहते हैं कि हमारी सड़कें साफ रहें और सार्वजनिक पार्क सुंदर दिखें, लेकिन क्या हम स्वयं कचरा निर्धारित स्थान पर डालते हैं? क्या खरीदारी और उत्सव की तैयारियों में अनावश्यक प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करते हैं? इन सवालों के जवाब ही हमारी नागरिक चेतना को परिभाषित करते हैं।
सफाईकर्मियों के काम का सम्मान केवल उनके प्रति धन्यवाद व्यक्त करने में नहीं, बल्कि उनका काम अनावश्यक रूप से बढ़ने से रोकने में भी है। कचरा इधर-उधर न फैलाना, उसे अलग-अलग रखना और निर्धारित व्यवस्था का पालन करना उनके श्रम को सार्थक बनाने में हमारा योगदान है।
बच्चों के सामने हमारा व्यवहार भी एक उदाहरण बनता है। हम उन्हें स्वच्छता का पाठ पढ़ाएं, लेकिन स्वयं सड़क पर कचरा फेंकें, तो हमारा संदेश प्रभावी नहीं होगा। इसके विपरीत, जब परिवार के सभी सदस्य अपने आसपास की सफाई का ध्यान रखते हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे जीवनशैली का हिस्सा बन सकती है।
खुशियां ऐसी हों, जिनकी कीमत समाज न चुकाए
त्योहारों का उद्देश्य जीवन में उत्साह, सकारात्मकता और सामुदायिक संबंधों को मजबूत करना है। इसलिए जरूरी है कि हमारी खुशियों का बोझ दूसरों को न उठाना पड़े। रोशनी के साथ स्वच्छता, उत्साह के साथ संवेदनशीलता और उत्सव के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जुड़ना चाहिए।
दीपावली के बाद हर परिवार अपने घर के बाहर के हिस्से को स्वच्छ रखने का ध्यान दे, हर दुकानदार अपनी दुकान के आसपास कचरा न फैलने दे और हर सोसायटी सफाई व्यवस्था में सहयोग करे, तो बदलाव के लिए किसी बड़े अभियान का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। छोटी-छोटी पहलें मिलकर एक स्वच्छ और जिम्मेदार समाज की नींव रख सकती हैं।
अंततः, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता केवल किसी विभाग की कार्यसूची का विषय नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक समझ और नागरिक संस्कारों की पहचान है। प्रशासन की जिम्मेदारी अपनी जगह है और नागरिकों का दायित्व अपनी जगह। दोनों के बीच सहयोग ही स्थायी समाधान का रास्ता है।
इस दीपावली के बाद हम केवल अपने घरों में सहेजी गई रोशनी और यादों को ही न देखें, बल्कि आसपास की सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थलों को भी उसी अपनत्व से देखें, जिस अपनत्व से अपने घर को देखते हैं। क्योंकि उत्सव मेरा है, तो उसे सुंदर, स्वच्छ और जिम्मेदार बनाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।






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