जीत बड़ी, जमीन उतनी मजबूत नहीं
राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में भाजपा ने दस में से नौ नगर निगमों में मेयर पद जीते। वार्डों में वह सबसे आगे रही, लेकिन कुल वोट में कांग्रेस से उसका अंतर सिर्फ 0.94 प्रतिशत ही रहा। कई शहरों में...

अपनी बात
कुछ दिन पहले शहर की एक गली से गुजरते हुए एक बुजुर्ग मिले। टूटी सड़क की तरफ इशारा करते हुए बोले, “साहब, चुनाव तो हर बार होते हैं, बदलता कुछ नहीं।” उनकी बात में शिकायत कम, थकान ज्यादा थी। राजस्थान के निकाय चुनावों के नतीजे देखने के बाद वही बात बार बार याद आती रही।
नतीजे आते हैं तो पहला सवाल होता है कि कौन जीता और किसका बोर्ड बना? लेकिन नगर निकाय चुनाव की असली कहानी वार्डों के आंकड़ों, स्थानीय चेहरों और चुनाव के बाद बने समीकरणों में छिपी होती है।
राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में 10,245 वार्ड हैं। अंतिम उपलब्ध परिणामों में भाजपा ने 4,182, कांग्रेस ने 3,619 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते। यानी वार्डों में भाजपा की हिस्सेदारी करीब 40.8 और कांग्रेस की करीब 35.3 प्रतिशत रही, साढ़े पांच प्रतिशत अंक की बढ़त। लेकिन वोटों में भाजपा को 35.18 और कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत मिले, यानी अंतर एक प्रतिशत अंक से भी कम। मतदाताओं का फैसला उतना एकतरफा नहीं था, जितना बोर्डों और मेयर पदों की संख्या से लगता है।
यही इस चुनाव का सबसे दिलचस्प विरोधाभास है। भाजपा ने वार्डों की बढ़त को बोर्डों और मेयर पदों में बदल दिया। 25 सितंबर को जयपुर, जोधपुर और कोटा के मेयर चुनाव भी उसने जीते और दस में से नौ नगर निगमों में उसके मेयर हो गए। एकमात्र अपवाद बीकानेर रहा, जहां कांग्रेस का मेयर बना। फिर भी इसे हर जगह एकतरफा जनादेश नहीं कहा जा सकता।
जोधपुर में भाजपा को 45 और कांग्रेस को 44 वार्ड मिले, यानी मुकाबला लगभग बराबरी का था, फिर भी निर्दलीयों और अन्य समर्थन से भाजपा के प्रसन्नचंद मेहता मेयर बने। अजमेर में कांग्रेस के 37 और भाजपा के 32 पार्षद थे, फिर भी मेयर भाजपा का बना। पाली में भी कांग्रेस के पास ज्यादा पार्षद थे, पर चुनाव बाद के समीकरणों ने भाजपा को मेयर पद तक पहुंचा दिया। भरतपुर में निर्दलीय सबसे बड़ा समूह थे, वहां भी भाजपा की अनुराधा सिंह निर्विरोध मेयर बनीं।
इन्हें केवल “जोड़ तोड़” कहना तस्वीर को छोटा करना होगा। पार्षदों के बीच बनने वाले समीकरण भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। हां, ऐसे मामलों में बोर्ड का गठन सीधे वार्ड स्तर के बहुमत का प्रतिबिंब नहीं होता।
बीकानेर इसका उलटा उदाहरण है। वहां कांग्रेस के पास 80 में से 42 पार्षद थे। मेयर चुनाव में अनिल कल्ला को 50 और भाजपा को 30 वोट मिले। जहां वार्डों का गणित साफ था, वहां बोर्ड का नेतृत्व भी उसी दिशा में गया।
निर्दलीयों की भूमिका भी बड़ी कहानी है। 2,273 वार्डों में वे जीते और उनका वोट शेयर करीब 27 प्रतिशत रहा। इनमें स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरे भी हैं और टिकट न मिलने पर अलग राह चुनने वाले नेता भी, पर यह संख्या बताती है कि शहरी राजनीति में पार्टी चिन्ह के अलावा उम्मीदवार की अपनी पहचान मायने रखती है। बारां में आम आदमी पार्टी का बोर्ड बनना भी बताता है कि मुकाबला हमेशा भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं रहता।
भाजपा की सफलता को कम करके देखने का कोई कारण नहीं। उसने वार्डों में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं, अधिकांश निकायों में बोर्ड बनाए और नौ निगमों में मेयर पद हासिल किया। पर एक प्रतिशत अंक से कम के वोट अंतर को देखते हुए इसे राज्यभर में उसी अनुपात के जनसमर्थन का प्रमाण मानना सही नहीं होगा।
कांग्रेस के लिए भी सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि वह हार गई। उसने बीकानेर जीता, अजमेर और पाली में उसके पार्षद ज्यादा रहे और वोट शेयर में वह भाजपा से बहुत पीछे नहीं थी। समस्या यह है कि वह वार्ड स्तर के समर्थन को कई जगह सत्ता में नहीं बदल सकी। यह संगठन, स्थानीय नेतृत्व और चुनाव बाद के प्रबंधन, तीनों पर सवाल उठाता है।
अब असली परीक्षा शुरू हुई है। मेयर बन गया, बोर्ड बन गया, शपथ भी हो गई, पर शहर के लिए चुनाव यहीं खत्म नहीं होता। भाजपा के सामने चुनौती है कि बढ़त को बेहतर प्रशासन में बदले। कांग्रेस के सामने चुनौती है कि बची जमीन को संगठित और भरोसेमंद राजनीति में बदले। निर्दलीयों की जवाबदेही भी उतनी ही है, क्योंकि पार्टी का झंडा न होने से जनता के सवाल खत्म नहीं होते।
नगर निकाय की खूबी यही है कि जनता अपने नुमाइंदे को रोज देखती है। सुबह नल खोलते वक्त, जलभराव से गुजरते वक्त, कूड़े के ढेर के पास से निकलते वक्त और रात को अंधेरी गली में लौटते वक्त। यही रोजमर्रा का अनुभव बोर्ड का असली रिपोर्ट कार्ड है।
जनता को यह याद नहीं रहेगा कि किस मेयर को कितने वोट मिले। उसे याद रहेगा कि सड़क बनी या नहीं, पानी समय पर आया या नहीं, कचरा उठा या नहीं और गली की बत्ती जली या नहीं।
चुनावी शोर थम चुका है, विजय जुलूस भी निकल चुके हैं। अब शहरों की बारी है यह पूछने की कि बदला क्या?






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