हुनर का नया बाजार
डिजिटल मंचों ने पारंपरिक कारीगरों और युवाओं के लिए बिना बड़ी पूंजी के स्वरोजगार के द्वार खोले हैं। जरूरत सिर्फ अपने हुनर को गुणवत्ता, भरोसे और डिजिटल समझ के साथ नए बाजार से जोड़ने की...

स्लग- आत्मनिर्भरता
डॉ. त्रिलोक शर्मा,
प्रशिक्षक, करियर विश्लेषक
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राजस्थान के किसी कस्बे में बैठी महिला सुंदर कढ़ाई करती है, दीवाली पर कोई कुंभकार सुंदर दीये बनाता है, कोई युवक मोबाइल की मरम्मत जानता है और किसी परिवार के अचार की पूरे मोहल्ले में तारीफ होती है। कुछ साल पहले तक इस हुनर के ग्राहक वही थे, जो दुकान, कुंभकार के चाक या हाट तक पहुंच पाते थे। आज वही कढ़ाई, वही अचार और कुम्हार का वही दीया मोबाइल की स्क्रीन पर दिखता है। ऑर्डर किसी दूसरे शहर से आता है और भुगतान यूपीआई से। मिट्टी वही है, हाथ वही हैं, हुनर वही है; बदला है तो सिर्फ रास्ता। लेकिन दरवाजा खुलना और कारोबार चल पड़ना अलग बातें हैं। इनके बीच भरोसे, गुणवत्ता और कारोबारी समझ की मेहनत है।
नौकरी खोजने से काम रचने तक
रोजगार की चर्चा अक्सर नियुक्ति पत्र पर आकर रुक जाती है, जबकि आजीविका का एक रास्ता अपनी क्षमता से किसी वास्तविक जरूरत को पूरा करना भी है। यह बात मैंने अपने ही घर में देखी। मेरा बड़ा बेटा दिव्यांशु बेंगलुरु में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर था। कोविड के दौर में कंपनी की खर्च-कटौती में उसकी नौकरी चली गई। निराश होने के बजाय उसने मुझसे कहा कि अब वह किसी नौकरी के भरोसे नहीं रहेगा, अपना काम करेगा। सच कहूं तो मैं आश्वस्त नहीं था। पर दो वर्ष की लगातार मेहनत के बाद आज वह घर बैठे ऑनलाइन मंचों के जरिए एआई ट्रेनर का काम कर रहा है। कमाई दस से पांच की नौकरी से बेहतर है और दफ्तर के घंटों का कोई बंधन नहीं।
डिजिटल मंचों ने एक तीसरा रास्ता खोला है: न पूरी तरह नौकरी, न बड़ी पूंजी वाला व्यापार, बल्कि हुनर पर टिका छोटा उद्यम। ई-कॉमर्स मंच बिना दुकान के देशभर का बाजार देते हैं। व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और यूट्यूब अपने आप में दुकान, विज्ञापन और ग्राहक-सेवा केंद्र बन गए हैं। सरकारी पहल वाला खुला नेटवर्क ओएनडीसी बड़े मंचों पर निर्भरता घटाने का विकल्प देता है और पीएम विश्वकर्मा योजना पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण, औजार और ऋण से जोड़ती है।
अवसर केवल उत्पाद बेचने में नहीं हैं। कोई युवा आसपास के पांच दुकानदारों की ऑनलाइन सूची बना सकता है, कोई कारीगरों के उत्पादों की तस्वीरें खींचने और ग्राहकों को जवाब देने का जिम्मा ले सकता है। बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की डिजिटल समझ मिल जाए, तो परिवार का पुराना काम नया बाजार पा सकता है।
सफलता की असली कहानियां
उदयपुर के एक व्यवसायी का उदाहरण मैं नजदीक से जानता हूं। एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पर उनका चांदी के उपहारों का बड़ा शोरूम था। कोविड में पर्यटन ठप हुआ तो किराया और वेतन भरना भारी पड़ने लगा। उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय ऑनलाइन मंचों का सहारा लिया। दो-तीन साल की अथक मेहनत के बाद आज वह महंगा शोरूम बंद है, पूरा कारोबार घर से चलता है, बिक्री शोरूम के दिनों से अधिक है और पहले से ज्यादा लोग उनके यहां काम करते हैं।
सेवा क्षेत्र में भी यही बदलाव है। मेरे एक सहपाठी मित्र आज यूट्यूब पर ज्योतिषीय मार्गदर्शन देते हैं। उनके चैनल से लाखों लोग जुड़े हैं और यही उनकी आय का बड़ा साधन है। आसपास नजर डालें तो पॉडकास्ट, चैनल या समाचार पोर्टल चलाने वाले कई परिचित मिल जाएंगे।
सामूहिक प्रयास की मिसाल बाड़मेर का रूमा देवी ब्रांड है। ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान ने कारीगरों के लिए उत्पादक कंपनी विकसित की, जिसका ऑनलाइन मंच यहां की कढ़ाई को देश-विदेश के खरीदारों तक ले जाता है। इसी मंच से जुड़ी छगनी देवी ने पारंपरिक कढ़ाई को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन से निखारा, प्रदर्शनियों और फैशन आयोजनों में पहचान पाई और अपनी बेटियों को भी यह हुनर सिखाया। पड़ोसी गुजरात में ओखाई से जुड़ी लाखु बेन पहले निर्माण कार्य में पत्थर तोड़ती थीं; प्रशिक्षण के बाद कुशल शिल्पकार बनीं और उनकी कमाई बच्चों की पढ़ाई और घर बनाने में लगी। सीख साफ है: इंटरनेट पर तस्वीर डाल देना काफी नहीं, हुनर को प्रशिक्षण, संगठन और बाजार से जोड़ना होता है।
चमक के पीछे की चुनौतियां
पहली चुनौती पहचान की है। एक जैसे हजारों उत्पादों के बीच ग्राहक आपको नहीं जानता; वह तस्वीर, कीमत और समीक्षाएं देखता है। इसलिए वास्तविक तस्वीरें, स्पष्ट कीमत, सामग्री, आकार और पहुंचने का समय सामने होना चाहिए।
दूसरी चुनौती गुणवत्ता की निरंतरता है। हाट में ग्राहक सामान छूकर खरीदता है, ऑनलाइन वह तस्वीर पर भरोसा करता है। कपड़ा रंग छोड़ दे या अगली खेप का स्वाद बदल जाए, तो एक खराब समीक्षा महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है। मैं ऐसे कई लघु उद्यमियों को जानता हूं, जिन्हें पैकिंग और गुणवत्ता की छोटी-सी चूक के कारण कम समय में भारी नुकसान उठाकर कारोबार बंद करना पड़ा। वहीं कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने गुणवत्ता, पैकिंग और ग्राहक सेवा को सर्वोपरि रखा, “कम मुनाफा, ज्यादा बिक्री” का सिद्धांत अपनाया और आज केवल ऑनलाइन मंचों से करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं।
तीसरी चुनौती पैसे की है। बिक्री की रकम पूरी कमाई नहीं होती। कच्चा माल, अपनी मेहनत, पैकिंग, भेजने का खर्च, मंच का कमीशन, प्रचार और लौटे सामान का नुकसान घटाने के बाद असली बचत निकलती है। 500 रुपये की वस्तु पर ये खर्च 430 रुपये हों, तो बचत सिर्फ 70 रुपये है। भुगतान का समय भी अहम है; माल बनाने में पैसा आज लगता है और रकम हफ्तों बाद आए तो अगली खेप अटक जाती है। इसलिए मंच की भुगतान-अवधि, कटौतियां और वापसी की शर्तें पहले लिखित में समझें, हर लेनदेन का रिकॉर्ड रखें और एक ही मंच पर पूरी तरह निर्भर न रहें।
इन्हीं अवसरों की आड़ में ठग भी सक्रिय हैं। बिना कौशल के निश्चित मोटी कमाई, वीडियो पसंद करने के बदले पैसे या कमाई निकालने से पहले “शुल्क” की मांग खतरे के संकेत हैं। ग्राहक के भेजे स्क्रीनशॉट के बजाय अपने खाते में रकम की पुष्टि करें। पैसा पाने के लिए यूपीआई पिन डालने की जरूरत नहीं होती, इसलिए ओटीपी या पिन किसी से साझा न करें। ठगी हो जाए तो तुरंत बैंक को सूचित करें, 1930 पर फोन करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
युवाओं के लिए राह
शुरुआत अपने आसपास की जरूरत पहचानने से करें। दस संभावित ग्राहकों से बात करें, सीमित नमूने बनाएं और तीस दिन में देखें कि लोग किस कीमत पर खरीदते हैं, शिकायत क्या है और दोबारा मांग आती है या नहीं। हुनर पहले, मंच बाद में; ऐप बदलते रहेंगे, कौशल ही असली पूंजी है। और अपनी कहानी बताइए, क्योंकि ग्राहक उत्पाद के साथ उसके पीछे का इंसान और परंपरा भी खरीदता है।
जाम्बवान की भूमिका
रामायण में समुद्र तट पर जब सारे वानर निराश बैठे थे, तब अपार बल के धनी हनुमान जी अपनी शक्ति भूले हुए थे। जाम्बवान जी ने उन्हें उनकी क्षमता का स्मरण कराया और वही हनुमान जी सौ योजन का समुद्र लांघ गए। हमारे गांवों और कस्बों में ऐसे लाखों “हनुमान” हैं: हाथ में हुनर, मन में लगन, पर अपनी क्षमता से अनजान। उन्हें जाम्बवान चाहिए।
अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मेरे पास ऐसे कई युवा आते हैं, जिनके मन में नए विचार होते हैं और जो उन्हें जमीन पर उतारने की सलाह चाहते हैं। उनमें से कई ने ऑनलाइन काम शुरू किया, अपनी क्षमता पहचानी और छोटे से प्रयास को आज एक बड़ी व्यावसायिक फर्म में बदल दिया है। परिवारों को भी घर से होने वाले काम को “खाली समय का शौक” मानना छोड़ना होगा; महिला उद्यमी को समय, जगह और घरेलू सहयोग चाहिए।
समाज के लिए संदेश
आज हमारे हाथ के मोबाइल का अधिकांश उपयोग उपभोग में होता है: रील देखने, खरीदारी करने और समय बिताने में। पर जो उपकरण हमें ग्राहक बनाता है, वही हमें विक्रेता, शिक्षक, कलाकार और उद्यमी भी बना सकता है। यदि हर परिवार अपने बच्चे से पूछे, “आज तुमने मोबाइल से क्या सीखा या क्या बनाया?”, तो आने वाली पीढ़ी नौकरी मांगने वाली नहीं, नौकरी देने वाली बनेगी।
इस दीपावली जब आप हाथ से बना कोई दीया खरीदें, तो याद रखिए कि आप केवल एक वस्तु नहीं ले रहे। आप किसी के हुनर को पहचान दे रहे हैं और किसी परिवार की आजीविका का दीपक जला रहे हैं।
कुछ साझा सूत्र:
| सफल उद्यमी क्या करते हैं | असफल प्रयास कहां चूकते हैं |
| एक छोटे, स्पष्ट ग्राहक-वर्ग से शुरुआत | “सबको सब कुछ” बेचने की कोशिश |
| गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं | जल्दी कमाई के लिए गुणवत्ता घटाना |
| ग्राहक से सीधा, विनम्र संवाद | शिकायत को अनदेखा करना |
| कमाई का हिसाब और नकदी की योजना | पूरी कमाई तुरंत खर्च कर देना |
| धैर्य: पहले भरोसा, फिर बिक्री | पहले महीने में ही निराश होकर छोड़ देना |
| लगातार सीखना (वीडियो, फोटो, पैकिंग) | “मुझे सब आता है” वाला भाव |
युवाओं के लिए पांच व्यावहारिक सीख
- हुनर पहले, मंच बाद में: ऐप बदलते रहेंगे, पर आपका कौशल आपकी असली पूंजी है।
- छोटे से शुरू करें, पर ईमानदारी से: दस संतुष्ट ग्राहक सौ आधे-अधूरे ग्राहकों से बेहतर हैं।
- अपनी कहानी बताइए: ग्राहक केवल उत्पाद नहीं, उसके पीछे का इंसान और परंपरा भी खरीदता है।
- डिजिटल सुरक्षा और हिसाब सीखिए: भुगतान की पुष्टि बैंक खाते में ही करें, स्क्रीनशॉट पर नहीं। हर लेन-देन का रिकॉर्ड रखें।
- सरकारी योजनाओं और स्थानीय नेटवर्क का लाभ लें: उद्यम पंजीकरण, स्वयं सहायता समूह और कौशल प्रशिक्षण अकेले संघर्ष को सामूहिक शक्ति में बदल देते हैं।






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