खतरा पता है, फिर हादसे का इंतजार क्यों?
लखनऊ में 15 युवाओं की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। राजस्थान सरकार स्वयं मान चुकी है कि राज्य में 3,768 स्कूल भवन जर्जर हैं और 86,934 कक्षाएं असुरक्षित...

15 मौतों के बाद फिर वही सवाल
लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में लगी भीषण आग ने 15 जिंदगियां छीन लीं। इनमें अधिकांश युवा छात्र और प्रशिक्षु थे, जो अपने भविष्य को संवारने की तैयारी कर रहे थे। कुछ ही मिनटों में सपने राख में बदल गए और पीछे छूट गए वे सवाल जिनका जवाब व्यवस्था को देना होगा।
Table Of Content
इस हादसे के बाद राजस्थान में भी प्रशासन सक्रिय हुआ। जयपुर में 18 कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरी को सील किया गया। कई अन्य संस्थानों को नोटिस जारी किए गए। पहली नजर में यह कार्रवाई राहत देती है, लेकिन जरा ठहरकर सोचिए। क्या ये कमियां कल पैदा हुई थीं? क्या इन संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पहली बार जांची गई थी?
खतरा नया नहीं, कार्रवाई नई है
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जयपुर के कई संस्थानों को पहले भी नोटिस दिए जा चुके थे। अर्थात प्रशासन को कमियों की जानकारी थी। फिर भी संस्थान चलते रहे और हजारों विद्यार्थी वहां पहुंचते रहे। यही वह बिंदु है जहां कहानी केवल कोचिंग संस्थानों की नहीं रह जाती। सवाल प्रशासनिक जवाबदेही का भी बन जाता है। यदि कोई भवन असुरक्षित है तो उसे नोटिस देकर छोड़ क्यों दिया जाता है? यदि खतरा वास्तविक है तो कार्रवाई तत्काल क्यों नहीं होती?
सरकारी आंकड़े ही चिंता बढ़ाते हैं
राजस्थान की स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर और गंभीर दिखाई देती है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में स्वीकार किया है कि प्रदेश में 3,768 सरकारी स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर हैं। लगभग 85 हजार कक्षाएं उपयोग योग्य नहीं हैं। एक अन्य सरकारी सर्वे में 86,934 कक्षाओं को पूरी तरह असुरक्षित बताया गया है। इतना ही नहीं, 5,667 स्कूल भवन ऐसे पाए गए जिन्हें उपयोग के लिए अनुपयुक्त माना गया।
ये आंकड़े किसी विपक्षी दल या सामाजिक संगठन के नहीं हैं। ये सरकार और उसके विभागों के अपने आंकड़े हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि खतरा ज्ञात है तो समाधान की गति इतनी धीमी क्यों है?
हादसे के बाद जागने की आदत
दुर्भाग्य से हमारे प्रशासनिक ढांचे में एक प्रवृत्ति लगातार दिखाई देती है।
पुल गिरता है तो पुलों की जांच शुरू होती है।
अस्पताल में मौतें होती हैं तो स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा होती है।
स्कूल की छत गिरती है तो भवनों का सर्वे शुरू होता है।
कोचिंग में आग लगती है तो अग्नि सुरक्षा अभियान चलाया जाता है। यानी हम खतरे को रोकने की बजाय अक्सर हादसे के बाद प्रतिक्रिया देते दिखाई देते हैं।
सबसे बड़ा सवाल
आज चर्चा 18 कोचिंग संस्थानों के सील होने की है। लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। राजस्थान में अभी कितने ऐसे स्कूल, कोचिंग संस्थान, लाइब्रेरी और अन्य सार्वजनिक भवन हैं जिन्हें सरकार या प्रशासन असुरक्षित मान चुका है, फिर भी वहां बच्चे और युवा रोज पहुंच रहे हैं?
यदि लखनऊ की आग के बाद कार्रवाई हो सकती है तो पहले क्यों नहीं हुई?
क्यों हर बार किसी त्रासदी को चेतावनी बनना पड़ता है?
क्योंकि सुरक्षा का मतलब हादसे के बाद कार्रवाई नहीं, बल्कि हादसे को होने से रोकना है। और जब खतरा पहले से दिखाई दे रहा हो, तब देरी केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी बन जाती है।





No Comment! Be the first one.