क्या हो गया चीनी को?
आज चीनी रसोई के बजट में सेंध लगा रही है। कई शहरों में इसके दाम 60 से 65 रुपये किलो और कुछ बाजारों में इससे भी ऊपर पहुंच गए...

कभी मुफ्त की मिठास, आज महंगाई की कड़वाहट
कभी चीनी इतनी सामान्य और सस्ती चीज हुआ करती थी कि दुकानदार ग्राहकों को सामान खरीदने पर चीनी तक मुफ्त में दे दिया करते थे। त्योहारों के दिनों में इसकी थैलियां उपहार में मिलती थीं और घर-घर चाय की प्याली में घुलती मिठास की कीमत पर कोई विशेष चर्चा नहीं होती थी। आज वही चीनी रसोई के बजट में सेंध लगा रही है। कई शहरों में इसके दाम 60 से 65 रुपये किलो और कुछ बाजारों में इससे भी ऊपर पहुंच गए हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि चीनी महंगी क्यों हुई; बड़ा सवाल यह है कि गन्ने के खेत से रसोई तक आते-आते हमारी चीनी में इतनी कड़वाहट क्यों घुल गई?
चीनी के दामों में मौजूदा उछाल अचानक जरूर दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इस साल देश में चीनी उत्पादन पिछले अनुमान से कम रहने की आशंका है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम और गन्ने की उत्पादकता ने उत्पादन को प्रभावित किया है। जब आपूर्ति घटती है और उसी समय मांग बढ़ती है तो बाजार में कीमत का बढ़ना स्वाभाविक है।
इस बार मांग बढ़ने का समय भी महत्वपूर्ण है। गणेशोत्सव, नवरात्र, दशहरा, दीपावली और उसके बाद विवाहों का मौसम भारत में इन महीनों में मिठाइयों, बेकरी उत्पादों, पेय पदार्थों और घरेलू उपयोग के लिए चीनी की मांग बढ़ जाती है। यानी एक तरफ बाजार में उपलब्ध चीनी कम है और दूसरी तरफ उसकी जरूरत बढ़ रही है। इसी खिंचाव ने कीमतों को ऊपर धकेला है।
लेकिन कहानी केवल उत्पादन और मांग की नहीं है। जब बाजार को भविष्य में कमी का अंदेशा होता है तो व्यापारी और बड़े खरीदार स्टॉक बढ़ाने लगते हैं। यही आशंका सरकार को भी चिंतित करती है। इसलिए केंद्र ने व्यापारियों और बड़े उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा जैसे कदम उठाए हैं, ताकि जरूरत से ज्यादा भंडारण करके कृत्रिम कमी पैदा न की जा सके।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार को लगभग एक दशक बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देनी पड़ी है। दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल भारत के लिए यह सामान्य घटना नहीं है। आयात का फैसला बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति लाने और कीमतों पर दबाव कम करने की कोशिश है। यहां एक सवाल उठता है जब भारत इतना बड़ा चीनी उत्पादक है तो आखिर आयात की नौबत क्यों आई? इसका उत्तर हमें चीनी उद्योग की पुरानी समस्याओं में भी तलाशना होगा।
भारत का चीनी उद्योग वर्षों से गन्ने के उचित मूल्य, मिलों की वित्तीय स्थिति, किसानों के बकाये, उत्पादन लागत और सरकार की मूल्य नीतियों के बीच झूलता रहा है। किसान चाहता है कि उसे गन्ने का बेहतर मूल्य और समय पर भुगतान मिले। मिल चाहता है कि उसकी लागत निकले और उसे बाजार में लाभ मिले। उपभोक्ता चाहता है कि चीनी सस्ती रहे। सरकार इन तीनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। लेकिन इस त्रिकोण में कहीं न कहीं हमेशा कोई एक पक्ष असंतुष्ट रह जाता है।
इथेनॉल नीति ने भी गन्ने के उपयोग की दिशा बदली है। हालांकि सरकार ने वर्तमान चीनी मूल्यवृद्धि का मुख्य कारण इथेनॉल को नहीं माना है और उत्पादन में कमी, त्योहारी मांग तथा आपूर्ति की तंगी को अधिक महत्वपूर्ण बताया है, फिर भी गन्ने और चीनी के बीच संतुलन का सवाल भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। आखिर गन्ने से चीनी बनेगी, इथेनॉल बनेगा या दोनों के बीच संतुलन कायम होगा इसका सीधा असर आने वाले वर्षों में चीनी की उपलब्धता पर पड़ेगा।
चीनी के दामों का इतिहास भी हमें बहुत कुछ बताता है। आजादी के बाद लंबे समय तक चीनी पर सरकारी नियंत्रण रहा। राशन की दुकानों के माध्यम से नियंत्रित दर पर चीनी उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी। ‘लेवी शुगर’ के जरिए सरकार मिलों से चीनी लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचाती थी। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए राशन की दुकान की चीनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी।
फिर समय बदला। बाजार व्यवस्था बदली। चीनी उद्योग में नियंत्रण कम हुआ। उत्पादन, कीमत और वितरण में बाजार की भूमिका बढ़ती गई। राशन की दुकानों पर चीनी की सार्वभौमिक उपलब्धता धीरे-धीरे कम होती गई और कई राज्यों में यह सुविधा लक्षित परिवारों अथवा विशेष योजनाओं तक सीमित हो गई।
आज भी कुछ राज्यों में गरीब परिवारों को रियायती चीनी मिलती है। कुछ राज्यों में त्योहारों के अवसर पर सरकारें मुफ्त या सस्ती चीनी उपलब्ध कराती हैं। लेकिन देशभर में राशन कार्ड पर नियमित रूप से चीनी मिलना अब पहले जैसी सामान्य व्यवस्था नहीं है।
यही बदलाव आज की महंगाई को अधिक चुभता है। जिस वस्तु को कभी सरकारी राशन व्यवस्था के जरिए नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराया जाता था, उसी के लिए आज उपभोक्ता को खुले बाजार की कीमत चुकानी पड़ रही है। और चीनी केवल चाय में डालने की वस्तु नहीं है। मिठाई, बिस्कुट, नमकीन, बेकरी उत्पाद, आइसक्रीम, शीतल पेय और अनेक खाद्य पदार्थों की लागत इससे जुड़ी है। चीनी महंगी होगी तो उसका असर केवल गृहिणी की रसोई तक सीमित नहीं रहेगा; खाद्य उद्योग और अंततः उपभोक्ता की पूरी खाद्य टोकरी पर पड़ेगा।
इसलिए सरकार का केवल आयात कर देना या स्टॉक सीमा लगाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत एक ऐसी दीर्घकालिक चीनी नीति की है जिसमें किसान को गन्ने का उचित मूल्य मिले, मिलें आर्थिक रूप से टिकाऊ रहें, किसानों का भुगतान समय पर हो, चीनी का पर्याप्त बफर स्टॉक रहे और उपभोक्ता को अचानक कीमतों के झटके न सहने पड़ें।
आज चीनी की बढ़ती कीमत हमें एक पुरानी तस्वीर भी याद दिलाती है। कभी दुकानदार ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए सामान के साथ चीनी की थैली मुफ्त में दे दिया करते थे। तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन यही चीनी परिवार के मासिक बजट का हिसाब बिगाड़ने लगेगी।
मिठास की वस्तु में कड़वाहट बाजार ने नहीं, हमारी नीतियों और व्यवस्था की कई परतों ने मिलकर पैदा की है। सवाल इसलिए केवल यह नहीं कि चीनी कितनी महंगी हो गई। सवाल यह है कि जिस देश के खेतों में गन्ना लहलहाता है, वहां उसकी चीनी आम आदमी की पहुंच से दूर क्यों होने लगे?
गन्ने के खेत में किसान की मेहनत है, मिल में मजदूर का पसीना है, व्यापार में पूंजी है और रसोई में आम आदमी की उम्मीद। इन सबके बीच यदि मिठास लगातार महंगी होती जाएगी तो हमें सिर्फ चीनी के दाम नहीं, पूरी व्यवस्था का स्वाद बदलने पर विचार करना होगा। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में चीनी की मिठास सिर्फ यादों में बची रह जाए और बाजार में उसकी जगह महंगाई की कड़वाहट ही रह जाए।




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