भारत कब बनेगा खेल महाशक्ति?
भारत खेलों में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन पेरिस ओलंपिक ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया। 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश छह पदकों पर संतोष करता है, जबकि उससे बहुत छोटे देश 20, 30 और उससे अधिक पदक जीत...

खेलों में भारतीय चुनौती
भारत में जब भी खेल की बात होती है, क्रिकेट सबसे पहले सामने आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत आज क्रिकेट की दुनिया की बड़ी शक्ति है। आर्थिक संसाधन, दर्शक, घरेलू प्रतियोगिताएं, प्रायोजन और खिलाड़ियों के अवसर, लगभग हर क्षेत्र में भारतीय क्रिकेट ने विश्वस्तरीय व्यवस्था खड़ी कर दी है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या क्रिकेट के बाहर भी भारत उसी दिशा में बढ़ रहा है? क्या भारत समग्र खेल महाशक्ति बनने की राह पर है?
Table Of Content
इस सवाल का जवाब निराशाजनक नहीं है। भारतीय खेलों की तस्वीर निश्चित रूप से बदली है। टोक्यो ओलंपिक में भारत ने सात पदक जीते। नीरज चोपड़ा के स्वर्ण ने एथलेटिक्स को नई पहचान दी। पेरिस ओलंपिक में भारत ने छह पदक हासिल किए। 2023 के एशियाई खेलों में भारत ने पहली बार 100 का आंकड़ा पार करते हुए 107 पदक जीते। इनमें 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य पदक थे। एथलेटिक्स ने 29 और निशानेबाजी ने 22 पदक दिए। सरकार भी खेल पर पहले से अधिक ध्यान दे रही है। प्रतिभा खोज, प्रशिक्षण, खेल विज्ञान और बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाने की दिशा में योजनाएं बनाई जा रही हैं।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि भारत ने खेलों में प्रगति नहीं की है। निःसंदेह भारत ने पिछले कुछ वर्षों में लंबी दूरी तय की है। ओलंपिक में पदक आए हैं, एशियाई खेलों में प्रदर्शन बेहतर हुआ है, नए खेलों में भारतीय खिलाड़ी उभर रहे हैं और खेलों के प्रति समाज की सोच भी बदली है। लेकिन जब इसी प्रगति को हम उन छोटे देशों की सफलता के आईने में देखते हैं, तो निराशा जरूर होती है। तब हमारी प्रगति काफी धीमी लगने लगती है। सवाल भारत की उपलब्धियों को नकारने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि हमारी विशाल आबादी, प्रतिभा और बढ़ते संसाधनों के बावजूद हम अपनी संभावनाओं के अनुरूप गति क्यों नहीं पकड़ पा रहे हैं।
छोटे देश हमसे आगे क्यों?
पेरिस ओलंपिक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने छह पदक जीते, जबकि नीदरलैंड ने 34, न्यूजीलैंड ने 20 और ऑस्ट्रेलिया ने 53 पदक हासिल किए। यह तुलना भारत को छोटा दिखाने के लिए नहीं है। बल्कि यह पूछने के लिए है कि इतने बड़े देश में प्रतिभा और संसाधन होने के बावजूद पदकों की संख्या अपेक्षाकृत कम क्यों है? क्या वहां के बच्चे हमसे ज्यादा प्रतिभाशाली हैं? शायद नहीं। अंतर कहीं और है और वह है तैयारी की व्यवस्था।
नीदरलैंड में सरकार और राष्ट्रीय ओलंपिक समिति मिलकर उच्चस्तरीय खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, प्रतिभा खोज और प्रशिक्षकों के विकास में निवेश करते हैं। वहां खिलाड़ी के खेल जीवन के साथ शिक्षा और रोजगार की जरूरतों को भी व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है।
न्यूजीलैंड का उदाहरण भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण है। 2025 से पात्र उच्चस्तरीय खिलाड़ियों को 50 हजार न्यूजीलैंड डॉलर सालाना तक का प्रशिक्षण अनुदान और संभावित खिलाड़ियों को 25 हजार डॉलर तक की सहायता दी जा रही है। इसके साथ चिकित्सा बीमा तथा पोषण, फिजियोथेरेपी, खेल विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य और प्रदर्शन संबंधी विशेषज्ञ सहायता भी उपलब्ध है। 2025 से 2028 के चार साल के चक्र में न्यूजीलैंड की उच्च प्रदर्शन खेल व्यवस्था 36 राष्ट्रीय खेल संगठनों के लिए 162.8 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश कर रही है। इसके अलावा खिलाड़ियों के आर्थिक और प्रदर्शन सहयोग के लिए सालाना 22 मिलियन डॉलर की व्यवस्था है। यही वह जगह है जहां भारत को आत्ममंथन करना चाहिए।
भारत में प्रोत्साहन भी कम नहीं
हमारे यहां पदक जीतने के बाद खिलाड़ी पर पुरस्कारों की बारिश होती है। सरकारी सम्मान, नकद पुरस्कार, नौकरी और सार्वजनिक अभिनंदन, यह सब जरूरी भी है और खिलाड़ियों का मनोबल भी बढ़ाता है। लेकिन क्या हमें पदक के बाद पुरस्कार देने से ज्यादा ध्यान पदक से पहले की तैयारी पर नहीं देना चाहिए? पदक जीतने वाले खिलाड़ी का सम्मान करने से ज्यादा जरूरी है पदक जीतने वाला खिलाड़ी तैयार करना।
इसके लिए सबसे पहले प्रतिभा खोज की पूरी व्यवस्था बदलनी होगी। भारत को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में व्यापक, नियमित और वैज्ञानिक प्रतिभा खोज अभियान चलाना चाहिए। केवल कुछ प्रतियोगिताएं आयोजित कर देने को प्रतिभा खोज नहीं कहा जा सकता। हर स्कूल, पंचायत, ब्लॉक और जिले तक ऐसी व्यवस्था पहुंचनी चाहिए, जिसमें बच्चों की शारीरिक क्षमता, गति, सहनशक्ति और विभिन्न खेलों के प्रति स्वाभाविक योग्यता को पहचाना जा सके।
आज भी गांव का कोई बच्चा असाधारण प्रतिभा रखता है तो उसका आगे बढ़ना कई बार इस बात पर निर्भर करता है कि उसे पहचानने वाला कोई जागरूक शारीरिक शिक्षक या प्रशिक्षक मिल गया या नहीं। यदि किसी पीटीआई ने गंभीरता दिखाई, बच्चे की प्रतिभा पहचानी और उसे सही खेल तथा सही प्रशिक्षण तक पहुंचाया, तो प्रतिभा निकल आती है। अन्यथा वही प्रतिभा गांव तक सीमित रह जाती है।
प्रतिभा की कमी नहीं है भारत में
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, प्रतिभा खोजने वाली नजर की कमी है। हर जिले का अपना खेल मानचित्र भी तैयार किया जा सकता है। जहां कुश्ती और मुक्केबाजी की प्रतिभा अधिक है, वहां उन्हीं खेलों के उत्कृष्टता केंद्र बनाए जाएं। कहीं तीरंदाजी, कहीं एथलेटिक्स, कहीं हॉकी और कहीं निशानेबाजी। हर जगह हर खेल के लिए महंगी व्यवस्था खड़ी करने के बजाय स्थानीय क्षमता के आधार पर कुछ खेलों को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन प्रतिभा खोजने के बाद उसे बचाना भी उतना ही जरूरी है।
भारत में अनेक युवा खेल इसलिए चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि खेल के माध्यम से सेना, पुलिस, रेलवे या किसी सरकारी विभाग में नौकरी मिल सकती है। आर्थिक सुरक्षा के लिए यह आकर्षण स्वाभाविक है, लेकिन यदि नौकरी खेल का मुख्य उद्देश्य बन जाए तो विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनने के लिए जरूरी जुनून और दीर्घकालीन प्रतिबद्धता पैदा होना कठिन है।
हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें बच्चा पहले खेलना पसंद करे, फिर उसमें उत्कृष्टता हासिल करने का सपना देखे और उसके बाद खेल उसके लिए सम्मानजनक करियर बने। नौकरी उसका सहारा हो, खेल का एकमात्र लक्ष्य नहीं। यहां प्रशिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि भारतीय प्रशिक्षक अच्छे हैं या विदेशी प्रशिक्षक। भारत में अनेक उत्कृष्ट प्रशिक्षक हैं। असली अंतर प्रशिक्षण संस्कृति का है।
विदेशी विशेषज्ञ से केवल तकनीक सीखना पर्याप्त नहीं। हमें उनसे आंकड़ों पर आधारित प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, प्रदर्शन विश्लेषण, चोट से बचाव, पोषण, मानसिक तैयारी और दीर्घकालीन योजना सीखनी होगी। विश्वस्तरीय खिलाड़ी केवल एक कोच नहीं बनाता। उसके पीछे प्रशिक्षक, खेल वैज्ञानिक, चिकित्सक, फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और प्रदर्शन विश्लेषक की पूरी टीम होती है। इसलिए भारत को विदेशी प्रशिक्षकों की संख्या नहीं, विदेशी प्रशिक्षण संस्कृति से सीखने की जरूरत है। खेल विज्ञान और तकनीक को केवल कुछ शीर्ष खिलाड़ियों तक सीमित रखने के बजाय प्रतिभा विकास के शुरुआती चरणों तक ले जाना होगा। खिलाड़ी की नींद, भोजन, शरीर की क्षमता, चोट का जोखिम और प्रदर्शन के आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है।
महिला खिलाड़ी देश की नई ताकत
महिला खिलाड़ियों की बढ़ती सफलता भी भारतीय खेल की नई ताकत है। मनु भाकर, पीवी सिंधु, मीराबाई चानू और निकहत जरीन जैसी खिलाड़ियों ने साबित किया है कि अवसर मिलने पर भारतीय महिलाएं विश्व स्तर पर मुकाबला कर सकती हैं। लेकिन सुरक्षित प्रशिक्षण, छात्रावास, महिला प्रशिक्षक, आर्थिक सहायता और परिवार का भरोसा अभी भी जरूरी हैं। निजी क्षेत्र को भी क्रिकेट से आगे देखना होगा। क्रिकेट ने साबित कर दिया है कि भारत विश्वस्तरीय खेल व्यवस्था बना सकता है। अब चुनौती यह है कि वही पेशेवर संस्कृति दूसरे खेलों में भी क्यों नहीं बनाई जा सकती।
भारत को हर खेल में एक साथ महाशक्ति बनने की जरूरत नहीं है। लॉस एंजिलिस 2028 की तैयारी के लिए चयन और योग्यता के मानदंड भी जारी हो चुके हैं। अब जरूरत इस बात की है कि तैयारी केवल ओलंपिक से कुछ महीने पहले शुरू होने वाली प्रक्रिया न रह जाए, बल्कि प्रतिभा खोज से लेकर प्रशिक्षण और प्रदर्शन तक का पूरा चक्र पहले से तय हो। किन खेलों में भारत को विश्व की शीर्ष तीन शक्तियों में पहुंचना है, कितने खिलाड़ियों को तैयार करना है और उनके लिए कितनी आर्थिक तथा वैज्ञानिक सहायता चाहिए, इसका दीर्घकालीन खाका होना चाहिए।
संयोग से नहीं आते पदक
भारत के पास प्रतिभा है। युवा शक्ति है। आर्थिक क्षमता बढ़ रही है। सरकार का निवेश भी बढ़ रहा है। फिर भी हमें छोटे देशों से सीखना होगा कि पदक संयोग से नहीं आते, पदक तैयार किए जाते हैं। हमें पदक जीतने वाले खिलाड़ियों का उत्सव मनाने से आगे बढ़कर पदक जीतने वाली व्यवस्था बनानी होगी।
हर गांव में स्टेडियम जरूरी नहीं, लेकिन हर गांव में प्रतिभा पहचानने वाली नजर जरूरी है। हर जिले में हर खेल का केंद्र जरूरी नहीं, लेकिन हर जिले की खेल क्षमता पहचानना जरूरी है। हर खिलाड़ी को पदक के बाद करोड़ों का पुरस्कार देने से ज्यादा जरूरी है उसे पदक से पहले वर्षों की निश्चित आर्थिक और वैज्ञानिक सहायता देना। तभी खेल नौकरी पाने का रास्ता नहीं, उत्कृष्टता हासिल करने का माध्यम बनेगा।
भारत क्रिकेट की महाशक्ति बन चुका है। अब उसे क्रिकेट की सफलता से सीख लेकर दूसरे खेलों के लिए भी वही पेशेवर, वैज्ञानिक और दीर्घकालीन व्यवस्था बनानी होगी। आखिर सवाल यह नहीं कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला भारत छह पदक पाकर खुश क्यों हो। सवाल यह है कि इतने बड़े देश में ऐसी व्यवस्था क्यों न हो, जहां हर ओलंपिक में पदक जीतने के लिए हमारे पास दर्जनों मजबूत दावेदार हों? भारत की प्रगति को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अब गति बढ़ाने का समय है। जब प्रतिभा खोजने से लेकर विश्वस्तरीय प्रदर्शन तक पूरी व्यवस्था मजबूत होगी, तभी भारत केवल क्रिकेट महाशक्ति नहीं, बल्कि वास्तविक खेल महाशक्ति कहलाने का अधिकार हासिल करेगा।
खेल संस्कृति को जनआंदोलन बनाना होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेलो इंडिया संवाद में कहा कि भारत अभी ओलंपिक के आधे खेलों में भी हिस्सा नहीं लेता और इसमें सुधार की आवश्यकता है। उनका जोर केवल पदक जीतने पर नहीं, बल्कि ओलंपिक में भारत की भागीदारी का दायरा बढ़ाने और अभी से खिलाड़ियों को तैयार करने पर था। उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं को स्क्रीन से ज्यादा खेल के मैदान की जरूरत है। बच्चों को शुरुआती उम्र से ही मैदान तक पहुंचाना होगा। जब खेल स्कूल, परिवार और समाज की रोजमर्रा की संस्कृति का हिस्सा बनेगा, तभी भारत की विशाल युवा आबादी वास्तविक खेल शक्ति में बदल सकेगी।






No Comment! Be the first one.