फुनगी को फांसी… शाखाओं को माफी
अयोध्या राममंदिर में चढ़ावे की अनियमितताओं की जांच केवल वित्तीय पहलुओं तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या जवाबदेही शीर्ष स्तर तक पहुंचेगी या कार्रवाई केवल निचले कर्मचारियों तक सिमट...

अयोध्या राममंदिर प्रकरण
अयोध्या का राममंदिर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर के निर्माण में देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं का योगदान रहा है। ऐसे में चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मामला केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि जनविश्वास और धार्मिक व्यवस्था की पारदर्शिता का प्रश्न बन जाता है। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल गड़बड़ी की राशि नहीं, बल्कि यह है कि क्या इसकी जांच अपने तार्किक और न्यायसंगत निष्कर्ष तक पहुंचेगी या फिर यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच दब जाएगा।
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इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट इस मामले की निगरानी कर रहा है। उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) अपनी स्टेटस रिपोर्ट अदालत को बंद लिफाफे में सौंप चुकी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद आगे की सुनवाई करने और राज्य सरकार को वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी की अगुवाई में नया एसआईटी प्रमुख नियुक्त करने का निर्देश दिया है। अदालत की यह सतर्कता जांच की निष्पक्षता को लेकर उसकी गंभीरता दर्शाती है। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।
यह विवाद उस समय सामने आया जब समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक तेजनारायण पाण्डेय उर्फ पवन पाण्डेय ने सात जून को राममंदिर में लगभग साढ़े सात करोड़ रुपये के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का आरोप लगाया। अगले ही दिन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया। इसके बाद कई संतों और हिन्दू संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। देखते ही देखते यह मामला स्थानीय विवाद से निकलकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।
शुरुआत में ट्रस्ट ने सभी व्यवस्थाओं को सामान्य बताया। हालांकि इससे पहले स्थानीय पुलिस की मौजूदगी में सात लोगों के यहां से लगभग अस्सी लाख रुपये बरामद किए जाने की जानकारी सामने आ चुकी थी। बढ़ते दबाव के बीच ट्रस्ट के आग्रह पर सरकार ने एसआईटी गठित कर दी।
यहीं से कई ऐसे प्रश्न उठने लगे जिनका स्पष्ट उत्तर अभी तक सामने नहीं आया है। सामान्यतः किसी भी आपराधिक मामले में पहले प्राथमिकी दर्ज की जाती है और उसके बाद आवश्यकता पड़ने पर विशेष जांच दल का गठन होता है। लेकिन इस मामले में पहले एसआईटी का गठन हुआ और बाद में उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर ट्रस्ट की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई। यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करती है। मसलन, जांच की दिशा क्या है और उसका उद्देश्य क्या है।
राजनीतिक बयानबाजी ने उलझाया मामला
राजनीतिक बयानबाजी ने मामले को और उलझा दिया। विपक्ष ने इसे जवाबदेही का प्रश्न बनाया, जबकि सत्तापक्ष ने इसे धार्मिक आस्था के राजनीतिकरण का आरोप बताया। संसद से सड़क तक शोर मचा, लेकिन चढ़ावे की सुरक्षा और जवाबदेही का मूल प्रश्न पीछे छूट गया।
दरअसल, यह मामला किसी राजनीतिक दल की जीत या हार का नहीं है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च किसी व्यक्ति, संगठन अथवा सरकार की निजी संपत्ति नहीं होते। इनका निर्माण समाज की आस्था, सहयोग और विश्वास से होता है। इसलिए इनके संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना उतना ही आवश्यक है, जितना उनकी धार्मिक गरिमा बनाए रखना। अयोध्या का राममंदिर तो विशेष रूप से करोड़ों रामभक्तों के योगदान से बना है। ऐसे में उसके चढ़ावे से जुड़े किसी भी विवाद पर प्रश्न उठाना आस्था का अपमान नहीं, बल्कि उसी आस्था की रक्षा का प्रयास माना जाना चाहिए।
इसी बीच छह जुलाई को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक हुई। बैठक के बाद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविन्ददेव गिरि ने कहा कि इस घटना से रामभक्तों की आस्था को ठेस पहुंची है और इसी कारण तत्कालीन महासचिव चंपत राय ने अपना पद छोड़ने की इच्छा जताई। बाद में ट्रस्ट की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उनका त्यागपत्र प्रभावी माना गया। डॉ. अनिल मिश्र ने भी पद छोड़ा और ट्रस्ट ने कृष्णमोहन को कार्यवाहक महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी। साथ ही मंदिर के प्रबंधक गोपाल राव को कार्य से विरत कर दिया गया।
इन घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि ट्रस्ट ने भी मामले को गंभीर माना। फिर भी प्रश्न यही है कि यदि व्यवस्थागत कमियां थीं, तो उनकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी। चंपत राय ने चढ़ावे की कथित गड़बड़ी के लिए अन्य अधिकारियों और बैंक व्यवस्था की ओर संकेत किया। दूसरी ओर ट्रस्ट ने भी स्वीकार किया कि गणना और निगरानी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। जांच जारी है, इसलिए किसी की जिम्मेदारी तय करना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन लगातार सामने आई खामियां पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न जरूर लगाती हैं।
बताया गया कि चढ़ावे की गणना वाले कक्ष का सीसीटीवी रिकॉर्ड केवल 45 दिन तक सुरक्षित रहता था। इसी अवधि में कई संदिग्ध घटनाओं की जानकारी सामने आई। यदि यह तथ्य सही है, तो यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक राममंदिर की सुरक्षा व्यवस्था इतनी सीमित क्यों थी। आधुनिक तकनीक के इस दौर में ऐसी व्यवस्थाएं कहीं अधिक मजबूत और दीर्घकालिक होनी चाहिए थीं।
मजबूत बनेगा प्रशासनिक ढांचा, ड्रेसकोड लागू
इसी बीच 22 जुलाई को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की एक और बैठक हुई। इसमें ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से कई निर्णय लिये गए। नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करने, नया प्रवक्ता चुनने, सीसीटीवी निगरानी बढ़ाने, बैंकिंग व्यवस्था की समीक्षा करने तथा कोषाध्यक्ष गोविन्ददेव गिरि की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय धार्मिक समिति गठित करने जैसे प्रस्ताव पारित किये गए। चढ़ावे की गणना से जुड़े कर्मचारियों को बदलने के साथ उनके लिए बिना जेब वाला विशेष ड्रेसकोड भी लागू किया गया। यह स्वागतयोग्य कदम है। देश के अनेक प्रमुख मंदिरों, जैसे तिरुपति बालाजी और शिरडी साईं मंदिर में ऐसी व्यवस्थाएं पहले से लागू हैं। प्रश्न केवल इतना है कि अयोध्या में यह व्यवस्था पहले दिन से क्यों नहीं अपनाई गई।
सुधारात्मक कदम स्वागतयोग्य हैं, लेकिन केवल प्रक्रियाएं बदलने से विश्वास पूरी तरह बहाल नहीं होगा। सबसे जरूरी है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध हो तथा जवाबदेही हर स्तर पर तय हो।
यह समस्या केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है। देश के अनेक मंदिरों, मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों में समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं और संपत्ति विवादों के आरोप सामने आते रहे हैं। इसलिए यह बहस अब सभी धार्मिक संस्थानों में पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आगे बढ़नी चाहिए।
आवश्यकता केवल दोषियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें भविष्य में इस तरह की घटनाओं की गुंजाइश कम हो। डिजिटल लेखा प्रणाली, स्वतंत्र ऑडिट और आधुनिक निगरानी व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या जांच उन सभी स्तरों तक पहुंचेगी, जहां जवाबदेही तय होनी चाहिए, या फिर कार्रवाई केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित रह जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो “फुनगी को फांसी… शाखाओं को माफी” वाली आशंका और गहरी होगी। करोड़ों रामभक्त किसी राजनीतिक निष्कर्ष की प्रतीक्षा नहीं कर रहे। उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि जांच निष्पक्ष हो, जवाबदेही हर स्तर पर तय हो और राममंदिर जैसी राष्ट्रीय आस्था से जुड़ी संस्था पर जनता का विश्वास अक्षुण्ण बना रहे। अंततः किसी भी धर्मस्थल की सबसे बड़ी पूंजी उसका चढ़ावा नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास होता है।
धर्मस्थलों के लिए नियामक आयोग पर गंभीर विचार जरूरी
अयोध्या का प्रकरण पहला नहीं है। इससे पहले तिरुपति बालाजी मंदिर, केदारनाथ, पद्मनाभस्वामी मंदिर, बदरीनाथ सहित कई प्रमुख धार्मिक संस्थानों में समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं, चढ़ावे के प्रबंधन या संपत्ति विवादों से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं। मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों में भी ऐसी शिकायतें नई नहीं हैं।
ऐसे में अब समय आ गया है कि सभी प्रमुख धार्मिक संस्थानों के लिए पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन, नियमित स्वतंत्र ऑडिट और आधुनिक निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित करने पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा हो। आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब उसके साथ जवाबदेही भी जुड़ी होगी। धार्मिक संस्थानों में आने वाला दान समाज की अमानत है। उसका प्रबंधन भी उसी स्तर की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ होना चाहिए, जिसकी अपेक्षा किसी सार्वजनिक संस्था से की जाती है। यही पारदर्शिता धार्मिक संस्थानों की विश्वसनीयता और श्रद्धालुओं के विश्वास, दोनों को मजबूत करेगी।






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