कविता में शब्दों की ताकत
कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और कल्पना को अर्थ देने की कला है। भाषा उसका माध्यम है, जो साधारण शब्दों को नए अर्थ और भाव देती...

अभिव्यक्ति
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
आपके पास धागों का एक गुच्छा है। उसे आप पहन नहीं सकते। किंतु अगर इन धागों को तरतीब दे दी जाए तो वह कपड़ा बन जाएगा। अब उसे आप पहन सकते हैं। उसे ओढ़ सकते हैं। यह तरतीब देना कविता है। भाषा (शब्द) धागे हैं। कविता में भाषा का इतना ही काम है।
भाषा कविता का उपकरण है। जैसे चित्रकार के लिए रंग और तुलिका। संगीतकार के लिए स्वर, वाद्ययंत्र, वैसे ही कवि के लिए भाषा। उपकरण अपने आप में कला नहीं है। इसी तरह सिर्फ भाषा से कविता नहीं होती। कविता का जन्म कवि की संवेदना, अनुभव, कल्पना, दृष्टि और सृजनात्मकता से होता है। भाषा उन सबको रूप देने का माध्यम है। भाषा एक टूल है। आप अपने टूल को कितने अच्छे से इस्तेमाल करते हैं यह आपका कौशल है।
कविता में शब्द इशारे होते हैं। वे हमें वह दिखाने का प्रयास करते हैं जो हमारा सत्य है। जो हमारा साध्य है। भाषा साध्य नहीं, साधन है। साध्य तो वह है, जिसे हम कह नहीं पा रहे। कविता की आवश्यकता ही इसलिए पड़ती है कि हमें वह कहना होता है जो साधारण भाषा में कहा नहीं जा सकता। कविता उस अनुभव को भाषा देने का प्रयास है, जिसे साधारण भाषा पूरी तरह कह नहीं पाती। या कविता वह कहने की कोशिश है जिसे केवल शब्दों में कह देना संभव नहीं। यह भी सच है कि कविता भाषा से ही बनती है। किंतु कवि भाषा की व्यक्त करने की सीमा को पार करता है। उसका अतिक्रमण करता है। वह शब्दों को नए अर्थ प्रदान करता है।
एक शब्द है ‘साफ’। इसके प्रयोग देखें- साफ-साफ कहो, अपने कमरे को साफ रखो, मेरा हिसाब साफ कर लो। सभी जगह ‘साफ’ अलग-अलग अर्थ दे रहा है।
एक और उदाहरण देखें। शब्द है ‘खराब’। इसके प्रयोग देखें- बुखार से मुंह का स्वाद खराब हो गया। समय खराब चल रहा है। कीचड़ से मेरे कपड़े खराब हो गए। यहां खराब सभी जगह अलग-अलग अर्थ दे रहा है। इसलिए कहते हैं कि कवि के लिए शब्द शब्दकोश से नहीं आते। वे उसके अनुभव से आते हैं। इस तरह के कई शब्द, कई भाषाई मुहावरे आपको मिल जाएंगे।
शब्द एक दिन में नहीं बनते। वे समाज के लंबे अनुभव, उच्चारण, जरूरत और प्रयोग से धीरे-धीरे प्रचलित होते हैं, आकार लेते हैं। फिर वे शब्दकोश में आते हैं।
भाषा में समय के साथ-साथ शब्द जुड़ते रहते हैं। घिसते रहते हैं। मिटते रहते हैं। वे जनता के बीच पैदा होते हैं। पलते हैं, जीते हैं और फिर शब्दकोश में स्वीकृत कर लिए जाते हैं। शब्द पहले आमजन में स्वीकृत होता है, फिर शब्दकोश में आता है।
आज हम जिसे हिंदी कहते हैं, उसमें कई भाषाओं, कई बोलियों के शब्द मिल जाएंगे। अन्य भाषाओं के शब्द को आत्मसात करना, उन्हें अपने व्याकरण के नियमों के आधार पर बरतना भाषा को समृद्ध बनाता है। किसी भाषा की यह स्वीकृति ही उसे जीवित रखती है, प्रवाहमान रखती है। अन्य भाषाओं के शब्दों को अपनी भाषा में परिचित करवाने का काम रचनाकर करता है। इसमें फिल्म और मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
अन्य भाषा से आया हुआ शब्द किसी भाषा में कभी-कभी इतना घुल मिल जाता है कि मालूम ही नहीं पड़ता कि वह आयातित है। आप अपने आसपास अगर दृष्टि डालें तो ऐसे कई शब्द मिल जाएंगे।
भाषा के इस समन्वय में कभी-कभी दो अलग-अलग भाषाओं के शब्द मिलकर एक शब्द का निर्माण कर लेते हैं और वह शब्द कालांतर में स्वीकृत हो जाता है। जैसे- रेलगाड़ी, यहां ‘रेल’ अंग्रेजी का और ‘गाड़ी’ हिंदी का शब्द है। जैसे- लाठीचार्ज, यहां ‘लाठी’ हिंदी का और ‘चार्ज’ अंग्रेजी का शब्द है।
इसी तरह से फारसी और हिंदी के कई युग्म शब्द मिल जाएंगे। जैसे- शादी-ब्याह, खोज-खबर, रंग-रूप, रंग-ढंग, धन-दौलत, हंसी-मजाक, चोली-दामन, खुले-आम इत्यादि। यहां एक शब्द फारसी का है और दूसरा हिंदी का। ये आम-फहम मुहावरे हैं, जिन्हें पृथक करना मुश्किल है। इन्हें अलग करना भाषा के साथ न्याय नहीं है।
कई मुहावरे हमारी भाषा में ऐसे हैं जिनमें अरबी-फारसी के शब्द हैं। अगर हम उन शब्दों को निकाल लें तो हमारी भाषा बिगड़ जाएगी। जैसे- राह फारसी का शब्द है। इसे अगर हम अपनी भाषा से निकाल लें तो हम यह नहीं बोल सकते- राह पर लगना, राह पर लाना, अपनी राह लो, राह कठिन है, राह में कांटे बिछाना, राह देखना, राह भूलना।
कुछ शब्द फंक्शनिंग होते हैं जैसे- ब्रेक। ब्रेक का अर्थ है तोड़ना, गाड़ी की स्पीड को तोड़ना। लेकिन जिससे ब्रेक लगता (स्पीड टूटती) है, उस उपकरण को भी हम ब्रेक ही कहते हैं। उसके लिए कोई दूसरा नाम ढूंढना भाषा को और मुश्किल बनाएगा। पंखा भी इसी तरह का शब्द है। जब वह हवा डाल रहा है तब वह पंखा है। रुका हुआ पंखा नहीं है। हम किसी किताब से भी पंखे का काम ले सकते हैं।
शब्द केवल अर्थ बताने का साधन नहीं है, बल्कि वह भाव, ध्वनि, चित्र और संवेदना भी पैदा करता है। कवि केवल शब्दों को जोड़ता नहीं, वह उनके बीच समन्वय, लय, ध्वनि, अर्थ और बिंब का ऐसा संबंध बनाता है कि सामान्य भाषा काव्य-भाषा में बदल जाती है।
इसीलिए काफ्का कहते हैं कि कवि जब कहता है- अमरूद, तो सुनने वाले के मुंह में अमरूद का स्वाद आ जाता है।






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