सत्ता का नया कुरुक्षेत्र: स्मार्टफोन
एआई, डेटा और सोशल मीडिया ने चुनावी राजनीति का तरीका बदल दिया है। डीपफेक और लक्षित प्रचार के बीच सवाल यह है कि तकनीक मतदाता को अधिक जागरूक बनाएगी या उसकी स्वतंत्र पसंद को प्रभावित...

चुनाव और एआई
मणिमाला शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक
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रैलियों में उड़ती धूल, लाउडस्पीकर का शोर, कार्यकर्ताओं की टोलियां और चाय की दुकानों पर चुनावी बहसें भारतीय लोकतंत्र की पुरानी तस्वीर हैं। कभी नेता की लोकप्रियता नापने के लिए चौपाल, नुक्कड़ सभा और पार्टी कार्यकर्ताओं का नेटवर्क ही काफी माना जाता था। अब इस चुनावी भूगोल में एक नई जगह जुड़ गई है और वह है, मोबाइल स्क्रीन।
सुबह आंख खुलते ही जिस स्क्रीन पर खबर, मनोरंजन, विज्ञापन और रिश्तेदारों के संदेश एक साथ आते हैं, वहीं राजनीति भी दस्तक दे रही है। अब हर मतदाता को एक जैसा राजनीतिक संदेश दिखाना जरूरी नहीं। एआई और डेटा के सहारे संदेश को व्यक्ति, उम्र, भाषा, रुचि और मुद्दे के हिसाब से ढाला जा सकता है। यानी पहले नेता जनता तक पहुंचने के लिए उसे अपने मंच पर बुलाता था। लेकिन आज मामला उल्टा है। अब राजनीति जनता की जेब में रखे फोन तक पहुंचने की कोशिश में लगी है।
डेटा से मतदाता तक : चुनाव का नया गणित
राजनीतिक दलों के लिए मतदाता को समझना कोई नई बात नहीं है। वर्षों से बूथ कार्यकर्ता, स्थानीय नेता, सामाजिक समीकरण, घर-घर संपर्क और चुनावी सर्वे इसके आधार रहे हैं। अब डिजिटल व्यवहार ने इस गणित में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। सोशल मीडिया पर हमारी पसंद, क्लिक और प्रतिक्रियाओं से ऐसे संकेत मिल सकते हैं जिनके आधार पर अलग-अलग समूहों के लिए अलग संदेश तैयार किए जाएं। इसे हाइपर-पर्सनलाइजेशन कहा जाता है।
मान लीजिए एक युवा मतदाता रोजगार और पेपर लीक को लेकर परेशान है। उसकी स्क्रीन पर उसी पार्टी के संदेश रोजगार और युवाओं की आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द दिखाई देने लग जाएं। उसी घर में बैठे उसके माता-पिता को वही पार्टी कल्याणकारी योजनाओं, सुरक्षा या सांस्कृतिक मुद्दों के जरिए संबोधित करने की कोशिश करती नजर आएगी। संदेश एक ही पार्टी का है, लेकिन उसका चेहरा मतदाताओं की उम्र और मुद्दों के हिसाब से अलग होगा। यहीं से लोकतंत्र के सामने असली सवाल खड़ा होता है। यदि हर राजनीतिक दल मतदाता को उसकी पसंद के हिसाब से अलग राजनीतिक सच दिखाएगा तो साझा सार्वजनिक बहस बचेगी कहां? यह रणनीति राजनीतिक दलों के लिए उपयोगी और मतदाता के लिए सुविधाजनक हो सकती है। लेकिन पारदर्शिता के अभाव में यही सुविधा अदृश्य राजनीतिक प्रभाव में बदल सकती है।
एआई : प्रचार का नया हथियार या लोकतांत्रिक औजार?
यहां एआई को केवल खतरे की तरह देखना भी सही नहीं होगा। भारत जैसे बहुभाषी देश में एआई किसी नेता के भाषण को कई भारतीय भाषाओं में तेजी से तैयार करने, कम संसाधनों में वीडियो और प्रचार सामग्री बनाने और स्थानीय मतदाताओं तक उनकी भाषा में पहुंचने के अवसर पैदा कर सकता है। राजनीति में तकनीक कभी सिर्फ तकनीक नहीं रहती। उसके पीछे पैसा, सत्ता और मतदाता को प्रभावित करने की इच्छा होती है। यहां सभी राजनीतिक दलों के लिए पारदर्शिता जरूरी है। मतदाताओं को पता होना चाहिए कि सामग्री किसने बनाई, किसके पैसे से बनाई और क्यों दिखाई जा रही है। वरना राजनीति का पुराना सवाल, ‘यह नेता किसके लिए बोल रहा है?’, बदलकर यह हो जाएगा कि, ‘मेरे फोन पर यह बात मुझे ही क्यों दिखाई जा रही है?’ जब आवाज असली लगे, लेकिन नेता ने वह बात कही ही न हो, तब जनरेटिव एआई चुनावी प्रचार को और संवेदनशील बना देता है। अब आवाज की नकल, चेहरे का इस्तेमाल और किसी व्यक्ति को ऐसी बात कहते हुए दिखाना संभव है जो उसने कही ही नहीं।
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान अभिनेता आमिर खान और रणवीर सिंह के ऐसे फर्जी एआई वीडियो सामने आए, जिनमें उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना और कांग्रेस के समर्थन में बोलते हुए दिखाया गया था। दोनों अभिनेताओं ने इन्हें फर्जी बताया। आमिर खान की ओर से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। खतरा केवल फर्जी सामग्री बनाने तक सीमित नहीं है। ‘लायर्स डिविडेंड’ नाम का एक नया संकट भी हमारे सामने है। जब समाज में डीपफेक का डर बढ़ जाता है तो वास्तविक ऑडियो या वीडियो को भी कोई व्यक्ति यह कहकर खारिज कर सकता है कि वह नकली है। यानी कल समस्या सिर्फ यह नहीं होगी कि झूठ क्या है? समस्या यह भी होगी कि सच पर भरोसा कैसे किया जाए।
डीपफेक की रफ्तार, सच की सुस्ती
चुनावों में अफवाहें पहले भी फैलती थीं। फर्क यह था कि झूठ को गढ़ने और फैलाने की अपनी सीमाएं थीं। अब एआई ने उस झूठ को चेहरा, आवाज और विश्वसनीयता का भ्रम दे दिया है। मतदान से कुछ घंटे पहले उम्मीदवार का भड़काऊ ऑडियो वायरल हो जाए तो तथ्य-जांच तक हजारों लोग उसे सुन चुके होंगे। राजनीति में खंडन चाहे जितना मजबूत हो, पहली धारणा हमेशा मिटती नहीं है।
डीपफेक किसी उम्मीदवार की छवि खराब करने के साथ सामाजिक तनाव भी पैदा कर सकता है। इसे सिर्फ तकनीकी समस्या मानना भूल होगी। यह लोकतांत्रिक भरोसे की समस्या है। इसी खतरे को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने मई 2024 में राजनीतिक दलों को एआई आधारित डीपफेक और गलत सूचना के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी थी। आयोग ने ऐसे कंटेंट की जानकारी मिलने के बाद उसे हटाने के लिए अधिकतम तीन घंटे की समय-सीमा तय की थी।
एल्गोरिदम को क्या पसंद है? आपका गुस्सा
सोशल मीडिया का कारोबार ध्यान पर चलता है। जिस सामग्री पर लोग ज्यादा प्रतिक्रिया देते हैं, उसके अधिक लोगों तक पहुंचने की संभावना बढ़ती है। और इंसानी मन की विडंबना यह है कि शांत, तथ्यपूर्ण और जटिल नीति-बहस की तुलना में गुस्सा, डर, सनसनी और विवाद कहीं जल्दी ध्यान खींचते हैं। एक तीखा मीम, तीस सेकंड की रील या भावनात्मक वीडियो किसी नीति दस्तावेज से कहीं तेजी से फैल सकता है। यह दावा करना गलत होगा कि एल्गोरिदम सीधे आपका वोट तय करता है। लेकिन मतदाताओं को पूछना चाहिए कि उन्हें बार-बार क्या दिखाया जा रहा है और क्या जानबूझकर नहीं दिखाया जा रहा। क्योंकि मतदाता की पसंद केवल मतदान के दिन नहीं बनती। वह महीनों तक देखी, सुनी और दोहराई गई सूचनाओं से भी आकार लेती है।
Gen-Z: 30 सेकंड में सिमटती राजनीति?
नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा राजनीति को सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और डिजिटल माध्यमों के जरिए देखता है। इसे केवल युवाओं की कमजोरी कहना गलत होगा। असली समस्या सूचना की बाढ़ है। एक ही स्क्रीन पर खबर, प्रचार, विज्ञापन और झूठी सूचना एक ही गति से दौड़ रहे हैं। बेरोजगारी, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी चिंताएं युवाओं की राजनीति को प्रभावित कर रही हैं। तीस सेकंड की रील बेरोजगारी की पूरी अर्थव्यवस्था नहीं समझा सकती, लेकिन बेरोजगारी के प्रति युवाओं की धारणा जरूर प्रभावित कर सकती है।
इसलिए डिजिटल साक्षरता अब तकनीकी कौशल भर नहीं है। यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। किसी सनसनीखेज सामग्री को तुरंत साझा करने से पहले उसके स्रोत की जांच, दूसरे विश्वसनीय माध्यमों से पुष्टि और पुराने वीडियो के संदर्भ की पड़ताल जरूरी है। डिजिटल नागरिक का पहला हथियार अब ‘शेयर’ बटन नहीं, सवाल होना चाहिए।
नियमन की लक्ष्मण रेखा
एआई के राजनीतिक इस्तेमाल पर स्पष्ट नियम अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है। एआई से तैयार तस्वीर, वीडियो और ऑडियो की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। राजनीतिक विज्ञापन में यह बताया जाना चाहिए कि सामग्री किसने बनाई और उसके पीछे पैसा किसका है। चुनाव आयोग को डिजिटल प्रचार, एआई सामग्री और ऑनलाइन खर्च की निगरानी और अधिक स्पष्ट करनी होगी। साथ ही डीपफेक और चुनावी दुष्प्रचार की शिकायतों पर तेज कार्रवाई की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन सावधानी यहां भी जरूरी है। गलत सूचना रोकने के नाम पर किसी सरकार या संस्था को ‘सच’ का अंतिम निर्णायक बना देना लोकतंत्र के लिए दूसरा खतरा पैदा कर सकता है। नियमन ऐसा होना चाहिए जो वास्तविक झूठ को रोके, लेकिन मतदाताओं की असहमति को नहीं।
जमीन बनाम स्क्रीन नहीं, दोनों का गठजोड़
भविष्य के चुनावों में अहम सवाल है कि क्या अगली चुनावी राजनीति जमीनी संगठन को पीछे छोड़ देगी? लेकिन भारत की विविधता को देखते हुए अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। मैं जहां से देख पा रही हूं, वहां से दिखाई देता है कि मोबाइल स्क्रीन माहौल बना सकती है, किसी मुद्दे को चर्चा में ला सकती है और मतदाता की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकती है। लेकिन चुनाव केवल नैरेटिव से नहीं जीते जाते हैं। स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की विश्वसनीयता, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, घर-घर संपर्क और मतदान के दिन मतदाता को बूथ तक पहुंचाने की क्षमता अब भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
इसलिए भविष्य की राजनीति न पूरी तरह जमीन पर होगी, न पूरी तरह स्क्रीन पर। वह होगी ‘फिजिटल’ राजनीति। स्क्रीन ध्यान खींचेगी। डेटा संदेश को व्यक्तिगत बनाएगा। एआई भाषा और सामग्री तैयार करेगा। लेकिन जमीन उस राजनीतिक संपर्क को वोट में बदलने की कोशिश करेगी। यानी गांव-कस्बे की चौपालें खत्म नहीं होंगी, बस एक और नई चौपाल आपकी हथेली में होगी।
चुनाव आसान, लोकतंत्र जटिल?
एआई का असली परीक्षण यह नहीं कि वह कितनी सुंदर तस्वीर या कितनी भाषाओं में नेता की आवाज बना सकता है। असली सवाल है कि क्या वह नागरिक को अधिक सूचित बनाता है या अधिक प्रभावित। यदि मतदाता जानता है कि सामग्री एआई से बनी है, उसे किसने बनाया और उसका स्रोत क्या है, तो तकनीक लोकतंत्र की मददगार हो सकती है। लेकिन यदि वही तकनीक अदृश्य प्रोफाइलिंग, लक्षित भय, नकली आवाज और भावनात्मक प्रचार के जरिए मतदाता की सूचना की दुनिया को सीमित करने लगेगी तो लोकतंत्र का संकट गहरा जाएगा।
अगली राजनीतिक लड़ाई जमीन बनाम मोबाइल की नहीं होगी। असली लड़ाई होगी मतदाता की स्वतंत्र पसंद और उसे प्रभावित करने वाली अदृश्य तकनीकों के बीच। हमारा स्मार्टफोन चुनाव का मालिक तो शायद नहीं बनेगा। लेकिन वह मतदाता की राजनीतिक दुनिया का सबसे शक्तिशाली दरवाजा जरूर बन सकता है। सवाल है कि उस दरवाजे के दूसरी तरफ कौन खड़ा होगा? कोई राजनीतिक दल, तकनीकी कंपनी, अदृश्य एल्गोरिदम या फिर जागरूक नागरिक? ऐसे में हो सकता है कि आने वाले चुनावों में लोकतंत्र की असली परीक्षा ईवीएम का बटन दबाने से कहीं पहले ही शुरू हो जाए।






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