चढ़ावे की चोरी : लीपापोती होगी या होगा राजफाश
अयोध्या के राममंदिर में चढ़ावे की कथित हेराफेरी ने केवल वित्तीय अनियमितताओं ही नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसआईटी जांच में कई गड़बड़ियों के संकेत...

रामभक्तों की आस्था और जांच की विश्वसनीयता पर उठते सवाल
भले ही अयोध्या के राममंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच के लिए गठित एसआईटी की शुरुआती जांच रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुंच चुकी है, लेकिन इस मामले की अब तक कोई प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज नहीं कराई गई है। बिना एफआईआर के इस रिपोर्ट का मतलब क्या है?
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विपक्ष के लगातार हमलों, आस्थावान लोगों की चिन्ता, हिन्दू संगठनों की मांग और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के आग्रह पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 14 जून को लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। जांच दल के अन्य सदस्यों में लखनऊ रेज के आईजी किरण शिवकुमार और उत्तरप्रदेश वित्त विभाग के विशेष सचिव नीलरतन कुमार शामिल थे। एसआईटी ने छह दिन अयोध्या में रुक कर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्र और व्यवस्थापक गोपाल राव समेत सेवादार रामशंकर यादव उर्फ टिंकू यादव, अनुकल्प मिश्र, लवकुश मिश्र, अवनीश, सोमेश आनन्द समेत करीब 60 लोगों से पूछताछ के बाद रिपोर्ट सौंपी है। विशेष जांच दल ने बैंक अधिकारियों और नोटों की गिनती से जुड़ी निजी एजेंसी के प्रतिनिधियों से भी पूछताछ की है और बैंक स्टेटमेंट तथा वित्तीय रिकॉर्ड की भी पड़ताल की है।
अभी किसी को क्लीनचिट नहीं
बताया जाता है कि एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में किसी को क्लीनचिट नहीं दी है। साथ ही विस्तृत जांच के लिए और समय की मांग की है। एसआईटी को अब तक की जांच में कई गड़बड़ियों के सुबूत मिले हैं। जांच में सीसीटीवी में छेड़छाड़ के भी सुबूत मिले हैं। दान की राशि के रिकॉर्ड से भी एसआईटी संतुष्ट नहीं है। अभी तक की जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, उससे न सिर्फ नकदी बल्कि दान किए गए सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात की भी हेराफेरी की आशंका है। इसलिए विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में ट्रस्ट का पुनर्गठन करने, मंदिर के प्रबंधन को व्यवस्थित करने, चढ़ावा और जेवरात की निगरानी करने, जवाबदेही तय करने और किसी प्रशासनिक अधिकारी की बतौर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के रूप में नियुक्ति करने की भी सिफारिश की है।
सात जून को अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पाण्डेय ने राममंदिर के चढ़ावे में 7.50 करोड़ की हेराफेरी का आरोप लगाया था, तब किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। दूसरे दिन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष सांसद अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को लपक लिया और सरकार से न्यायिक जांच की मांग की। तब जाकर लोगों को मामले की गंभीरता का पता चला। फिर क्या था, बजरंग दल के अध्यक्ष और राममंदिर प्रबंध समिति से दरकिनार किए गए पूर्व सांसद विनय कटियार, धर्मसेना के प्रमुख संतोष दुबे, हिन्दू महासभा के उपाध्यक्ष पंडित अशोक शर्मा और कुछ साधु संतों ने अखिलेश के आरोपों को हवा दे दी। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह तो श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की जमीन खरीद में गड़बड़झाला को लेकर थाने में शिकायत लेकर पहुंच गए। शुरुआत में तो उत्तरप्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य समेत भाजपा के कई नेता प्रदेश की मस्जिदों के चढ़ावे में हेराफेरी का आरोप लेकर काउंटर करने मैदान में उतरे, लेकिन आखिरकार जीत रामभक्तों की ही हुई। यह आज की राजनीति का नया चलन है। यहां सवाल के बदले सवाल किए जाते हैं। दबाव में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को विशेष जांच दल का गठन करना पड़ा। लेकिन एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय भेजे जाने से शक गहरा रहा है। कायदे से रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर करानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है।
उच्च स्तर पर चुप्पी को लेकर संदेह
बड़ा सवाल यह कि क्या केंद्र के कहने पर उत्तरप्रदेश सरकार ने एसआईटी का गठन किया था ? यदि यह सही है तो प्रधानमंत्री इस मसले पर अभी तक चुप क्यों हैं ? गृहमंत्री भी कुछ नहीं बोल रहे हैं। उत्तरप्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। राम आम आदमी के रोम-रोम में बसे हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी राममंदिर बनवाने के नाम पर ही देश-प्रदेश में सत्ता के शिखर पर पहुंची है। यदि राम के चढ़ावे की चोरी होती रही और गुनहगार बेखौफ घूमते रहे तो निश्चित रूप से दोषियों को बचाने वालों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या गए थे। उन्होंने लोगों को आश्वस्त किया था कि जैसे प्रभु श्रीराम के मंदिर के लिए 500 साल प्रतीक्षा किया, वैसे चढ़ावा चोरी की जांच के लिए 15 दिन तक इंतजार करें, दूध का दूध और पानी का पानी होगा। बेशक, लोगों को मुख्यमंत्री के भरोसे का सम्मान करना चाहिए।
सवाल यह भी है कि क्या ट्रस्ट में शामिल लोगों को पद से हटा देने भर से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा? अभी तक बिना एफआईआर कराये कुछ लोगों से दो करोड़ से अधिक रुपये की बरामदगी हो चुकी है। रामशंकर यादव के घर से कुछ सोना भी बरामद हुआ है। ऐसे में जाहिर है कि मामला 7.50 करोड़ की हेराफेरी का ही नहीं है। उससे ज्यादा का है। चोरों का गिरोह कब से यह काम कर रहा था, अभी तो इसका भी पता नहीं चला है। अयोध्या में सेवादारों की नियुक्ति कौन करता है? इसके मानक क्या हैं? बहाली से पहले उनकी जांच- पड़ताल होती भी है या नहीं। रामशंकर पहले ऑटो चलाया करता था। फिर चंपत राय की कार चलाने लगा। अब राममंदिर की सेवा में आने के बाद उसके 70 कमरों का होटल और अयोध्या – लखनऊ में आलीशान मकान कहां से बन गए। अनुकल्प मिश्र ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्र का बेटा है। पहले क्या करता था। राममंदिर में सेवा के दौरान उसने कहां से इतनी कमाई कर ली कि डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन खरीद ली और बंगला बना लिया। लवकुश अनुकल्प का साला लगता है। उसके ठिकाने से घर के घूरे में रखे 12 लाख रुपये नकद मिले हैं। अयोध्या में 40 लाख कीमत की जमीन भी है। सवाल यह भी है कि ट्रस्टियों के मनोनयन से पहले क्या सरकार ने उनकी माली हालत की जांच कराई थी? ट्रस्ट में आते ही वे मालामाल कैसे हो गए?
उत्तरप्रदेश कैडर के 1967 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अवकाशप्राप्त अधिकारी नृपेन्द्र मिश्र पहले प्रधानमंत्री कार्यालय के मुख्य सचिव थे। अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के सदस्य हैं। वे राममंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि मामला चढ़ावा चोरी का नहीं, डकैती का है। तो क्या नृपेन्द्र मिश्र पवन पाण्डेय और अखिलेश यादव के आरोपों का इंतजार कर रहे थे? अब तक चुप क्यों थे?
आखिर कब से चल रहा था ये मकड़जाल?
2015 में हिन्दू महासभा ने श्रीराम मंदिर निर्माण के चंदे में 1400 करोड़ चोरी का आरोप लगाया था। 2019 में निर्मोही अखाड़ा ने भी इस आरोप को दोहराया था। उसका क्या हुआ? कोई जांच नहीं हुई और कोई कार्रवाई भी नहीं हुई। इसलिए चढ़ावा चोरी मामले में भी क्या कारवाई होती है, इस पर सबकी नजर रहेगी। रुपया चोरी और आना बरामदगी से काम नहीं चलेगा। चोरी का यह मकड़जाल कब से चल रहा था, इसकी जांच होनी चाहिए। विश्व सिंधी सेवा संगम समागम के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ राजू मनवानी का दावा है कि 26 जनवरी 2021 को सिंधी समाज की ओर से एक-एक किलो चांदी की दो सौ ईंटें राममंदिर में चंपत राय की मौजूदगी में दान की गयी थीं। उसकी न तो रसीद दी गई थी न ही आजतक बताया गया कि उसका उपयोग कहां किया गया। इसी तरह के आरोप कुछ और लोगों ने भी लगाए हैं। क्या ही अच्छा होता यदि इसकी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होती, ताकि लोगों का भरोसा कायम रहता।





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