भाजपा भारी, कांग्रेस ने भी दी टक्कर
उदयपुर संभाग के 28 निकायों में भाजपा ने 18 पर बोर्ड बनाकर बढ़त कायम रखी, जबकि कांग्रेस को 9 निकाय मिले। क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों का प्रदर्शन सीमित रहा, हालांकि कुछ जगह उन्होंने समीकरण...

निकाय चुनाव – उदयपुर संभाग
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
- निकाय चुनाव – उदयपुर संभाग
- 64 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन
- उदयपुर- लगातार 7वीं लहराया भगवा परचम
- चित्तौड़गढ़ – पांच निकायों में भाजपा का बोर्ड
- उदयपुर जिले में कांग्रेस का डंका
- राजस्व मंत्री हेमंत मीणा घर में नहीं बचा पाए साख
- सात मंत्रियों के क्षेत्रों में नहीं बना भाजपा बोर्ड
- भारत आदिवासी पार्टी की नहीं गली दाल
- उदयपुर संभाग के चुनावी परिणाम
शहरी निकायों में सरकार बनाने में इस बार भी भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस से आगे रही। भजनलाल शर्मा सरकार ने 309 निकायों में वन नेशन, वन इलेक्शन के चुनावी वादे को साकार कर बड़ी सफलता भी अर्जित की। चुनावों के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने जीत-हार के कारणों, सियासी समीकरणों की पड़ताल और धरातल पर बनाई गई रणनीति के मूल्यांकन में जुट गईं। दोनों दलों के शीर्ष पदाधिकारी इस मंथन में जुट गए कि कहां और कैसे चूक हुई? जिन निकायों को जीतने का पूरा भरोसा था, वहां मात किस तरह से खा गए। साथ ही गांवों में अपनी सरकार बनाने की भाग-दौड़ भी शुरू कर दी। भाजपा निकाय चुनाव की तरह पंचायती राज चुनाव में भी जीत का परचम लहराना चाहेगी।
इधर, राज्य के दोनों प्रमुख दलों के उदयपुर संभाग के रिपोर्ट कार्ड को खंगालेंगे तो सामने आएगा कि 28 निकायों के लिए हुए चुनावी संग्राम में शहरी मतदाताओं ने सत्तारूढ़ भाजपा सरकार पर ही अपना भरोसा जताया। संभाग के सात जिलों उदयपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, राजसमंद और सलूंबर में 18 निकायों पर भाजपा ने बंपर जीत हासिल की। वहीं कांग्रेस के खाते में सिर्फ 9 निकाय आए तो एक निकाय निर्दलीय के खाते में गया। संभाग में चुनाव लड़ने वाले क्षेत्रीय दलों और तीसरे मोर्चे को जनता ने सिरे से नकार दिया। संभाग में सक्रिय भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) ने 5 जिलों में पूरी ताकत से चुनाव लड़ा, पर शहरी निकाय की जनता का भरोसा नहीं जीत पाए। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मजबूती से आगे बढ़ी जनजाति अंचल की इस पार्टी को निकाय चुनावों में कहीं भी बड़ी सफलता नहीं मिल पाई।
64 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन
प्रदेश के दक्षिण राजस्थान के इस संभाग का अधिकांश हिस्सा आदिवासी मतदाताओं से घिरा है। यहां के चुनावी मुद्दे अन्य अंचलों से बहुत अलग हैं, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भाजपा सरकार के तीन साल के काम-काज पर आमजन का समर्थन हासिल करने में सफल रही। तभी तो निकाय चुनाव में मतदान के रिकॉर्ड को देखें तो भाजपा ने कांग्रेस की तुलना में मतदाताओं का दोगुना भरोसा हासिल किया। संभाग के सातों जिलों में भाजपा ने 64.3 प्रतिशत निकायों में जीत दर्ज की। जबकि कांग्रेस की हिस्सेदारी 32.1 प्रतिशत रही। आदिवासी अंचल वाले इस संभाग में अध्यक्ष पदों के स्तर पर भी कांग्रेस से कहीं आगे भाजपा रही।
उदयपुर- लगातार 7वीं लहराया भगवा परचम
भाजपा के सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले उदयपुर में पार्टी ने लगातार 7वीं बार प्रचंड जीत दर्ज की। 80 वार्डों के लिए हुए मुकाबले में भाजपा के खाते में 53 सीटें गईं तो कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटें मिल पाईं। तीन वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए तो एक वार्ड माकपा के उम्मीदवार ने जीता। पार्टी का मजबूत कैडर होने का लाभ मेयर और डिप्टी मेयर के चुनावों में भी मिला। पूर्व उप महापौर पारस सिंघवी पर शीर्ष नेतृत्व ने भरोसा जताकर उनके हाथ में नगर निगम के मुखिया पद की कमान सौंपी तो दिनेश भट्ट को उप महापौर का जिम्मा सौंपा। चुनावों में संगठन और संघ का संतुलन भी देखने को मिला। संगठन की पंसद पर मेयर को चुना गया तो संघ ने भट्ट के नाम को आगे बढ़ाया। इस तरह दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में शामिल उदयपुर को और निखारने और संवारने का जनादेश एक बार फिर नागरिकों ने भाजपा को सौंपा।
चित्तौड़गढ़ – पांच निकायों में भाजपा का बोर्ड
संभाग के सभी जिलों की तुलना करें तो चित्तौड़गढ़ जिले की 7 निकायों में इस बार चुनाव हुए। इनमें भाजपा ने कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ा। जिले के 5 निकायों चित्तौड़गढ़, निम्बाहेड़ा, कपासन, रावतभाटा और बेगूं में भाजपा ने जीत का भगवा परचम लहराया तो बड़ी सादड़ी और आकोला में कांग्रेस का बोर्ड बना। राज्य के सहकारिता मंत्री गौतम दक अपने घर बड़ी सादड़ी में पार्टी की साख नहीं बचा पाए।
उदयपुर जिले में कांग्रेस का डंका
मेवाड़-वागड़ अंचल के संभाग मुख्यालय उदयपुर में तो भाजपा ने लगातार 7वां बोर्ड बनाने में कामयाबी हासिल की, लेकिन जिले की 5 नगरपालिकाओं के चुनावों में भाजपा का परिणाम चिंताजनक रहा। कानोड़ और भींडर में कांग्रेस ने अपना बोर्ड बनाया तो फतहनगर में बहुमत होने के बावजूद भाजपा अपना अध्यक्ष नहीं बना पाई। यहां निर्दलीय उम्मीदवार ने भाजपा के घर में सेंध लगाकर कांग्रेस के समर्थन से बड़ी जीत हासिल की। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत के पुत्र और भाजपा के पालिकाध्यक्ष रहे राजेश चपलोत पार्टी से बगावत करके अपनी पत्नी ममता चपलोत को अध्यक्ष बनाने में सफल रहे।
राजस्व मंत्री हेमंत मीणा घर में नहीं बचा पाए साख
जनजाति अंचल के प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय में भाजपा इस बार अपना निकाय बोर्ड बनाने में विफल रही। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री हेमंत मीणा अपने घर में पार्टी की साख नहीं बचा पाए। 40 वार्डों की नगर परिषद में कांग्रेस ने आधी सीटें जीतीं। जबकि भाजपा 17 पर सिमट गई। तीन सीटें निर्दलीय के खाते में गई। राजस्व मंत्री मीणा ने निर्दलीय को साधने में पूरा जोर लगाया, लेकिन वे कांग्रेस के मजबूत किले को भेद नहीं पाए और कांग्रेस ने ज्योति सोनी को सभापति बना दिया। इसी तरह से उप सभापति के चुनाव में भी भाजपा पीछे छूट गई और कांग्रेस की रेखा जैन ने 8 वोटों बड़े अंतर से भाजपा के विजय जटिया को हराया। जिले के बाकी तीनों नगर पालिकाओं छोड़ी सादड़ी, अरनोद और धरियावाद में भाजपा अपना बोर्ड बना पाई।
सात मंत्रियों के क्षेत्रों में नहीं बना भाजपा बोर्ड
चित्तौड़गढ़ जिले की बड़ी सादड़ी नगरपालिका में सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक, प्रतापगढ़ में राजस्व मंत्री हेमंत मीणा, सिरोही में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री ओटाराम देवासी और जालोर में मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा निकाय प्रमुख नहीं बना सकी। खुद प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली में भी भाजपा बुरी तरह से चुनाव हारी। हालांकि जोड़-तोड़ के दम पर भाजपा ने वहां अपना मेयर बना लिया। इसी तरह नावां में राज्यमंत्री विजय सिंह चौधरी, दूदू में उप मुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और जायल में महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री मंजू बाघमार के विधानसभा क्षेत्रों में भी भाजपा निकाय प्रमुख का पद हासिल नहीं कर सकीं।
भारत आदिवासी पार्टी की नहीं गली दाल
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जनजाति अंचल में मजबूत विकल्प बनकर उभरी भारत आदिवासी पार्टी को शहरी निकाय चुनावों में मतदाताओं को समर्थन नहीं मिल पाया। भारतीय ट्राइबल पार्टी से टूटकर राजकुमार रोत के नेतृत्व में बनी बीएपी ने एक सांसद और 4 विधायक बनाकर भाजपा और कांग्रेस को पीछे धकेल दिया। जनजाति अंचल में तेजी से अपना जनाधार बढ़ा रही पार्टी को निकाय चुनाव में पूरा भरोसा था कि वे सलूंबर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर ग्रामीण के क्षेत्रों में दमदार प्रदर्शन करेंगे, लेकिन शहरी मतदाताओं को बीएपी पार्टी के उम्मीदवार नहीं भाए और केवल 8 वार्डों में जीत दर्ज कर पाए।
उदयपुर संभाग के चुनावी परिणाम
उदयपुर (6)
उदयपुर : भाजपा
मावली : भाजपा
कानोड़ : कांग्रेस
फतहनगर : निर्दलीय
वल्लभनगर : भाजपा
भींडर : कांग्रेस
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बांसवाड़ा (3)
बांसवाड़ा : भाजपा
परतापुर-गढ़ी : कांग्रेस
कुशलगढ़ : भाजपा
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चित्तौड़गढ़ (7)
चित्तौड़गढ़ : भाजपा
निम्बाहेड़ा : भाजपा
कपासन : भाजपा
बड़ीसादड़ी : कांग्रेस
आकोला : कांग्रेस
बेगूं : भाजपा
रावतभाटा : भाजपा
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डूंगरपुर (2)
डूंगरपुर : भाजपा
सागवाड़ा : भाजपा
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प्रतापगढ़ (4)
प्रतापगढ़ : कांग्रेस
अरनोद : भाजपा
छोटीसादड़ी : भाजपा
धरियावाद : भाजपा
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राजसमंद (5)
राजसमंद : भाजपा
नाथद्वारा : भाजपा
आमेट : भाजपा
भीम : कांग्रेस
देवगढ़ : कांग्रेस
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सलूंबर (1)
सलूंबर : कांग्रेस






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