पर्ची खुली, कुर्सी फिसली
राजस्थान में जादूगरों के सम्मेलन की घोषणा हुई तो लगा कि आखिर जादू को उसका सम्मान मिलने वाला है। फिर याद आया कि हमारे यहां सबसे बड़े जादूगर तो मंच पर नहीं, राजनीति में मिलते...

बात बेलगाम
राजस्थान के निकाय चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति में सबसे बड़ा रणनीतिकार कभी-कभी चुनाव आयोग की लॉटरी भी हो सकती है। वार्ड आरक्षण की घोषणा होते ही वर्षों से जनता की सेवा का दावा करने वाले कई नेताओं की सेवा अचानक नए वार्ड की तलाश में निकल पड़ी। कल तक जो पार्षद गली-गली विकास का हिसाब दे रहे थे, आज घर-घर रिश्तेदारी का गणित जोड़ रहे हैं। कहीं महिला आरक्षण आया तो नेता’जी ने लोकतंत्र की नई परिभाषा खोज ली जनता की सेवा अब गृहलक्ष्मी करेंगी। उधर जातिगत आरक्षण ने ऐसे नेताओं को भी अपनी जाति याद दिला दी, जो चुनाव के अलावा पूरे पांच साल सबका साथ की राजनीति करते रहे। सबसे मनोरंजक दृश्य पार्टी कार्यालयों में है। टिकट की चर्चा कम, पारिवारिक वंशावली अधिक देखी जा रही है। कोई पत्नी को तैयार कर रहा है, कोई बहू को, तो कोई भाभी को जनसेवा का महत्व समझा रहा है। कार्यकर्ता बेचारा अभी भी पूछ रहा है नेता’जी, विचारधारा क्या होगी? जवाब मिलता है पहले यह पता करो कि हमारा वार्ड किस श्रेणी में गया है? लोकतंत्र में जनता पांच साल बाद फैसला सुनाती है, लेकिन आरक्षण की लॉटरी पांच मिनट में पूरे राजनीतिक समीकरण बदल देती है।
Table Of Content
जादू का असली खेल
राजस्थान में जादूगरों के सम्मेलन की घोषणा हुई तो लगा कि आखिर जादू को उसका सम्मान मिलने वाला है। फिर याद आया कि हमारे यहां सबसे बड़े जादूगर तो मंच पर नहीं, राजनीति में मिलते हैं। कोई घाटे को विकास बना देता है, कोई वादों को उपलब्धि और कोई चुनावी घोषणा को अगले चुनाव तक गायब कर देता है। अब जादूगर जीएसटी से मुक्ति मांग रहे हैं। मांग जायज़ है, क्योंकि उनका जादू कम से कम टिकट लेकर दिखता है। असली करिश्मे तो वे हैं जो जनता की जेब हल्की और उम्मीद भारी कर देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने वर्तमान मुख्यमंत्री को शो देखने का न्योता दिया है। यदि पूरा मंत्रिमंडल पहली पंक्ति में बैठ जाए तो शायद दोनों पक्ष एक-दूसरे की कला से कुछ नया सीख लें। एक भ्रम पैदा करने की बारीकियां और दूसरा तालियां बटोरने का विज्ञान। बस डर इतना है कि कहीं सम्मेलन के अंत में असली जादूगर फिर वही न पूछ बैठे हुजूर, अब हमारी रोज़ी कहां गायब हो गई?
ब्रिक्स आया, महंगाई मुस्कराई
जयपुर में ब्रिक्स सम्मेलन की ऐसी धूम है कि लगता है दुनिया की अर्थव्यवस्था अब हवामहल की छांव में ही सुधरेगी। मंच पर अर्थशास्त्री वैश्विक व्यापार का नया नक्शा बना रहे हैं, और आम आदमी किराने की दुकान पर पुराने उधार का हिसाब। पहले दिन निजी निवेश और आर्थिक सहयोग पर गंभीर मंथन हुआ। सम्मेलन कक्ष में कहा गया कि पूंजी को भरोसा चाहिए। उधर जयपुर का व्यापारी बोला भरोसा तो हमें भी चाहिए, ग्राहक कब भुगतान करेगा? विदेशी प्रतिनिधि राजस्थानी पगड़ी पहनकर तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, जबकि स्थानीय उद्योगपति सोच रहे हैं कि फोटो से ज़्यादा काम कोई निवेश की घोषणा कर दे। ब्रिक्स की बैठकों में डॉलर के विकल्प खोजे जा रहे हैं, लेकिन सब्ज़ी मंडी में टमाटर अब भी अपने ही रेट पर चलता है। लगता है अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा सिद्धांत वही है। सम्मेलन जितना बड़ा, आम आदमी की जेब उतनी ही छोटी महसूस होती है।
ई-बस आई, अब यात्री सुधरें!
मुख्यमंत्री ने 71 ई-बसों को हरी झंडी दिखा दी। सरकार ने अपना काम कर दिया, अब बारी मुसाफिरों की है। जो बस स्टॉप पर नहीं, ठीक उसके दस कदम आगे खड़े होकर बस रुकवाते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि व्यवस्था बिगड़ी हुई है। ई-बसें प्रदूषण कम करेंगी, लेकिन यात्रियों की आदतों का धुआं कौन कम करेगा? कोई पान की पीक से सीट रंगेगा, कोई मूंगफली के छिलकों से फर्श सजाएगा, तो कोई दरवाज़ा बंद होने से पहले ही ओलंपिक धावक बन जाएगा। सरकार ने आधुनिक बसें दी हैं। उम्मीद है जनता भी विंडो से थूक सेवा और सीट पर नाम लिखो अभियान बंद करेगी। वरना कल को ई-बस नहीं, ई-शर्म चलानी पड़ेगी। जो हर गंदगी पर मुसाफिर का चेहरा स्क्रीन पर दिखा दे। बसें चार्ज होंगी, काश यात्री भी थोड़े संस्कार से चार्ज हो जाएं!
लाइक लूटने पर लगाम
सरकारी स्कूलों में फोटो-वीडियो पर रोक की खबर सुनते ही सोशल मीडिया के उन योद्धाओं की आत्मा कांप उठी, जिनका कैमरा ही रोजी-रोटी, प्रसिद्धि और फॉलोअर का ऑक्सीजन सिलेंडर है। स्कूल में बच्चा पढ़ रहा हो या मास्टर पढ़ा रहा हो, इनका सवाल एक ही भाई, कंटेंट मिलेगा या नहीं? सरकार कहती है बच्चों की निजता बचानी है। सोशल मीडिया के शूरवीर पूछते हैं लेकिन हमारी टीआरपी का क्या होगा? उन्हें हर घटना में एक वीडियो, हर वीडियो में सनसनी और हर सनसनी में लाखों व्यू नजर आते हैं। पहले लोग स्कूल में पढ़ने जाते थे, अब कुछ लोग कैमरा लेकर पहुंचते हैं। बच्चा सवाल का जवाब दे या न दे, वीडियो में अंगूठा ऊपर होना चाहिए। शिक्षक की पूरी बात सुनी जाए या नहीं, मगर शीर्षक ऐसा हो कि देखने वाला समझे राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था आज ही स्वर्ग पहुंच गई या रसातल में चली गई। असल समस्या यह है कि सोशल मीडिया का कैमरा सच नहीं खोजता, सामग्री खोजता है। जिसे जितना मसालेदार दृश्य मिला, उसके उतने ही लाइक और व्यू। अब सरकार ने कैमरा रोका है तो बेचैनी स्वाभाविक है। आखिर बिना अनुमति के सच दिखाकर प्रसिद्ध होने का कारोबार कैसे चलेगा? लगता है अगली मांग होगी शिक्षा विभाग कृपया लाइक और व्यू के लिए भी कोई अनुमति-पत्र जारी करे!





No Comment! Be the first one.