भाजपा में ये क्या हो रहा है…?
तीसरे कार्यकाल में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद हालात बदले हुए हैं। पहले भी सहयोगी दल थे, लेकिन उनका दबाव इतना नहीं था। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अपने सांसदों के साथ-साथ...

राजनीति – क्या कमजोर होने लगी है मोदी-शाह की पकड़?
देश की राजनीति को बदलकर रख देने वाली भारतीय जनता पार्टी में क्या इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है? क्या भाजपा चुनावी राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपनी मूल विचारधारा को भी पीछे छोड़ देना चाहती है? क्या भाजपा अब पहले जैसी आंतरिक लोकतंत्र वाली पार्टी नहीं रह गई है? क्या अब पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारों पर ही सब कुछ तय होता है?
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ये सवाल आम तौर पर हर मोदी-शाह विरोधी के मन में उठ सकते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय में ऐसे कई सियासी घटनाक्रम भी हुए हैं कि भाजपा के जन्म से पहले, यानी जनसंघ के दौर से पार्टी से जुड़े अनेक लोग भी शायद इन्हीं सवालों को अपने आसपास मंडराता हुआ महसूस करने लगे हैं। इनमें से कई लोग दबी जुबान में कहते हैं कि आज की भाजपा में न तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा बची है और न ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय का दर्शन। यह भाजपा अटल-आडवाणी के दौर वाली भाजपा भी नहीं रही, जहां विचारधारा से जुड़े लोगों की अलग पहचान और पूछ होती थी।
हालांकि ये बातें लोग दबी जुबान में ही कहते हैं, लेकिन पिछले 12 वर्षों में ऐसे बहुत कम मौके आए होंगे, जब किसी भाजपा नेता ने पार्टी के मौजूदा हालात पर खुलकर टिप्पणी की हो। पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ और संस्थापक नेताओं को या तो मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया गया या फिर वे सक्रिय राजनीति के हाशिए पर चले गए। मार्गदर्शक मंडल से अब शायद ही कोई मार्गदर्शन लिया जाता हो। पिछले ढाई-तीन वर्षों में विभिन्न राज्यों के प्रभावशाली नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को स्थापित करने की नीति भी इसी ओर संकेत करती है।
अब हालात शायद कुछ बदलने लगे हैं। भाजपा के भीतर भी अब ‘आए हुए’ और ‘जन्मजात भाजपाई’ के बीच फर्क की चर्चा होने लगी है। भाजपा के स्थापना दिवस पर राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के उस भाषण को याद कीजिए, जिसकी काफी चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा था कि सत्ता और संगठन में उन्हीं लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जिनकी पार्टी के प्रति पुरानी निष्ठा और संस्कार रहे हैं।
वसुंधरा ने बिना किसी का नाम लिए उन नेताओं की ओर इशारा किया, जिन्हें दूसरे दलों से तोड़कर भाजपा में लाया जा रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ जरूर की, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण देकर परोक्ष रूप से विपक्षी दलों में सेंध लगाकर ताकत बढ़ाने की मौजूदा रणनीति पर सवाल भी खड़ा किया।
सिर्फ सत्ता में बने रहना ही असली मकसद?
मोदी-शाह के आलोचक आरोप लगाते हैं कि उनका पूरा ध्यान सिर्फ चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने पर है। इसी संदर्भ में भाजपा के संस्थापक नेताओं में रहे डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कथित तौर पर करीब 70 पन्नों की एक पावरपॉइंट प्रस्तुति तैयार कर संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत को भेजी थी। इसे भी पार्टी के भीतर उठ रही वैचारिक बेचैनी के संकेत के रूप में देखा गया।
अध्यक्ष चयन से लेकर मंत्रिमंडल विस्तार तक
इसके बाद भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन को लेकर भी संघ बनाम भाजपा की खींचतान की अटकलें लगती रहीं। हालांकि जिस तरह संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने 75 वर्ष की उम्र में ‘झोला उठाने’ वाले अपने पुराने बयान को लेकर अलग रुख अपनाया, उसी तरह राष्ट्रीय अध्यक्ष के मुद्दे पर भी उन्होंने साफ कहा कि अध्यक्ष चुनना भाजपा का काम है। अगर हमें ही चुनना होता, तो हम कब का चुन चुके होते।
इसके बाद वर्ष की शुरुआत में 46 वर्षीय नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने को भाजपा की पीढ़ीगत बदलाव की रणनीति के तौर पर देखा गया। पार्टी के भीतर इसका कोई खुला विरोध भी नहीं हुआ। हालांकि सात महीने बाद भी नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया। राजनीतिक विश्लेषक नई कार्यकारिणी के गठन में हो रही देरी और लंबे समय से लंबित मंत्रिमंडल विस्तार को संगठन के भीतर संतुलन साधने की चुनौती से जोड़कर देख रहे हैं।
पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से बदले हालात?
सूत्रों का कहना है कि तीसरे कार्यकाल में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं। पहले भी सहयोगी दल सरकार का हिस्सा थे, लेकिन उनका दबाव इतना प्रभावी नहीं था। अब स्थिति बदल चुकी है। केवल अपने सांसदों को ही नहीं, बल्कि सहयोगी दलों को भी संतुष्ट रखना सरकार की मजबूरी बन गई है। यही वजह है कि मोदी-शाह अब हर कदम फूंक-फूंककर रख रहे हैं।
हालांकि पश्चिम बंगाल में चुनावी सफलता ने भाजपा का मनोबल जरूर बढ़ाया है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हुई हैं। डॉ. मुरली मनोहर जोशी के आवास पर कलराज मिश्र, भगत सिंह कोश्यारी जैसे वरिष्ठ नेताओं की बैठकों और हाशिए पर चले गए नेताओं से उनके लगातार संपर्क को राजनीतिक हलकों में सामान्य घटनाक्रम नहीं माना जा रहा। हाल ही में अयोध्या के कथित चंदा चोरी प्रकरण में बजरंग दल के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व सांसद विनय कटियार का खुलकर सामने आना भी इन्हीं घटनाओं की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
जब हमने वरिष्ठ पत्रकार के.पी. मलिक से पूछा कि क्या भाजपा के भीतर मोदी-शाह के खिलाफ कभी बगावत जैसी स्थिति बन सकती है, तो उनका जवाब था कि फिलहाल इसकी संभावना भले कम हो, लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि उनकी पकड़ पहले जैसी मजबूत बनी हुई है। उनके अनुसार, पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष की हल्की आहटें अब सुनाई देने लगी हैं। मलिक का कहना है कि यदि नेतृत्व से कोई राजनीतिक चूक होती है, तो वही आगे चलकर चुनौती का रूप ले सकती है। दूसरी ओर, विपक्ष लगातार मोदी-शाह की कथित केंद्रीकृत कार्यशैली को भी मुद्दा बना रहा है।
वरिष्ठ संपादक शेखर गुप्ता के हालिया दो लेख भी कमोबेश इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं। अपने एक लेख में उन्होंने लिखा कि लोकसभा में पूर्ण बहुमत न होने के बावजूद मोदी-शाह देश को धीरे-धीरे एकदलीय व्यवस्था की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में हुई टूट ने विपक्ष को और अधिक सतर्क कर दिया। आलोचना बढ़ने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की ओर बढ़ते राजनीतिक कदम भी कुछ धीमे पड़ गए। गुप्ता का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में मोदी-शाह के लिए लोकसभा में 360 सीटों का आंकड़ा छूना आसान नहीं दिखता।
कांग्रेस की रणनीति से बढ़ी चुनौती
एक पहलू यह भी है कि कांग्रेस की बदली हुई रणनीति भाजपा के लिए नई चुनौती बनती दिखाई दे रही है। शेखर गुप्ता का मानना है कि मोदी-शाह जिस विस्तारवादी राजनीतिक सोच पर आगे बढ़ रहे हैं, उसके जवाब में कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। कांग्रेस अब उन क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए है, जिन्हें भाजपा या तो कमजोर करने या अपने साथ मिलाने की कोशिश में लगी है। उसकी कोशिश है कि इन दलों के परंपरागत मतदाताओं को अपने पक्ष में लाया जाए।
तमिलनाडु से लेकर केरल, कर्नाटक और तेलंगाना तक कांग्रेस की सक्रियता इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। दक्षिण भारत पर उसका बढ़ता फोकस इस बात का संकेत है कि पार्टी एक बार फिर अपनी राजनीतिक वापसी का आधार दक्षिण भारत को बनाना चाहती है। कांग्रेस की रणनीति में आया एक और बदलाव भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है। इस रणनीति के तहत कांग्रेस युवाओं और शिक्षा जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता देने लगी है। नीट पेपर लीक के मुद्दे पर छात्रों के बीच अभियान चलाना, शिक्षा व्यवस्था की खामियों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना और उसके बाद विभिन्न आंदोलनों के जरिए युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा है।
आने वाले समय में उत्तर प्रदेश समेत सात राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की रणनीति कांग्रेस को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने की ही रहेगी। हालांकि उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती भी कांग्रेस ही बनी रहेगी। इसकी वजह यह है कि अधिकांश क्षेत्रीय दल या तो पहले की तुलना में कमजोर हुए हैं या फिर किसी न किसी रूप में भाजपा के साथ खड़े दिखाई देते हैं।
शेखर गुप्ता का यह भी मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी को 240 सीटों पर रोकने वाले इंडि गठबंधन के भीतर बाद में जो टूट-फूट हुई, उसने कांग्रेस के सामने अपने दम पर उभरने की नई संभावनाएं भी खोल दी हैं। कांग्रेस भी अब यह समझने लगी है कि केवल गठबंधन की राजनीति के भरोसे सत्ता परिवर्तन संभव नहीं है।
बदलती धारणा भी बड़ी चुनौती
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश में तेजी से बदलते राजनीतिक और सामाजिक हालात, वैश्विक परिस्थितियों का असर और सबसे बढ़कर आम लोगों की बदलती राजनीतिक धारणा भी मोदी-शाह की अब तक बनी रही निर्विवाद छवि के सामने नई चुनौती बन रही है। यह बदलाव अपने आप में महत्वपूर्ण है और भाजपा नेतृत्व के लिए इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
क्या ‘मूल भाजपा’ का सवाल और बड़ा होगा?
पश्चिम बंगाल में चुनावी सफलता के बाद तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना से जुड़े नेताओं और सांसदों के भाजपा में आने के आरोपों ने यह बहस तेज कर दी कि क्या बहुमत हासिल करने के लिए मोदी-शाह किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
बेशक, मोदी-शाह राजनीति में आदर्शवाद का पाठ पढ़ाने नहीं आए हैं। उनकी अपनी राजनीतिक शैली है और उसी के अनुरूप वे आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन इसके साथ एक सवाल लगातार खड़ा होता है कि क्या इस रणनीति के बीच भाजपा अपनी मूल वैचारिक पहचान और संगठनात्मक चरित्र को लंबे समय तक बचाए रख पाएगी?
जब यह तथ्य सामने आता है कि हाल के संसदीय चुनाव में भाजपा का लगभग हर चौथा प्रत्याशी मूल रूप से भाजपा का नहीं था, तब यह धारणा स्वाभाविक रूप से मजबूत होती है कि पार्टी धीरे-धीरे अपने पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे और वैचारिक आधार से अलग दिशा में बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में यही सवाल भाजपा की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती भी बन सकता है।






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