राजस्थान में गूंजती बंगाल की धुन
राजस्थान में बसे बंगाली परिवारों के लिए दुर्गा पूजा आस्था के साथ अपनी भाषा, परंपरा और जड़ों से जुड़ने का अवसर है। पंडाल, ढाक, धुनुची और सांस्कृतिक आयोजन नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ते...

दुर्गा पूजा
डॉ. मधु बैनर्जी
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
सितंबर-अक्टूबर की हवा में जब हल्की ठंडक घुलने लगती है, तब राजस्थान के कई शहरों में एक अलग ही रंग दिखाई देने लगता है। कहीं पंडाल सजने लगते हैं, कहीं मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप दिया जाता है, तो कहीं बंगाली परिवार खरीदारी और तैयारियों में जुट जाते हैं। कुछ दिनों के लिए राजस्थान की धरती पर बंगाल की संस्कृति जैसे उतर आती है। ढाक की आवाज, धुनुची की धुन, शंखनाद, लाल-पाड़ साड़ी और मां दुर्गा के जयकारे माहौल को पूरी तरह बदल देते हैं।
यह सिर्फ पूजा नहीं है। दुर्गा पूजा बंगाली समाज के लिए अपने घर, अपनी भाषा, अपनी स्मृतियों और अपनी जड़ों तक लौटने का बहाना है। राजस्थान में रहने वाला बंगाली समाज भले ही वर्षों पहले रोजगार, नौकरी, शिक्षा या व्यवसाय के सिलसिले में यहां आया हो, लेकिन दुर्गा पूजा आते ही उसके भीतर का बंगाल जाग उठता है। जो लोग साल भर हिंदी, अंग्रेजी या राजस्थानी में बातचीत करते हैं, वे इन दिनों बंगाली में ज्यादा सहज नजर आते हैं। बच्चे, जो शायद बंगाल की गलियों को सिर्फ तस्वीरों में जानते हैं, पंडाल और पूजा के जरिए अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होते हैं।
घर से दूर, लेकिन बंगाल से दूर नहीं
राजस्थान और बंगाल की भौगोलिक दूरी भले ही हजारों किलोमीटर हो, लेकिन दुर्गा पूजा इस दूरी को कुछ दिनों के लिए मिटा देती है। बंगाली परिवारों के लिए ये पांच दिन केवल धार्मिक अनुष्ठानों के नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप के भी होते हैं। पूजा पंडाल में पहुंचते ही पुराने परिचित मिल जाते हैं। किसी का परिवार कोलकाता में है तो कोई वर्षों से राजस्थान में रह रहा है। कोई पहली बार पूजा में आया है तो कोई बचपन से इसी परंपरा का हिस्सा है।
बातचीत में पुरानी यादें लौटती हैं। कोलकाता की पूजा, कॉलेज स्ट्रीट की भीड़, पंडालों की रोशनी, अल्बर्ट हॉल की सजावट और शांति, हावड़ा ब्रिज का नजारा, कालीघाट पर गूंजती शंख की ध्वनि, बेलूर मठ की संध्या आरती और घर की बनी मिठाइयां। पूजा के बाद दोस्तों के साथ घूमने की यादें भी ताजा हो जाती हैं। यही वजह है कि राजस्थान में होने वाली दुर्गा पूजा बंगाली समाज के लिए धार्मिक आयोजन से ज्यादा सामुदायिक पहचान का उत्सव बन जाती है।
प्रतिमा में सिर्फ मां नहीं, कलाकार की पहचान भी
दुर्गा पूजा की तैयारी प्रतिमा के पंडाल में पहुंचने से काफी पहले शुरू हो जाती है। प्रतिमा निर्माण की परंपरा बंगाली संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मिट्टी से देवी की प्रतिमा तैयार करने से लेकर रंग-रोगन और आभूषणों तक, हर चरण में कलाकार की मेहनत दिखाई देती है।
राजस्थान में रहने वाले बंगाली समाज के सामने चुनौती यह भी है कि यहां पूजा की तैयारियां स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार करनी पड़ती हैं। कई बार प्रतिमा और पूजा सामग्री दूसरे शहरों या राज्यों से मंगाई जाती है। इसके बावजूद कोशिश रहती है कि पूजा की मूल परंपराओं और स्वरूप में ज्यादा बदलाव न हो।
दुर्गा पूजा के सबसे आकर्षक दृश्यों में धुनुची नृत्य और सिंदूर खेला शामिल हैं। धुनुची में धूप से भरे पात्र के साथ श्रद्धालु ताल पर नृत्य करते हैं। ढाक की थाप और धुनुची के धुएं से वातावरण में अलग ही ऊर्जा भर जाती है। वहीं विजयादशमी पर होने वाला सिंदूर खेला बंगाली समाज की विशेष परंपरा है। महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह दृश्य केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि महिलाओं के आपसी स्नेह और सामुदायिक जुड़ाव का प्रतीक भी बन जाता है।
लाल किनारी वाली सफेद साड़ियों में महिलाएं और पारंपरिक परिधान में पुरुष इस उत्सव को एक विशिष्ट बंगाली पहचान देते हैं।
नई पीढ़ी के लिए संस्कृति की पाठशाला
राजस्थान में जन्मी बंगाली समाज की नई पीढ़ी के लिए दुर्गा पूजा का अर्थ थोड़ा अलग है। कई बच्चे और युवा बंगाल में लंबे समय तक नहीं रहे। उनके लिए कोलकाता, दुर्गा पूजा और बंगाली संस्कृति की कहानियां परिवार से मिली स्मृतियां हैं।
ऐसे में पूजा पंडाल उनके लिए सांस्कृतिक पाठशाला बन जाता है। यहां वे बंगाली गीत सुनते हैं, नृत्य करते हैं, पारंपरिक भोजन चखते हैं और परिवार के बुजुर्गों से अपनी संस्कृति के बारे में सुनते हैं। कई पूजा समितियां बच्चों के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम, चित्रकला, नृत्य, संगीत और बंगाली भाषा से जुड़े आयोजन भी करती हैं। इससे त्योहार केवल अगली पीढ़ी तक पहुंचता ही नहीं, बल्कि उसके अर्थ भी समझाए जाते हैं।
राजस्थान की मिट्टी में बंगाल का उत्सव
राजस्थान में दुर्गा पूजा का एक खूबसूरत पक्ष यह भी है कि यहां बंगाली परंपरा स्थानीय समाज से जुड़ती जा रही है। पूजा में केवल बंगाली परिवार ही नहीं, बल्कि दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं। राजस्थान की मेहमाननवाजी और बंगाल की सांस्कृतिक आत्मीयता मिलकर एक नया सामाजिक रंग बनाती है।
पंडालों में बंगाली व्यंजनों की खुशबू के साथ राजस्थान के स्वाद भी दिखाई देने लगे हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बंगाली गीतों के साथ हिंदी और स्थानीय भाषाओं के गीत भी जगह बना रहे हैं। यानी उत्सव अपनी मूल पहचान को बचाए रखते हुए उस शहर की संस्कृति का भी हिस्सा बन रहा है, जहां वह आयोजित हो रहा है।
पूजा खत्म होती है, अपनापन नहीं
दशमी के दिन जब मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के लिए निकलती है, तो पंडाल में उत्सव का शोर धीरे-धीरे विदाई की भावुकता में बदल जाता है। आंखों में नमी होती है और जुबान पर वही भाव, ‘आबार एशो मा’, यानी मां फिर आना।
प्रतिमा चली जाती है, पंडाल कुछ दिनों बाद हट जाता है और जिंदगी फिर रोजमर्रा की रफ्तार पकड़ लेती है, लेकिन बंगाली समाज के लिए दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि वह साल में एक बार सबको फिर जोड़ देती है।
राजस्थान में बसे बंगाली परिवारों के लिए मां दुर्गा की पूजा इसलिए केवल आस्था का पर्व नहीं है। यह अपनी जड़ों को याद करने, नई पीढ़ी को अपनी पहचान सौंपने और घर से दूर रहते हुए भी घर जैसा महसूस करने का उत्सव है।
रेगिस्तान की धरती पर जब ढाक बजता है, तो उसमें सिर्फ मां दुर्गा के स्वागत की आवाज नहीं होती। उसमें बंगाल से हजारों किलोमीटर दूर बसे उन परिवारों की आवाज भी होती है, जो कहते हैं, जगह बदली है, लेकिन जड़ें नहीं।






No Comment! Be the first one.