14 दिन तक फाइलों में दबा रहा ‘सीड सिंडिकेट’ का मामला, अब मंडोर थाने में मुकदमा
किरोड़ी की छापेमारी में 60 करोड़ के संदिग्ध मूंगफली बीज भंडार का खुलासा, सवाल—कार्रवाई में इतनी देरी क्यों? जोधपुर। कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने जिस मामले को किसानों के साथ संभावित धोखाधड़ी का...

किरोड़ी की छापेमारी में 60 करोड़ के संदिग्ध मूंगफली बीज भंडार का खुलासा, सवाल—कार्रवाई में इतनी देरी क्यों?
जोधपुर। कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने जिस मामले को किसानों के साथ संभावित धोखाधड़ी का बड़ा नेटवर्क बताते हुए खुद मौके पर पहुंचकर उजागर किया था, उसी मामले में अब छापेमारी के करीब 14 दिन बाद आखिरकार मंडोर थाने में एफआईआर दर्ज हुई है। सहायक निदेशक कृषि (विस्तार) कार्यालय जोधपुर के कृषि अधिकारी राजेंद्र गढ़वाल की रिपोर्ट पर शिखा भूतड़ा सहित अन्य के खिलाफ मूंगफली बीजों के कथित अवैध भंडारण और कृषि कानूनों के उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया है।
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मामले की सबसे बड़ी बात यह है कि जिस कार्रवाई को कृषि मंत्री ने स्वयं अंजाम दिया, जिसमें करोड़ों रुपये मूल्य के संदिग्ध बीज भंडारण की बात सामने आई, उस पर पुलिस मुकदमा दर्ज होने में दो सप्ताह का समय लग गया। यही देरी अब कई सवाल खड़े कर रही है।
क्या था पूरा मामला?
मई के अंतिम सप्ताह में कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने जोधपुर के मंडोर क्षेत्र स्थित एक कोल्ड स्टोरेज पर अचानक छापा मारा था। छापे के दौरान बड़ी मात्रा में मूंगफली बीज का भंडारण मिला, जिसकी वैधता, लाइसेंसिंग और दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल उठे। उस समय विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में लगभग 60 करोड़ रुपये मूल्य के संदिग्ध मूंगफली बीज भंडार को सीज किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
मंत्री ने मौके पर ही अधिकारियों को जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि किसानों के हितों के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
14 दिन बाद एफआईआर, आखिर क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि यदि मौके पर अवैध भंडारण और नियमों के उल्लंघन के पर्याप्त आधार थे, तो एफआईआर दर्ज कराने में 14 दिन क्यों लग गए?
जांच एजेंसियों के लिए यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि—
- क्या इस अवधि में संबंधित पक्षों को दस्तावेज व्यवस्थित करने का अवसर मिला?
- क्या विभागीय स्तर पर कानूनी राय या दबाव की स्थिति थी?
- क्या प्रारंभिक जांच रिपोर्ट तैयार होने में असामान्य विलंब हुआ?
- या फिर मामला राजनीतिक और कारोबारी प्रभावों के बीच उलझा रहा?
इन सवालों के जवाब अब पुलिस जांच और कृषि विभाग की आंतरिक कार्रवाई से ही सामने आएंगे।
किसानों से जुड़ा बड़ा मुद्दा
मूंगफली बीज का मामला केवल भंडारण तक सीमित नहीं है। यदि बीज की गुणवत्ता, प्रमाणन या स्रोत पर सवाल साबित होते हैं, तो इसका सीधा असर किसानों की फसल, उत्पादन और आय पर पड़ सकता है। कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा पिछले कई महीनों से बीज और कृषि इनपुट कारोबार में कथित अनियमितताओं के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। श्रीगंगानगर, जयपुर और अन्य जिलों में भी उन्होंने इसी प्रकार की कार्रवाई कर बीज कंपनियों और कारोबारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
अब जांच के घेरे में कौन-कौन?
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस अब यह जांच करेगी कि—
- भंडारित मूंगफली बीज का वास्तविक स्वामित्व किसके पास था।
- भंडारण के लिए आवश्यक लाइसेंस और अनुमतियां थीं या नहीं।
- बीज प्रमाणित थे अथवा नहीं।
- भंडारण और व्यापार कृषि विभाग के नियमों के अनुरूप था या नहीं।
- इस नेटवर्क में अन्य कारोबारी या संस्थाएं भी शामिल थीं या नहीं।
राजनीतिक और प्रशासनिक संदेश
यह मामला केवल अवैध भंडारण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी बनता जा रहा है। मंत्री की मौजूदगी में हुई कार्रवाई के बाद भी मुकदमा दर्ज होने में 14 दिन लगना बताता है कि कृषि माफिया, प्रशासनिक प्रक्रियाएं और कानूनी कार्रवाई के बीच अभी भी कई परतें मौजूद हैं।
यदि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध हुई तो यह मामला राजस्थान में बीज कारोबार की कार्यप्रणाली और नियामकीय निगरानी पर बड़े खुलासे कर सकता है। लेकिन यदि यह भी अन्य मामलों की तरह लंबी जांच में उलझ गया, तो किसानों के हितों की रक्षा का दावा सवालों के घेरे में आ जाएगा।






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