नाराज सियासी फूफा और फूफियां!
हमारे देश में हर कुनबे, समुदाय, वर्ग या बड़े परिवार में एक फूफा’जी जरूर होते हैं। यह वो प्राणी है जो शादी में देर से आते हैं। खाने में कमी निकालते हैं। टैंट से लेकर कैटरिंग वाले तक रौब झाड़ते...

बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
लेखक और व्यंग्यकार
हमारे देश में हर कुनबे, समुदाय, वर्ग या बड़े परिवार में एक फूफा’जी जरूर होते हैं। यह वो प्राणी है जो शादी में देर से आते हैं। खाने में कमी निकालते हैं। टैंट से लेकर कैटरिंग वाले तक रौब झाड़ते हैं। शादी में कुर्सी पीछे पड़ गई तो फूफा नाराज। नाश्ता पांच मिनट देर से पहुंचा तो फूफा नाराज। फोटो में दूल्हे के पास जगह नहीं मिली तो फूफा नाराज। जाते-जाते पूरे परिवार को बता जाते हैं कि इंतजाम उनसे पूछकर करना चाहिए था। दरअसल, फूफा भारतीय समाज का वह सम्मानित रिश्ता है, जिसकी नाराजगी का कारण कभी स्पष्ट नहीं होता। मगर उसे दूर करना पूरे परिवार का नैतिक कर्तव्य माना जाता है।
राजनीति ने इस महान परंपरा को लोकतांत्रिक स्वरूप दिया है। दरअसल, सियासत में दो तरह के लोग अहम होते हैं। एक वे, जिनके पास वोट होते हैं। दूसरे वे, जिन्हें भ्रम होता है कि सारे वोट उन्हीं के पास हैं। दूसरी जाति के प्राणी को हम सुविधा के लिए ‘सियासी फूफा’ कह सकते हैं। घर के फूफा की तरह ही सियासी फूफा को भी यह भ्रम नहीं, बल्कि पूरा विश्वास होता है कि उनके बिना पार्टी अधूरी है और राजनीति में उनके बिना चुनाव अधूरा है। फर्क सिर्फ इतना है कि घरेलू फूफा नाराज होकर शादी में खाना छोड़ सकते हैं, जबकि सियासी फूफा नाराज होकर पूरा चुनावी समीकरण तोड़-मरोड़ सकते हैं।
यह भी दिलचस्प है कि सियासी फूफा किसी एक पार्टी की बपौती नहीं है। यह समान रूप से सभी पार्टियों में सर्वव्यापी हैं। सर्वज्ञ हैं और सर्व-भक्षक हैं। यहां तक कि अभी ताजी-ताजी बनी पार्टी में भी एक नाराज फूफा ने अपनी दूसरी पार्टी बना डाली। तब यह समझना और आसान है कि पुरानी और सबसे पुरानी पार्टियों में कितने दमदार फूफा-फूफी होंगे। इनकी अपनी पार्टी में भले ही रत्ती-भर न चले, लेकिन दूसरे दलों के इंतजाम पर टिप्पणी करना ये अपना नैतिक दायित्व समझते हैं। सरकार कुछ करे तो कहेंगे- हमें पूछा क्यों नहीं? सरकार कुछ न करे तो बोलेंगे- देखा, कुछ कर ही नहीं रहे! चुनाव हार जाएं तो मशीन खराब, जीत जाएं तो जनता समझदार है!
सियासी फूफा नाराज हो जाएं तो साम, दाम, दंड, भेद की चारों नीति मिलकर भी उसे मनाने में बस पसीना बहा सकती है। साम से समझाइए तो कहेंगे- बहुत समझा लिया, हम बच्चे हैं का? दाम का संकेत दीजिए तो कहेंगे- हमें बिकाऊ समझे हो? दंड की बात कीजिए तो पूरे ताव के साथ कहेंगे- अब देखिए मैं क्या-क्या कर सकता हूं। और भेद तो फूफा’जी के पास पहले से ही होता है। आखिर वे राजनीति में हैं, उनके पास आधे नेताओं की पूरी कुंडली और बाकी आधे नेताओं की आधी-अधूरी जानकारी तो होती ही है! सियासी फूफा की एक बड़ी खूबी है कि उसे मनाने की कोशिश जितनी ज्यादा करेंगे, वे उतने ही अधिक भाव खाएंगे। आप कहेंगे फूफा’जी, आपके बिना पार्टी अधूरी है। वे बोलेंगे- अच्छा अब हमारी याद आई? आप टिकट का लालच उछालेंगे। वे मुस्कुराकर कहेंगे कि टिकट-विकट मुद्दा नहीं है। बात मान-सम्मान की है। और यहीं से राजनीति में सम्मान का वह अध्याय शुरू होता है, जिसमें सम्मान की परिभाषा टिकट, पद, बोर्ड, निगम, आयोग, संगठन और कभी-कभी राज्यसभा सीट तक पहुंच जाती है।
राजनीति में फूफा होना सामान्य बात नहीं है। फूफा वह प्राणी है, जिसे पार्टी ने कभी पद दिया हो या न दिया हो, लेकिन वह स्वयं को पार्टी का सर्वेसर्वा मान लेता है। वह नाराज होने के लिए कारण खुद ही बना लेता है। टिकट, पद, कुर्सी, ओहदा, भाषण, सम्मान किसी में भी फूफा की भौंहें तन सकती हैं। यदि कुछ गड़बड़ हो जाए। पार्टी की हार पर सवाल उठें तो फूफा की पहली लाइन होती है- “मैंने तो पहले ही कहा था…।” यह “मैंने पहले ही कहा था” राजनीति का सबसे खतरनाक वाक्य है। चुनाव परिणाम के बाद हर फूफा के पास यह कहने के लिए पर्याप्त प्रमाण होता है कि उसने पहले ही चेतावनी दे दी थी। कोरोना से लेकर इकोनॉमी तक बेखौफ कह देते हैं- “मैंने पहले ही कहा था।”
पहले राजनीतिक नाराजगी पर पुरुषों का एकाधिकार था। लोकतंत्र ने यहां भी समान अवसर बनाए हैं। अब फूफियां भी मैदान में हैं। सियासी फूफिया टिकट वितरण से लेकर संगठन की नियुक्ति तक सब पर पैनी नजर रखती हैं। फूफा के पास कार्यकर्ताओं की डायरी है, फूफियों के पास व्हाट्सऐप ग्रुप है। फूफा के पास पुराना अनुभव है तो फूफी के पास नया नेटवर्क है। चुनाव आते ही फूफा ही नहीं फूफियों का महत्व भी अचानक बढ़ जाता है। तब उन्हें पता चलता है कि वे दोनों पार्टी की अमूल्य धरोहर हैं। यह अलग बात है कि इस धरोहर का मूल्य चुनाव तक ही रहता है।
अगले साल कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। जैसे-जैसे चुनावी माहौल गरमाएगा, वैसे-वैसे सियासी फूफा-फूफियों की पूछ बढ़ेगी। ऐसे में चुनावी राजनीति का एक नया सूत्र-वाक्य यह होना चाहिए कि वोटर को साधना, कार्यकर्ता को संभालना और गठबंधन को बचाना आसान है, लेकिन नाराज सियासी फूफा को मनाना लोहे के चने चबाने के समान है। इसलिए भले ही देश-प्रदेश गर्त में चले जाएं, लेकिन सियासी फूफा की नाराजगी नाकाबिले बर्दाश्त होनी चाहिए!






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