भाजपा आगे, गुटबाजी से पिछड़ी कांग्रेस
हाड़ौती के निकाय चुनावों में भाजपा का बूथ मैनेजमेंट और मजबूत संगठन उसकी बढ़त का आधार बना, जबकि कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी और कमजोर बूथ प्रबंधन ने कई जगह उसके प्रदर्शन को प्रभावित...

कोटा संभाग
अरविंद गुप्ता,
वरिष्ठ पत्रकार
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हाडौती संभाग के चारों जिलों में संपन्न निकाय चुनाव में भाजपा ने अपनी अनंत विजय यात्रा जारी रखी। डबल इंजन की सरकार के बाद शहर की सरकार पर भी भाजपा का पलड़ा ही भारी रहा। हाड़ौती में 28 नगर निकायों में से 17 पर भाजपा, 10 पर कांग्रेस और एक बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी का बोर्ड बना है। स्थानीय निकाय चुनाव में जनादेश का वोट प्रतिशत देखें तो भाजपा पहले, कांग्रेस दूसरे, निर्दलीय तीसरे व आप पार्टी चौथे पायदान पर रही।
भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति, अनुभव और सूझबूझ के साथ निकाय चुनाव में बूथ मैनेजमेंट और संगठन को सबसे आगे रखा, जिससे पार्टी का वोट प्रतिशत भी बढ़ा। दूसरी ओर, कांग्रेस की कमजोर संगठन क्षमता, अंदरूनी गुटबाजी, बूथ मैनेजमेंट में समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी जैसे घटकों से अधिकांश सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।
अनंत चतुर्दशी पर्व पर कोटा नगर निगम के चुनाव में भाजपा ने अपना विजयी डंका बजाया। भाजपा प्रत्याशी अनुसूइया गोस्वामी 65 मतों से विजयी रही, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी सुनीता सुमन को 35 वोट मिल सके। नगर निगम के चुनाव में कुल 100 में से भाजपा के पास 57 और 2 निर्दलीय सहित 59 वोट थे। कांग्रेस के पास 39 व एक निर्दलीय सहित 40 वोट थे, लेकिन क्रॉस वोटिंग के चलते भाजपा प्रत्याशी को 6 वोट अधिक मिले। जाहिर है प्रदेश में सत्ता विहीन होने के बाद कांग्रेस अब परस्पर गुटबाजी में बिखरने लगी है।
कारण स्पष्ट है, जनता ने कोटा उत्तर एवं कोटा दक्षिण नगर निगम दोनों में कांग्रेस को बहुमत दिया था, लेकिन पिछले एक वर्ष में दोनों निगम में से एक महापौर सहित कई पार्षद भाजपा में शामिल हो गए। इससे वार्डों के विकास कार्य प्रभावित हुए। प्रदेश में भाजपा सरकार होने से पार्टी के पार्षदों को अप्रत्यक्ष फायदा मिला।
कोटा स्मार्ट सिटी है। इसके मूलभूत विकास कार्यों के लिए मोदी सरकार ने नगर निगम को पर्याप्त बजट दिया, लेकिन पांच वर्षों तक कोटा उत्तर एवं कोटा दक्षिण में कांग्रेस बोर्ड ने शहर की सड़कों, सीवरेज, साफ-सफाई, पार्किंग और अतिक्रमण जैसे बुनियादी मुद्दों पर प्रभावी ढंग से कार्य नहीं किया। हालांकि कांग्रेस के पूर्व मंत्री शांति धारीवाल ने अपने कार्यकाल में कोटा में कई फ्लाई ओवर व सुंदर चौराहे, हरे भरे डिवाइडर, चौड़ी सड़कें, नए लिंक रोड़, पार्किंग स्थल, चम्बल रिवर फ्रंट, दर्शनीय सिटी पार्क, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट, कैटल मुक्त कोटा के लिए देवनारायण पशुपालक आवासीय योजना जैसे विकास कार्यों का जाल फैलाया, जिससे कोटा की तस्वीर बदल गई। लेकिन प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद नगर निगम में कांग्रेस का इंजन ठंडा पड़ गया। दूसरी तरफ, भाजपा ने निगम चुनाव में जीत की रणनीति बनाकर प्रत्याशी चयन से लेकर बूथ स्तर के मैनेजमेंट तक जमीनी कार्य किया। इस प्रभावी व्यूह रचना में कोटा-बूंदी के सांसद एवं लोकसभा स्पीकर ओम बिरला एवं भाजपा नेता हरिकृष्ण बिरला की भूमिका सबसे अहम रही।
आंकड़ों पर गौर करें तो इस बार, कोटा नगर निगम की 100 सीटों के लिए 67.66 प्रतिशत मतदाताओं ने शहर की सरकार चुनने में रूचि दिखाई। जबकि 32.34 प्रतिशत शहरी मतदाताओं ने किसी भी पार्टी या प्रत्याशी को वोट देने में रूचि नहीं ली। कोटा में भाजपा को 2,83,321 वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 2,70,013 वोट मिले। अर्थात भाजपा को 13,308 वोट अधिक मिले। बूंदी में भाजपा को 60,147 वोट एवं कांग्रेस को 56,057 वोट मिले। यानी भाजपा को 4,069 वोट अधिक मिले। जबकि झालावाड़ में कांग्रेस 6518 वोट एवं बारां में 7324 वोट लेकर आगे रही। बारां में आम आदमी पार्टी ने 34,282 वोट हासिल कर पहली बार अपना बोर्ड बनाकर सबको चौंका दिया।
निर्दलीय बने किंगमेकर
प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों प्रमुख दलों में प्रत्याशियों के चयन में अदरूनी गुटबाजी सामने आती है, जिससे टिकट नहीं मिलने पर खफा होकर जमीनी और वर्षों से समर्पित कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी बनकर मैदान में उतर जाते हैं। आम जनता उनके व्यवहार, उपलब्धता और कार्यशैली को देखकर वोट दे देती है। यही निर्दलीय जीतकर अपनी पार्टी के साथ या बाड़ेबंदी के खेल में बहुमत वाली पार्टी के साथ हो जाते हैं। ग्रामीण निकायों के बोर्ड में जहां 1-1 वोट से हार-जीत का फैसला रहा, वहां निर्दलीय किंगमेकर बनकर उभरे हैं।
कुछ चौंकाने वाली बातें
निकाय चुनाव में यह पहला अवसर है जब कोटा जिला कांग्रेस मुक्त हो गया है। इसी तरह, पहली बार बारां नगर परिषद पर आम आदमी पार्टी ने कब्जा कर सबको चौंका दिया। हाड़ौती की कुछ नगरपालिकाओं में निर्दलीयों ने जीत के समीकरण बिगाड़कर कम सीटें जीतने वाली पार्टी का बोर्ड बनवा दिया। कोटा जिले की इटावा नगर पालिका में भाजपा ने निर्दलीय पार्षद निर्मला नागर को अपना सिंबल देकर चेयरपर्सन बना दिया। जबकि यहां भाजपा को 14, कांग्रेस को 16 और 5 निर्दलीय को जीत मिली है। ऐसा ही सुकेत में हुआ जहां 25 वार्डों में से भाजपा 10, कांग्रेस 11 व 4 पर निर्दलीय जीते हैं। यहां भाजपा ने कमल खिला दिया। नगर निगम में मेयर, नगर परिषद व नगर पालिका में चेयरमेन बनाने के लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों दलों ने विजेता पार्षदों की बाड़ाबंदी की। कहीं पावर तो कहीं पैसा बांटने के आरोप भी लगे।
दांव पर रही इनकी साख
कोटा-बूंदी जिले में सांसद व लोकसभा स्पीकर ओम बिरला, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर, उर्जा मंत्री हीरालाल नागर, विधायक संदीप शर्मा व कल्पना देवी, भाजपा जिलाध्यक्ष राकेश जैन, कांग्रेस के पूर्व मंत्री एवं विधायक शांति धारीवाल, पूर्व मंत्री अशोक चांदना, रामनारायण मीणा, पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल, महेंद्र राजोरिया, विधायक चेतन पटेल, शहर जिला अध्यक्ष राखी गौतम, ग्रामीण जिला अध्यक्ष भानुप्रताप, नईमुद्दीन गुडडू, बारां जिले में पूर्व मंत्री व अंता से विधायक प्रमोद जैन भाया, जिला प्रमुख उर्मिला जैन, भाजपा विधायक प्रतापसिंह सिंघवी, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, झालावाड़-बारां क्षेत्र से भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह जैसे कई नेताओं एवं जनप्रतिनिधियों की साख भी दांव पर लगी थी। इसमें झालावाड़ को छोडकर अन्य सभी जगह भाजपा नेता अपनी रणनीति में सफल साबित हुए। जबकि निकाय चुनाव के दौरान बयानबाजी से बड़े-बड़े दावे करने वाले कांग्रेस नेताओं को नतीजों में मुंह की खानी पड़ी है।
कहां किसका बोर्ड बना
कोटा जिला: भाजपा- 7, कांग्रेस- 0
कोटा- भाजपा
रामगंजमंडी- भाजपा
सुकेत- भाजपा
मोड़क- भाजपा
सुल्तानपुर- भाजपा
इटावा- भाजपा
सांगोद- भाजपा
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बारां जिला: भाजपा-2, कांग्रेस-3, आप-1
बारां- आम आदमी पार्टी
मांगरोल- भाजपा
छबड़ा- भाजपा
अंता- कांग्रेस
अटरू- कांग्रेस
सीसवाली- कांग्रेस
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बूंदी जिला: भाजपा-5, कांग्रेस-3
बूंदी- भाजपा
केशवरायपाटन- भाजपा
इंद्रगढ़- भाजपा
लाखेरी- भाजपा
देई- भाजपा
नैनवा- कांग्रेस
हिंडोली- कांग्रेस
कापरेन- कांग्रेस
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झालावाड़ जिला: भाजपा- 4, कांग्रेस- 4
झालावाड़- कांग्रेस
झालरापाटन – भाजपा
पिड़ावा- भाजपा
मनोहरथाना- भाजपा
अकलेरा- भाजपा
डग- कांग्रेस
भवानीमंडी – कांग्रेस
खानपुर – कांग्रेस
निकाय चुनाव ने दिखाया, शहर का मतदाता अलग सोचता है
विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदाता अक्सर बड़े राजनीतिक मुद्दों, सरकार के कामकाज और राष्ट्रीय नेतृत्व को ध्यान में रखकर मतदान करता है, लेकिन निकाय चुनाव की तस्वीर कुछ अलग होती है। यहां मतदाता के सामने उसके वार्ड की सड़क, नाली, सफाई, पानी, स्ट्रीट लाइट और पार्षद की उपलब्धता जैसे सवाल अधिक सीधे होते हैं। हाड़ौती के निकाय चुनाव के नतीजों में भी स्थानीय राजनीति की इसी अलग प्रकृति के संकेत दिखाई देते हैं।
एक ही जिले और लगभग समान राजनीतिक माहौल के बावजूद अलग-अलग निकायों में अलग परिणाम सामने आए। कहीं भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला तो कहीं कांग्रेस ने अपना आधार बचाए रखा। कुछ जगह निर्दलीयों ने पूरा समीकरण बदल दिया। बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी का बोर्ड बनना भी इसी स्थानीय राजनीतिक व्यवहार का उदाहरण है। यह परिणाम बताता है कि निकाय चुनाव में मतदाता हमेशा दो प्रमुख दलों के बीच ही चुनाव नहीं करता, बल्कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विकल्प को भी महत्व दे सकता है।
निकाय चुनाव में प्रत्याशी की व्यक्तिगत पहचान की भूमिका भी बड़ी होती है। वार्ड का मतदाता अक्सर उम्मीदवार को व्यक्तिगत रूप से जानता है। वह उसके सामाजिक व्यवहार, उपलब्धता और अपने छोटे-बड़े काम कराने की क्षमता को भी देखता है। यही कारण है कि बड़े राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न के बावजूद स्थानीय समीकरण कई बार अलग दिशा में चले जाते हैं। किसी वार्ड में पार्टी का मजबूत आधार होने के बावजूद उसका प्रत्याशी हार सकता है और किसी दूसरे वार्ड में अपेक्षाकृत कमजोर माने जाने वाला उम्मीदवार व्यक्तिगत संपर्क के आधार पर जीत हासिल कर सकता है।
हाड़ौती के चुनाव परिणामों में मतदान प्रतिशत भी चर्चा का विषय रहा। कोटा नगर निगम में 67.66 प्रतिशत मतदान हुआ, यानी करीब एक-तिहाई मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा। शहर की सरकार चुनने में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी नहीं होना राजनीतिक दलों के लिए भी सवाल है। निकाय चुनाव में आमतौर पर वही मतदाता अधिक सक्रिय दिखाई देता है, जिसका स्थानीय मुद्दों से सीधा संबंध होता है। ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने चुनौती केवल समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि उन शहरी मतदाताओं को भी जोड़ने की है जो स्थानीय चुनावों से दूरी बनाए रखते हैं।
हाड़ौती के निकाय चुनावों का एक संदेश यह भी है कि शहरों की राजनीति को केवल बड़े नेताओं और बड़ी चुनावी सभाओं से नहीं समझा जा सकता। वार्ड स्तर का संपर्क, प्रत्याशी की छवि और स्थानीय मुद्दे यहां अधिक प्रभावी हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में जिस दल के पार्षद जनता के बीच उपलब्ध रहेंगे और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए लगातार दबाव बनाएंगे, उसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत होने की संभावना रहेगी। निकाय चुनाव इसलिए केवल बोर्ड बनाने का चुनाव नहीं, बल्कि शहर के मतदाता के साथ लगातार संवाद का भी चुनाव है।





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