बेअसर होते परम्परागत गढ़
भरतपुर संभाग का यह जनादेश सत्ता के अहंकार पर जनता का 'लोकल हंटर' है। मतदाताओं ने साफ़ कर दिया है कि राज्य के वीआईपी दौरों से नहीं, बल्कि वार्ड की नालियों और टूटी सड़कों को दुरुस्त करने से ही दिल जीते...

निकाय चुनाव – भरतपुर संभाग
राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के नतीजे सूबे की भावी राजनीति का वो ‘एक्सरे’ हैं जिसने कई दिग्गजों के सियासी स्वास्थ्य की पोल खोल दी है। विशेषकर पूर्वी सिंहद्वार कहे जाने वाले भरतपुर संभाग (भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर) के जनादेश ने जयपुर के सत्ता गलियारों में वैसी ही हलचल मचा दी है, जैसी चंबल में कभी बागियों की आहट से मचती थी। मुख्यमंत्री के गृह संभाग से आई यह राजनीतिक बयार साफ संदेश दे रही है कि जनादेश न तो किसी दल की जागीर है और न ही सत्ता का रसूख हमेशा जीत की गारंटी होता है। बारीकी से देखें तो यह चुनाव ‘सत्ता की निरंतरता’ का नहीं, बल्कि ‘जमीनी कार्यकर्ता की उपेक्षा पर जनता के खुद्दार विद्रोह’ का जीवंत दस्तावेज प्रतीत होता है।
Table Of Content
- निकाय चुनाव – भरतपुर संभाग
- पांच जिलों की पांच कहानियां और इनसाइडर गेम
- भरतपुर: ‘सिंबल’ हारा, पर ‘चाणक्य नीति’ जीती
- करौली: निर्दलीयों के भरोसे बैसाखी वाला ताज
- सवाई माधोपुर: ‘कमल’ तो खिला, पर कांटों की चुभन बाकी
- धौलपुर: राजाखेड़ा से बाड़ी तक निर्दलीय ही हावी
- डीग: नवगठित ज़िले में बागियों का खुला राज
- सामाजिक अंतर्धाराएं: बेअसर हुए जातीय ठेकेदार
- बसपा का सूपड़ा साफ
- बुनियादी मुद्दों की गूंज: ‘नारे’ हारे, ‘नाले’ जीते
- रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के साए में लोकतंत्र
- सांख्यिकीय आंकड़े: भरतपुर संभाग नगरीय निकाय चुनाव परिणाम
- धौलपुर (धौलपुर नगर परिषद)
- पर्दे के पीछे का खेल
- भरतपुर में ‘सत्ता के चाणक्य’ का जाल और सत्ता की जंग
- धौलपुर में कांग्रेस की ‘गंभीर’ कूटनीति और भाजपा का आत्मसमर्पण
पांच जिलों की पांच कहानियां और इनसाइडर गेम
भरतपुर: ‘सिंबल’ हारा, पर ‘चाणक्य नीति’ जीती
मुख्यमंत्री का गृह जिला होने के कारण निकाय चुनावों में भरतपुर सबसे बड़ा हॉटस्पॉट था, लेकिन वहां मतदाताओं ने दोनों प्रमुख दलों को ऐसा पटका कि उनके सिंबल हांफने लगे। भरतपुर नगर निगम के कुल 65 वार्डों में 36 सीटों पर निर्दलीयों का कब्ज़ा राजनीतिक गाल पर करारा तमाचा था। इन चुनावों में भाजपा 20 और कांग्रेस महज 7 सीटों पर रेंगती नजर आई।
चुनावी नतीजों में भले ही भाजपा पिछड़ गई थी, लेकिन ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की कला में माहिर पार्टी ने सत्ता के हंटर से खेल पलट दिया। गृह राज्य मंत्री की घेराबंदी के आगे निर्दलीयों का गुट बिखर गया। सबसे मजबूत निर्दलीय दावेदार विचित्रा सिंह के कदम पीछे खींचते ही भाजपा की अनुराधा सिंह भरतपुर की निर्विरोध महापौर बन गईं और उन्होंने तुरंत शपथ भी ले ली। यहां जनता ने भले ही निर्दलीयों पर भरोसा जताया, लेकिन कुर्सी पर भाजपा का काबिज होना इस चुनाव की सबसे बड़ी विडंबना ही साबित हुई है।
करौली: निर्दलीयों के भरोसे बैसाखी वाला ताज
करौली नगर परिषद के 55 वार्डों ने यहां की राजनीति के अंतर्विरोधों को पूरी तरह नंगा कर दिया। कांग्रेस यहां 28 सीटें जीतकर बहुमत की दहलीज़ पर तो खड़ी थी, लेकिन 15 निर्दलीयों और भाजपा की 11 सीटों ने खेल पेचीदा कर दिया था।
भारी गुणा-भाग के बाद कांग्रेस ने निर्दलीयों को साधकर करौली में सुनील सैनी को अपना सभापति तो बना लिया, लेकिन इस ‘सफलता’ के पीछे गहरी सांगठनिक कमजोरी छिपी है। अगर टिकट वितरण में स्थानीय कार्यकर्ताओं की जेब देखने की बजाय उनकी वफादारी देखी जाती, तो कांग्रेस को बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ती। करौली के क्षत्रप अब महलों से बाहर नहीं निकले, तो अगली बार कांग्रेस को यह बैसाखी भी नसीब नहीं होगी। इस बार चुनाव में बड़े-बड़े जातीय ठेकेदारों के सारे समीकरण ध्वस्त हो गए हैं। ज़मीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने भाजपा को अपनों की ‘बाड़ेबंदी’ करने पर मजबूर कर दिया और कांग्रेस को निर्दलीयों की बैसाखी थमा दी।
सवाई माधोपुर: ‘कमल’ तो खिला, पर कांटों की चुभन बाकी
बाघों की इस भूमि ने सत्ताधारी दल भाजपा को थोड़ी राहत जरूर दी थी लेकिन यह जीत भी उतनी मखमली नहीं रही जितनी जयपुर में बैठे दिग्गज़ रणनीतिकार मान रहे थे।
सवाई माधोपुर नगर परिषद के 60 वार्डों में से भाजपा ने 33 सीटें हासिल कर जादुई आंकड़ा (31) पार किया। कांग्रेस 18 और निर्दलीय 9 सीटों पर सिमट गए। स्पष्ट बहुमत के दम पर सवाई माधोपुर नगर परिषद की कुर्सी पर भाजपा की मेवा चौधरी सभापति बैठ तो गई हैं, लेकिन रणथंभौर के इस दुर्ग में अंदरूनी खींचतान इस कदर हावी थी कि वोटिंग के आखिरी मिनट तक भाजपा नेताओं के हलक में जान अटकी रही। अपनों के ही भीतरघात का डर इस कदर था कि पूर्ण बहुमत होने के बावजूद पार्षदों को बाड़ेबंदी में रखना पड़ा।
धौलपुर: राजाखेड़ा से बाड़ी तक निर्दलीय ही हावी
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमाओं से सटे इस ज़िले ने दोनों बड़ी पार्टियों के पसीने छुड़ा दिए। मज़े की बात ये रही कि यहां दलों के झंडे नहीं, स्थानीय क्षत्रपों के डंडे चले।
धौलपुर नगर परिषद के 60 वार्डों में कांग्रेस 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि निर्दलीयों ने 19 सीटें जीतकर भाजपा (11 सीटें) को तीसरे नंबर पर धकेल दिया था।
धौलपुर में स्थानीय नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई इतनी नग्न थी कि पार्टियों के सिंबल बेअसर हो गए। अंततः कांग्रेस समर्थित खेमे ने निर्दलीय प्रत्याशी गिरीश गर्ग की मनुहार करके उन्हें धौलपुर में सर्वसम्मति से निर्विरोध सभापति चुनवा लिया। 19 निर्दलीयों की यह धमक बताती है कि चंबल की राजनीति अब जयपुर के रिमोट कंट्रोल से नहीं, बल्कि स्थानीय रसूखदारों के इशारों पर नाचेगी।
डीग: नवगठित ज़िले में बागियों का खुला राज
भरतपुर से अलग होकर बने डीग जिले की नगरपालिकाओं में भी 60 फीसदी से अधिक सीटों पर बागियों और निर्दलीयों का कब्जा था। नतीजों में यहां की अधिकांश नगरपालिकाओं में निर्दलीयों ने या तो स्वयं की सरकार बनाई है या फिर सत्ताधारी भाजपा को समर्थन देकर अपनी शर्तों पर बोर्ड गठित करवाया है। इसने साफ कर दिया कि नए जिले का गठन करने का झुनझुना थमाने मात्र से वोट बैंक सुरक्षित नहीं होता, जनता को धरातल पर काम चाहिए।
सामाजिक अंतर्धाराएं: बेअसर हुए जातीय ठेकेदार
पूर्वी राजस्थान की राजनीति को जो लोग सिर्फ जाट, गुर्जर, मीणा और दलित के चश्मे से देखते हैं, उन्हें इस चुनाव ने नया सबक सिखाया है। बड़े चुनावों में भले ही ये जातीय ध्रुवीकरण काम कर जाता हो, लेकिन इस वार्ड स्तर के चुनावों में ‘माइक्रो-कास्ट इंजीनियरिंग’ हावी रहती है। जब दोनों दलों ने एक ही जाति के मोहरे मैदान में उतारे, तो मतदाताओं ने जाति के नाम पर वोट देने के बजाय उस उम्मीदवार को चुना जो उनके मोहल्ले की समस्या सुलझाने में सक्षम था।
बसपा का सूपड़ा साफ:
सोशल इंजीनियरिंग का दावा करने वाली बसपा करौली और धौलपुर जैसे अपने ही गढ़ों में पूरी तरह हांफ गई। दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक ने समझ लिया कि अपने बीच के जिताऊ निर्दलीय को ताकत दी जाए ताकि सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित हो सके और हुआ भी यही।
बुनियादी मुद्दों की गूंज: ‘नारे’ हारे, ‘नाले’ जीते
यह चुनाव राष्ट्रवाद या राज्य सरकार की उपलब्धियों पर नहीं लड़ा गया। यह चुनाव लड़ा गया भरतपुर की बदहाल सीवरेज व्यवस्था, धौलपुर की टूटी सड़कें, करौली का पेयजल संकट और सवाई माधोपुर की बदहाल सफाई व्यवस्था पर। जनता मंत्रियों के भाषणों से अघा चुकी थी। उसने साफ कह दिया “हमें बड़ी योजनाएं बाद में देना, पहले हमारे घरों के आगे भरा गंदा पानी साफ करवाओ, सीवरेज के खुले मेनहोल में फेरो कवर लगाओ, सड़कों के गड्ढे भरो आदि।”
रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के साए में लोकतंत्र
भरतपुर संभाग की शहरों की सरकार की अंतिम तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो गई है। भले ही भरतपुर नगर निगम और सवाई माधोपुर में भाजपा ने और धौलपुर-करौली में कांग्रेस ने अपने बोर्ड बना लिए हैं, लेकिन लोकतंत्र के माथे पर ‘बाड़ेबंदी’ और अन्य विकल्प की कालिख साफ दिखाई दे रही है। होटलों और रिसॉर्ट्स से सीधे पोलिंग बूथ तक लाए गए पार्षदों ने यह साबित कर दिया है कि भले ही ताज पार्टियों के सिर सजा हो, लेकिन इस जंग का असली ‘सिकंदर’ आम मतदाता और बागी कार्यकर्ता ही हैं। जयपुर में बैठी सरकार को अब कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि पूर्वी सिंहद्वार की जनता बदलाव के मूड में है।
सांख्यिकीय आंकड़े: भरतपुर संभाग नगरीय निकाय चुनाव परिणाम
भरतपुर (भरतपुर नगर निगम)
कुल वार्ड: 65
भाजपा: 20
कांग्रेस: 07
निर्दलीय व अन्य: 38 (36 निर्दलीय)
नव-निर्वाचित मेयर: अनुराधा सिंह (भाजपा – निर्विरोध)
—-
करौली (करौली नगर परिषद)
कुल वार्ड: 55
भाजपा: 11
कांग्रेस: 28
निर्दलीय व अन्य: 16 (15 निर्दलीय)
नव-निर्वाचित सभापति: सुनील सैनी (कांग्रेस – निर्दलीयों के सहयोग से)
—-
सवाई माधोपुर (सवाई माधोपुर नगर परिषद)
कुल वार्ड: 60
भाजपा: 33
कांग्रेस: 18
निर्दलीय व अन्य: 09
नव-निर्वाचित सभापति: मेवा चौधरी (भाजपा – पूर्ण बहुमत)
—-
धौलपुर (धौलपुर नगर परिषद)
कुल वार्ड: 60
भाजपा: 11
कांग्रेस: 27
निर्दलीय व अन्य: 22 (19 निर्दलीय)
नव-निर्वाचित सभापति: गिरीश गर्ग (निर्दलीय – निर्विरोध)
डीग (कामां, कुम्हेर, नगर आदि नगरपालिकाएं)
स्थिति: भाजपा कमजोर, कांग्रेस पिछड़ी, 60% से अधिक सीटों पर स्थानीय बागी व निर्दलीय अध्यक्ष निर्वाचित।
पर्दे के पीछे का खेल:
भरतपुर में ‘सत्ता के चाणक्य’ का जाल और सत्ता की जंग
भरतपुर नगर निगम का मेयर चुनाव किसी थ्रिलर फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा रहा है। 36 निर्दलीयों के प्रचंड बहुमत के बाद कांग्रेस समर्थित खेमे ने पूर्व मेयर की पत्नी विचित्रा सिंह को आगे कर बाजी मारने की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन तभी जयपुर से रिमोट कंट्रोल सक्रिय हुआ। स्थानीय मंत्रियों ने कमान संभाली और पार्टी के पुराने सिपहसालार की पत्नी अनुराधा सिंह के लिए बिसात बिछाई गई। सत्ता के दबाव और रणनीतिक चक्रव्यूह में विचित्रा सिंह को नाम वापसी के आखिरी लम्हों में मैदान छोड़ना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि मात्र 20 पार्षदों वाली भाजपा ने 36 निर्दलीयों की आंखों में धूल झोंककर अनुराधा सिंह को निर्विरोध मेयर बनवा दिया। देखा जाए तो यह पूरी तरह जनता के मैंडेट को सत्ता के प्रभाव से प्रभावित करने का क्लासिक उदाहरण है।
धौलपुर में कांग्रेस की ‘गंभीर’ कूटनीति और भाजपा का आत्मसमर्पण
धौलपुर नगर परिषद का क्लाइमेक्स संभाग में सबसे अनूठा रहा। यहां कांग्रेस 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी तो थी, लेकिन बहुमत से दूर थी। भाजपा महज 11 सीटों पर टिकी थी। यहां असली चाणक्य नीति निर्दलीय प्रत्याशी गिरीश गर्ग ने चली। उन्होंने पर्दे के पीछे रहकर कांग्रेस के स्थानीय दिग्गजों और असंतुष्ट खेमों के साथ ऐसी ‘गंभीर कूटनीति’ की कि कांग्रेस ने अपनी जगह एक निर्दलीय चेहरे को ताज सौंपना स्वीकार कर लिया। चौंकाने वाली बात यह रही कि 11 सीटों वाली भाजपा और 19 निर्दलीयों के दूसरे गुट ने इस चक्रव्यूह के आगे पूरी तरह सरेंडर कर दिया, जिसके चलते गिरीश गर्ग बिना किसी मतदान के सर्वसम्मति से निर्विरोध सभापति चुन लिए गए। चंबल के बीहड़ों के इस शांत राजनीतिक तख्तापलट ने साबित कर दिया कि जब सिंबल बेअसर होते हैं, तो स्थानीय रसूख ही ‘माई-बाप’ बनता है।






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