वैश्विक अस्थिरता और बढ़ती जीवन लागत के बीच आम परिवारों की नई चिंता
कई बार महंगाई अचानक नहीं आती। वह चुपचाप घर में दाखिल होती है। पहले बचत कम करती है, फिर जरूरतों को सीमित करती है और अंततः भविष्य को लेकर चिंता पैदा कर देती है। इन दिनों देश में कुछ ऐसा ही माहौल महसूस किया जा रहा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को लेकर चर्चाएं तेज हैं। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। भारत इससे पहले भी कई बार तेल संकट और वैश्विक आर्थिक दबाव देख चुका है। लेकिन इस बार फर्क केवल कीमतों का नहीं, बल्कि लोगों के मन में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा का है।
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दरअसल, पेट्रोल केवल वाहन चलाने का खर्च नहीं बढ़ाता। उसका असर धीरे-धीरे पूरे बाजार पर दिखाई देता है। परिवहन महंगा होता है तो सब्जियों से लेकर निर्माण सामग्री तक हर चीज की लागत बढ़ने लगती है। यही वजह है कि आम आदमी को लगता है कि उसकी आय वहीं ठहरी है, जबकि खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में खुदरा महंगाई कई बार नियंत्रित दिखाई दी, लेकिन स्कूल फीस, इलाज, किराया और घरेलू जरूरतों का खर्च लगातार बढ़ता गया है। एक मध्यमवर्गीय परिवार, जिसकी आय पांच साल पहले संतुलित मानी जाती थी, आज उसी आय में ईएमआई, बच्चों की पढ़ाई और रसोई का बजट संभालने के लिए लगातार समझौते कर रहा है।
हालांकि केवल पेट्रोल के कुछ रुपए बढ़ जाने से अर्थव्यवस्था संकट में चली जाएगी, ऐसा मानना भी अतिशयोक्ति होगी। दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत की स्थिति अभी भी अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है। अमेरिका और यूरोप के कई देश ऊंची ब्याज दरों, भारी कर्ज और उत्पादन संकट से जूझ रहे हैं। चीन की अर्थव्यवस्था भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही। ऐसे माहौल में भारत अभी भी दुनिया की तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। फिर भी सवाल उठता है कि यदि स्थिति इतनी खराब नहीं है तो लोगों में चिंता क्यों बढ़ रही है?
तेल की आग और बाजार की मनोवैज्ञानिक हलचल
होर्मूज जलमार्ग में बढ़ते तनाव और वैश्विक ईंधन संकट का असर अब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखाई देने लगा है। कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत भी इससे पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता था। हालांकि वैश्विक परिस्थितियों की तुलना में भारत की स्थिति फिलहाल अपेक्षाकृत संतुलित मानी जा रही है। इसके बावजूद देश के भीतर महंगाई को लेकर चिंता अधिक इसलिए भी महसूस होती है, क्योंकि यहां आर्थिक मुद्दों पर सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाजी कई बार वास्तविक स्थिति से अधिक भय का माहौल तैयार कर देती है।
असल समस्या केवल वास्तविक महंगाई नहीं, बल्कि आर्थिक मनोविज्ञान भी है। किसी दिन शेयर बाजार गिरता है तो अगले ही पल मंदी की आशंकाएं सोशल मीडिया पर छा जाती हैं। कहीं युद्ध की खबर आती है तो बाजार में डर बढ़ जाता है। कई व्यापारी भी भविष्य की आशंका को देखते हुए पहले ही कीमतें बढ़ाने लगते हैं। इस तरह वास्तविक और मनोवैज्ञानिक दबाव मिलकर कृत्रिम महंगाई जैसा माहौल तैयार कर देते हैं। भारत में अक्सर देखा जाता है कि पेट्रोल या डीजल की कीमतों में मामूली वृद्धि के बाद कई वस्तुओं और सेवाओं के दाम आवश्यकता से अधिक बढ़ा दिए जाते हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का हवाला देकर सब्जियों से लेकर निर्माण सामग्री तक के दाम बढ़ जाते हैं, जबकि कई मामलों में वास्तविक लागत वृद्धि इतनी बड़ी नहीं होती। छोटे शहरों में ऑटो किराया बढ़ जाता है, ऑनलाइन डिलीवरी शुल्क बढ़ जाता है और स्थानीय दुकानदार भी भविष्य की आशंका का हवाला देकर कीमतें ऊपर कर देते हैं। यही वह बिंदु है जहां वास्तविक महंगाई और अवसरवादी मूल्यवृद्धि एक-दूसरे में घुलने लगती हैं।
विकास के दावे बनाम घर का बिगड़ता बजट
इन दिनों शेयर बाजार की गिरावट को लेकर भी कई तरह की बातें हो रही हैं। लेकिन बाजार में उतार-चढ़ाव कोई नई घटना नहीं है। भारतीय शेयर बाजार पहले भी कई बार ऊपर-नीचे होता रहा है। इस बार गिरावट के पीछे विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली को बड़ा कारण माना जा रहा है। वैश्विक अस्थिरता और अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरों के दबाव के चलते विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं। इसका असर भारत पर भी दिखाई देता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो रही है।
पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव यह भी आया है कि अब घरेलू निवेशकों की भागीदारी काफी बढ़ चुकी है। एसआईपी और छोटे निवेशकों ने बाजार को पहले की तुलना में अधिक स्थिरता दी है। यही कारण है कि विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार पूरी तरह टूटता हुआ नहीं दिखाई देता। लेकिन, आम आदमी की वास्तविक चिंता शेयर बाजार से ज्यादा रोजमर्रा की जिंदगी को लेकर है। स्कूल फीस बढ़ रही है। इलाज महंगा हो रहा है। घर चलाने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि उसकी आय और खर्च के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। आर्थिक विकास के बड़े आंकड़े भी कई बार लोगों को अपने जीवन से जुड़े हुए महसूस नहीं होते।
यही वजह है कि अब सवाल केवल विकास दर का नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता का भी उठने लगा है। यदि अर्थव्यवस्था मजबूत है तो रोजगार में स्थिरता क्यों नहीं दिख रही? यदि निवेश बढ़ रहा है तो मध्यम वर्ग की बचत क्यों घट रही है? केवल एक्सप्रेस-वे, निवेश सम्मेलन और शेयर बाजार के रिकॉर्ड आर्थिक मजबूती का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकते। जब तक आम परिवार अपने भविष्य को सुरक्षित महसूस नहीं करेगा, तब तक विकास के दावे अधूरे लगते रहेंगे।
नौकरी बचाने की चिंता, भविष्य बनाने की जंग
रोजगार को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। तकनीक और एआई के विस्तार ने कई क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा की हैं, लेकिन साथ ही नौकरी की असुरक्षा की भावना भी बढ़ाई है। बड़ी कंपनियां लागत घटाने के लिए ऑटोमेशन की ओर बढ़ रही हैं। आईटी, मीडिया और सेवा क्षेत्र में समय-समय पर छंटनी की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे में युवाओं के सामने केवल डिग्री नहीं, बल्कि लगातार नए कौशल सीखने की चुनौती भी खड़ी हो रही है।
यह वही पीढ़ी है जिसने बेहतर भविष्य की उम्मीद में शिक्षा ऋण लिया, महंगे शहरों में करियर शुरू किया और अब बढ़ती लागत तथा अस्थिर रोजगार के बीच खुद को फंसा हुआ महसूस कर रही है। यही कारण है कि आर्थिक चिंता अब केवल गरीब वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि शिक्षित मध्यम वर्ग भी असुरक्षा महसूस करने लगा है।
‘श्रिंकफ्लेशन’: जब सामान वही, मात्रा कम
महंगाई केवल वह नहीं है जो कीमतों में बढ़ती हुई दिखती है, बल्कि वह भी है जो चुपके से वजन कम कर देती है। इन दिनों बाजार में ‘श्रिंकफ्लेशन’ का चलन बढ़ा है। बिस्कुट, नमकीन, साबुन और अन्य घरेलू सामानों की कीमतें तो वही रहती हैं, लेकिन पैकेट के अंदर का वजन 10 से 20 प्रतिशत तक कम कर दिया जाता है। आम उपभोक्ता को लगता है कि वह अब भी पुराने दाम पर सामान खरीद रहा है, लेकिन हकीकत में वह उसी पैसे में कम सामग्री घर ला रहा होता है। यह अदृश्य कटौती मध्यम वर्ग की जेब पर वह प्रहार है, जिसका अहसास उसे महीने के अंत में तब होता है जब राशन उम्मीद से पहले खत्म होने लगता है। ऐसे में अब यह बहस भी तेज हो रही है कि क्या सरकार को पैकेजिंग और मात्रा संबंधी नियमों को और पारदर्शी बनाना चाहिए, ताकि उपभोक्ता आसानी से समझ सके कि वह वास्तव में कितनी मात्रा खरीद रहा है।
असली संकट अर्थव्यवस्था नहीं, भरोसे का है
ऐसे समय में आम आदमी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल महंगाई नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन बनाए रखना भी है। डर और अफवाहों के इस दौर में जल्दबाजी से लिए गए आर्थिक फैसले कई बार नुकसान बढ़ा देते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाना, अनावश्यक दिखावे से बचना और बदलते समय के अनुसार खुद को कौशल के स्तर पर तैयार करना आने वाले समय की सबसे बड़ी सुरक्षा बन सकता है। लेकिन, केवल नागरिकों की सावधानी पर्याप्त नहीं होगी। सरकार और बाजार व्यवस्था की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ईंधन पर कर ढांचे को संतुलित रखना, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर प्रभावी निगरानी और रोजगार सृजन को प्राथमिकता देना अब केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी बनता जा रहा है।
भविष्य को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह स्थिति किसी बड़े आर्थिक संकट की ओर संकेत है? संभवतः अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी और तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा है। हरित ऊर्जा, विनिर्माण, रक्षा उत्पादन और तकनीकी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में अभी भी बड़े अवसर दिखाई दे रहे हैं। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही जरूरी है कि विकास का लाभ समाज के निचले और मध्यम वर्ग तक वास्तविक रूप से पहुंचे। आज की स्थिति को शायद एक वाक्य में इस तरह समझा जा सकता है, देश की अर्थव्यवस्था आंकड़ों में मजबूत दिखाई दे सकती है, लेकिन घर की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है।






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