एक जनादेश, कई तस्वीरें
राजस्थान के निकाय चुनावों ने सत्ता की तस्वीर के साथ शहरों की अलग-अलग राजनीतिक पसंद भी सामने रखी है। कहीं स्पष्ट बहुमत मिला तो कहीं मुकाबला करीबी रहा। संभागवार नतीजे प्रदेश के शहरी जनादेश को समझने की...

निकाय चुनाव
राजस्थान के शहरों ने अपना फैसला सुना दिया है। अब बारी इस जनादेश को समझने की है। परिणामों को केवल इस गिनती तक सीमित कर देना आसान है कि किस दल ने कितने निकाय जीते, लेकिन स्थानीय चुनावों की तस्वीर इससे कहीं व्यापक होती है। यहां मतदाता के सामने बड़े राजनीतिक मुद्दों के साथ उसके शहर की सड़क, सफाई, पानी, सीवरेज, यातायात और रोशनी जैसे रोजमर्रा के सवाल भी होते हैं। प्रत्याशी की व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय समीकरण भी नतीजों पर असर डालते हैं।
प्रदेश स्तर पर भाजपा ने स्पष्ट बढ़त बनाई है। वार्डों की जीत में वह कांग्रेस से आगे रही और निर्दलीयों ने भी बड़ी संख्या में वार्ड जीतकर मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। लेकिन वोट शेयर में भाजपा और कांग्रेस का अंतर एक प्रतिशत अंक से भी कम रहा। यानी मतदाताओं के स्तर पर मुकाबला लगभग बराबरी का था।
शीर्ष पदों के चुनाव में तस्वीर बदल गई। महापौर, सभापति और अध्यक्ष पदों में भाजपा कांग्रेस से काफी आगे निकल गई। दस नगर निगमों में से नौ में भाजपा के महापौर बने हैं। कांग्रेस के पास केवल बीकानेर है, जहां उसने साफ बहुमत के साथ वापसी की। जयपुर, जोधपुर और कोटा के महापौर चुनाव सबसे अंत में, 25 सितंबर को हुए और तीनों में भाजपा जीती।
इसका मतलब है कि पार्षदों के वोट और शीर्ष पद की कुर्सी हमेशा एक ही कहानी नहीं कहते। स्थानीय चुनावों में पार्टी को मिले कुल वोट सत्ता का अकेला आधार नहीं होते। चुनाव के बाद बनने वाले गठजोड़, निर्दलीयों का रुख और संगठन की रणनीति अक्सर अंतिम नतीजा तय करती है।
निर्दलीयों की भूमिका यहीं सबसे अहम हो जाती है। वार्डों में उनकी ताकत बड़ी रही, लेकिन शीर्ष पदों तक वे गिनती के निकायों में ही पहुंच सके। कई जगह उन्होंने किसी दल को बहुमत तक पहुंचाया या शीर्ष पद के चुनाव में निर्णायक समर्थन दिया। भरतपुर इसका अनूठा उदाहरण है, जहां निर्दलीय पार्षदों की संख्या भाजपा और कांग्रेस दोनों से ज्यादा रही, फिर भी महापौर पद भाजपा के खाते में निर्विरोध चला गया।
अजमेर और पाली में यह अंतर सबसे साफ दिखा। अजमेर में कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी, फिर भी भाजपा की अनामिका शर्मा निर्दलीयों के समर्थन से महापौर बनीं। पाली में भी कांग्रेस के पार्षद सबसे ज्यादा थे, लेकिन भाजपा की नमिता बुबकिया महापौर चुनी गईं। यहां कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी को बहुत ही कम वोट मिले, जबकि एक निर्दलीय प्रत्याशी कड़ी टक्कर देकर दूसरे स्थान पर रहीं।
जोधपुर में वार्ड की तस्वीर बेहद करीबी थी। भाजपा और कांग्रेस के पार्षद लगभग बराबर थे। इसके बावजूद महापौर चुनाव में भाजपा के प्रसन्नचंद मेहता ने कांग्रेस के राजेंद्र सिंह सोलंकी को छह वोट से हरा दिया। जयपुर और कोटा में भाजपा का महापौर पद पर पलड़ा कहीं ज्यादा भारी रहा। यह अंतर केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं था। छोटे निकायों में भी कहीं मुकाबला एक वोट पर टिका रहा, जैसे कोटा जिले की सुकेत नगरपालिका में, तो कहीं कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जैसे श्रीविजयनगर में।
इन नतीजों को केवल भाजपा की बढ़त या कांग्रेस की चुनौती के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल यह है कि अलग-अलग शहरों के मतदाताओं ने अपने स्थानीय नेतृत्व के बारे में क्या संकेत दिए हैं। क्या पुरानी नाराजगी ने किसी जगह परिणाम बदला? क्या मजबूत संगठन ने किसी दल को बढ़त दिलाई? क्या स्थानीय चेहरे ने पार्टी के पारंपरिक आधार को प्रभावित किया? और क्या निर्दलीयों की मजबूती यह बताती है कि मतदाता दलों से अलग विकल्प तलाश रहा है?
इन सवालों के जवाब पूरे प्रदेश में एक जैसे नहीं मिलेंगे। राजस्थान भौगोलिक और सामाजिक रूप से जितना विविध है, उसके शहरों की राजनीतिक पसंद भी उतनी ही अलग है। पश्चिमी राजस्थान का चुनावी मिजाज पूर्वी राजस्थान से अलग हो सकता है। शेखावाटी, मेवाड़, हाड़ौती और मारवाड़ के शहरों में स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व की अपनी भूमिका है। इसलिए किसी एक शहर का परिणाम वहां के समीकरण समझे बिना पूरे प्रदेश का संकेत नहीं माना जा सकता।
राजस्थान टुडे में आगे प्रस्तुत संभागवार तस्वीर इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन रिपोर्टों में केवल यह नहीं बताया गया है कि किस संभाग में किस दल ने कितने निकाय जीते। यह देखने का प्रयास है कि जनादेश का मिजाज कहां कैसा रहा, मुकाबला कहां एकतरफा और कहां करीबी रहा, किन शहरों में स्थानीय नेतृत्व ने भूमिका निभाई और कहां निर्दलीयों ने समीकरण बदल दिए।
चुनाव परिणामों की बड़ी तस्वीर भाजपा की बढ़त दिखाती है, लेकिन शहरों के भीतर मौजूद अलग-अलग समीकरण बताते हैं कि यह जनादेश एकरंगी नहीं है। कहीं संगठन और दल का प्रभाव दिखता है तो कहीं स्थानीय चेहरा सबसे अहम बनकर उभरता है। अगले पन्नों पर संभागवार चुनावी तस्वीर इसी जनादेश के अलग-अलग रंगों को सामने रखती है।






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