मतभेद के बीच सहयोग की राह
ब्रिक्स का विस्तार जहां इसे वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली मंच बना रहा है, वहीं सदस्य देशों के बीच मतभेद भी चुनौती हैं। भारत ने अपनी अध्यक्षता में सहयोग, आर्थिक समन्वय और वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर...

ब्रिक्स सम्मेलन
भारत की अध्यक्षता में हाल ही संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन ने यह स्पष्ट किया है कि बदलते दौर में ब्रिक्स जैसे मंचों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। ब्रिक्स अब वैश्विक व्यापार, तकनीक, आपूर्ति नेटवर्क और विश्व स्तरीय संस्थाओं में सुधार जैसे व्यापक मुद्दों पर प्रभाव डालने वाला मंच बन रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली में जारी घोषणा-पत्र की खासियत यह रही कि इसमें शामिल देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद साझा सहमति बनाने का प्रयास किया गया।
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ब्रिक्स देशों ने पहलगाम में हुए उस आतंकी हमले की कड़े शब्दों में भर्त्सना की, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई थी। घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर जोर दिया गया तथा इसके सभी रूपों को खारिज किया गया। ब्रिक्स नेताओं ने आतंककारियों के सुरक्षित ठिकानों, टेरर फंडिंग और सीमा पार आतंकवाद की आवाजाही को रोकने के लिए ठोस और संयुक्त कार्रवाई की मांग की। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
चीन के साथ द्विपक्षीय संवाद
भारत के लिए इस सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन के साथ द्विपक्षीय संवाद रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक में दोनों देशों के संबंधों को स्थिर करने की कोशिश दिखाई दी। सीमा पर शांति और स्थिरता के साथ-साथ व्यापार, आपूर्ति नेटवर्क और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे विषयों पर बातचीत हुई।
ब्रिक्स कंटिन्यूटी एंड इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्म का प्रस्ताव
भारत ने ‘ब्रिक्स कंटिन्यूटी एंड इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्म’ का प्रस्ताव रखा, जिसके तहत आपसी समन्वय बढ़ाने और लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन की निगरानी की बात है। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अक्सर घोषणाएं तो हो जाती हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन की गति अध्यक्षता बदलने के साथ धीमी पड़ जाती है।
व्यापक आर्थिक एजेंडा
आर्थिक एजेंडा भी व्यापक रहा। वित्त, बुनियादी ढांचा, निवेश, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कृषि-पारिस्थितिकी और फिनटेक जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई। ब्रिक्स ने एकतरफा टैरिफ, गैर-टैरिफ उपायों और संरक्षणवाद पर भी चिंता जताई। ब्रिक्स को विकास की व्यावहारिक जरूरतों को पूरा करने वाले सहयोगी मंच के रूप में विकसित करने की कोशिश हो रही है।
कम नहीं चुनौतियां
पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में सीमा पार भुगतान की चर्चा बढ़ी है। इसका मकसद डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और सदस्य देशों के बीच व्यापार को अधिक सुविधाजनक बनाना है। हालांकि अभी तक ब्रिक्स ने कोई साझा तकनीकी ढांचा या एकीकृत सेटलमेंट प्रणाली तय नहीं की है और ‘ब्रिक्स पे’ जैसी कोई साझा भुगतान व्यवस्था भी शुरू नहीं हुई है। इस दिशा में कई व्यावहारिक अड़चनें हैं। अलग-अलग देशों की विनिमय दर व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं। इसके अलावा कुछ देशों पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर सीमा पार भुगतान की व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में केवल राजनीतिक सहमति के आधार पर कोई साझा भुगतान प्रणाली तैयार करना आसान नहीं होगा। व्यापार असंतुलन भी एक गंभीर प्रश्न है। इसलिए ब्रिक्स की आर्थिक महत्वाकांक्षा को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। पहले स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार की व्यवस्था को मजबूत किया जाए, फिर बैंकिंग और भुगतान प्रणालियों के बीच तकनीकी तालमेल बढ़ाया जाए और उसके बाद व्यापक साझा व्यवस्था की संभावना पर विचार किया जाए। ब्रिक्स की एक अन्य बड़ी चुनौती यह है कि उसके विस्तार के साथ उसके भीतर विविधता भी बढ़ी है। अलग-अलग आर्थिक संरचनाओं, राजनीतिक व्यवस्थाओं और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं वाले देश एक ही मंच पर हैं। कई बार यह विविधता साझा निर्णय लेने में बाधक बन जाती है।
वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज को महत्व दिया। दुनिया में आर्थिक शक्ति का संतुलन बदल रहा है, लेकिन वैश्विक संस्थाओं की संरचना अब भी काफी हद तक पुराने शक्ति-संतुलन को प्रतिबिंबित करती है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग इसी असंतुलन से जुड़ी है। नई दिल्ली सम्मेलन का व्यापक संदेश यही है कि आज की दुनिया में विभिन्न देशों के बीच मतभेदों के बावजूद सहयोग की जगह खत्म नहीं हुई है।
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क्या है ब्रिक्स
ब्रिक्स तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का एक समूह है। ब्रिक्स अंग्रेजी के अक्षर बी.आर.आई.सी. और एस. से बना ऐसा शब्द है, जिसमें हर अक्षर एक देश का प्रतिनिधित्व करता है। ये देश हैं ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका। वर्ष 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात इसके सदस्य बने, जबकि जनवरी 2025 में इंडोनेशिया इसका सदस्य बना। बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम 2025 में इसके पार्टनर देश बने।
ब्रिक्स का लक्ष्य
ब्रिक्स का गठन विकासशील देशों को एकजुट करने के मकसद से हुआ था, ताकि विकसित देशों की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति को चुनौती दी जा सके। ब्रिक्स देश आर्थिक मुद्दों पर एक साथ काम करना चाहते हैं लेकिन इनमें से कुछ के बीच भारी राजनीतिक विवाद भी हैं। ब्रिक्स का हर वर्ष शिखर सम्मेलन होता है। हर साल सदस्य देश बारी-बारी से इसकी अध्यक्षता और मेजबानी संभालते हैं।
ब्रिक्स देशों में दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी
ब्रिक्स में शामिल देशों की जनसंख्या दुनिया की आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत है। इसका वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत है। साथ ही वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी 26 प्रतिशत है। इसका सदस्य बनने के लिए कोई औपचारिक तरीका नहीं है। सदस्य देश आपसी सहमति से ये फैसला लेते हैं।
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शाकाहारी थाली पर इतना हंगामा क्यों?
ब्रिक्स देशों के नेताओं के लिए आयोजित भोज भी सुर्खियों में आया। ब्रिक्स भोज में शाकाहारी व्यंजन परोसे जाने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस भी शुरू हो गई। एक वर्ग ने यह तर्क दिया कि देश की बड़ी आबादी मांसाहारी है, इसलिए विदेशी मेहमानों को केवल शाकाहारी भोजन परोसना भारत की समावेशी खाद्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि भारत दुनिया में सबसे बड़ी शाकाहारी आबादी वाला देश है। पर्यावरण अनुकूल होने के कारण दुनिया में आजकल शाकाहार लोकप्रिय हो रहा है। ऐसे में किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय शाकाहारी व्यंजनों को प्रस्तुत करने पर विवाद का कोई औचित्य नहीं है।
भारत में शाकाहार की जड़ें बहुत गहरी हैं। धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही खान-पान की आदतों ने यहां शाकाहारी भोजन को व्यापक आधार दिया है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक शाकाहारी व्यंजनों की अपनी अलग पहचान है। शाकाहार आज केवल धार्मिक या पारंपरिक भोजन की श्रेणी तक सीमित नहीं है। पर्यावरण, पशु कल्याण और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता भी लोगों को प्लांट-बेस्ड भोजन की ओर ले जा रही है। करुणा भी वह मुख्य कारण है जिसके चलते कई लोग शाकाहारी जीवनशैली अपनाते हैं। भारत की विशेषता यह है कि यहां शाकाहारी भोजन केवल किसी आधुनिक ‘डाइट ट्रेंड’ का परिणाम नहीं है। यह सदियों से विकसित जीवनशैली का हिस्सा रहा है। अहिंसा की भारतीय अवधारणा ने भी इसे मजबूत आधार दिया है। भोजन में हिंसा को कम करने की सोच भारतीय दर्शन के कई हिस्सों में दिखाई देती है। प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ भी शाकाहार के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि भोजन के लिए बेजुबान जानवरों को मारना उचित नहीं है। उनका प्रसिद्ध कथन था कि ‘मैं अपने पेट को जानवरों की कब्रगाह नहीं बनाना चाहता।’ उनके लिए शाकाहार केवल भोजन का चुनाव नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक नैतिक दृष्टिकोण था।
यदि भोजन के जरिए अपनी संस्कृति दिखाने का अवसर मिले तो भारत को इससे पीछे क्यों हटना चाहिए? दुनिया आज मिलेट्स की चर्चा कर रही है। रागी और बाजरा जैसे अनाज भारतीय भोजन परंपरा में सदियों से मौजूद हैं। दुनिया में प्लांट-बेस्ड प्रोटीन और वैकल्पिक भोजन की चर्चा बढ़ रही है तो भारतीय दालें, चना, राजमा और अनेक प्रकार के अनाज इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। मशरूम से बने व्यंजन, दालों से तैयार सूप, पनीर के अनेक रूप और क्षेत्रीय सब्जियों की विविधता भारत की भोजन परंपरा को वैश्विक मंच पर अलग पहचान दे सकती है। जब विदेशों में योग, आयुर्वेद और भारतीय दर्शन को प्रस्तुत किया जाता है तो हम गर्व महसूस करते हैं, लेकिन शाकाहार को लेकर असहज हो जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों? यदि भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक हिस्सा शाकाहारी भोजन है तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे दिखाने में संकोच कैसा?
शाकाहार का समर्थन अहिंसा, पर्यावरण और पशु कल्याण जैसे मूल्यों के आधार पर किया जा सकता है। दुनिया जब टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल भोजन की ओर देख रही है, तब भारत के पास अपनी प्राचीन शाकाहारी परंपरा के जरिए देने के लिए बहुत कुछ है। इसलिए किसी शाकाहारी राजकीय भोज को लेकर अनावश्यक आक्रोश के बजाय इसे भारत की खाद्य-सांस्कृतिक ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए।





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